छत था, छत न था; क्षत-विक्षत; बचपन था : गंगेश कुमार मिश्र

एक बच्चा था .. गंगेश कुमार मिश्र , कपिलबस्तु , 29 कार्तिक |
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मासूम सा,
भोला सा;
एक बच्चा था।
कुछ ना कहता,
बस,
चुप रहता था।
कुछ कहने से,
घबराता,
जाने क्यूँ ?
डर जाता था।
एक बच्चा था ….
अहसानों के बोझ तले,
दबा-दबा सा,
रहता,
कहने को अपने थे,
अहसान जताने वाले।
धीर था, गम्भीर था;
एक बच्चा था …..
छत था, छत न था;
क्षत-विक्षत;
बचपन था,
आँखें नम थीं,
धुँधला दर्पन था।
एक बच्चा था ….
आज भी वो बच्चा,
सहमा-सहमा सा,
मुड़-मुड़ कर,
पीछे देखता है,
शायद,
उसे लगता है,
अभी कोई आवाज़ देगा।
आओ ! चलते हैं,
साथ-साथ।
एक बच्चा था ….

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