छात्र शहीद मिथिलेश दुवे

बी.डी. चौधरी कैदी’:आध्यात्मिक विचारों पर मनन किया जाए तो वास्तव में मनुष्य जीवन को, किसी वस्तु के प्रति समर्पित न होकर, सांसारिक माया, मोह और लोभ से वञ्चित रहते हुए देश काल, परिस्थिति के अनुसार अपने-आप को समाज और राष्ट्र प्रेम में वशीभूत कर के मानव जीवन की सफलता और दुनिया की ऊँचाइयों को छूने के लिए अमरता एवं मुक्ति देते बलिदान की राह चुनना ही सर्वोत्तम है, जिसे अपनाने में हमारे शहीद लोग पीछे नहीं है । अतः सभी शहीदों के प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पण करते हुए ‘छात्र शहीद मिथिलेश दूवे’ की उँचाइयों को भी नकारा नहीं जा सकता । एक कहावत है-
जिन्दगी बदल सकती है, सुन लो ये जो कहता मन
छू लो उँचाइयों को, कदमों में होगी दुनिया यकीनन ।Mithilesh Dube
इस तरह हम देखते और सुनते आ रहे हैं किर् इश्वर द्वारा रचित ब्रम्हाण्डीय सृष्टि में चौरासी लाख योनियों का उल्लेख मनीषियों ने किया है । परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट कृति मानव को कहा गया है । सभी जीवों में आहार, भय, न्रि्रा, मैथुन समान रूप से पाया जाता है, परन्तु मनुष्यों को विशेष कहा गया है । क्योंकि अपनी इच्छा को कार्य रूप देने की क्षमता मनुष्य मात्र में है ।
इस प्रकार सृष्टि विकास क्रम में पदार्थों और विचारों का विकास होता जा रहा है । मन से मनु और मनु से मनुष्य बना है । मनुष्य मन का पुतला है और मनु ने देवत्व प्राप्त कर मनुष्य को जीवन जीने का निर्देश किया है । ज्ञान विवेक और ऋतम्भरा प्रज्ञा से ही मुनष्य देवत्व की श्रेणी में उत्क्रमित होता है । मानव जीवन जीने के लिए सृष्टि में राष्ट्र, स्वतन्त्रता, प्रजातन्त्र और गणतन्त्र आवश्यक विस्तार है । इन विचारों के लिए मनुष्य और मनीषियों ने निरन्तर धरती पर संर्घष्ा किया है । अथर्ववेद में ‘माताभूमि पुत्रो˜हं पृथिव्या’ कहकर मनुष्य और पृथ्वी में मातापुत्र का सम्बन्ध स्थापित किया है । अपनी ही मिट्टी की गन्ध राष्ट्रीयता होती है । जिस में संस्कृति की सुगन्ध होती है । राष्ट्रीयता एक भावना है, जो जमीन और संस्कृति से जुडÞी रहती है । राष्ट्रीयता स्वधरती प्रति श्रद्धा, मूल्य, मान्यता, आस्था और आदर्श, परम्परा, ‘वसुधैव कुटुम्बकम, र्सर्वे भवन्तु सुखिनः, प्रेम, दया, करुणा तथा मैत्री भाव से ओतप्रोत रहता है । समान आशा, आकांक्षादि गुणों से सुसम्बन्ध अनुशासित जीवन शैली जीने की भावना राष्ट्रीयता कहलाती है ।
सभी जीव स्वतन्त्र रहना चाहते हैं । स्वतन्त्रता तय है, यह बलिदान मांगती है । विचारों की कसौटी मनुष्य को देवता बना देती है । विचार कल्याणकारी होना चाहिए । हम सदा स्वाधीन राज्य में रहे, जहाँ पर्ूण्ा स्वतन्त्रता हों । ऐसी स्वतन्त्रता प्रजातन्त्र में सम्भव है । जो जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता से सञ्चालित होती है, जिसका उद्देश्य धर्ममय जीवन ‘सुखस्य मूलं धर्म, धर्मस्य मूलं अर्थः और अर्थस्य मूलं राज्यम् हो ।’ इन्ही भावनाओं से मानव सदियों से अपने राष्ट्र के शासकों के प्रति उनके प्रतिकूल आचरणों के विरुद्ध संर्घष्ारत रहा है । सत्ताधारियों के अन्याय, शोषण, दमन और अत्याचार के विरुद्ध उनसे मुक्ति पाने की चाहत होती है । ऐसे विचारों से प्रभावित मुनष्य मौत से नहीं डरते, क्योंकि मौत तो आनी ही है । अतः अमरता को स्वीकार करना है जो सबों के लिए सम्भव नहीं ।
इसी कालक्रम में नेपाल में वर्षों से शासकों के शोषण, दमन, अत्याचार के विरुद्ध आन्दोलन के क्रम में महोत्तरी जिला ग्राम सिस्वा कटैया छोटा कटटी नेपाल निवासी श्री भोला दूवे पिता और माता श्रीमती राम सिफलदेवी के कोख से वि.सं. २०२१ साल पौष ७ गते के दिन पैदा हुए सुपुत्र मिथिलेश दूवे ने वि.सं. २०३६ साल जेष्ठ ५ गते पुलिस मुठभेड में शहादत प्राप्त की ।
आन्दोलन चरम अवस्था में था । गाँव गली नगर डÞगर से जनता और छात्र आन्दोलन में सरीक थे । गोधूली समय में उसी दिन सिस्वा कटैया स्थित सीमा सुरक्षा प्रहरी थाना पर धावा बोलने की तैयारी थी । भीडÞ बेकाबू हो आगे बढÞी । थाने की सुरक्षा घेरा को तोडÞफोडÞ करने का काम हो रहा था । भीडÞ थाने के द्वार के पास थी । मिथिलेश अग्रपंक्ति में था । पुलिस ने गोली चलाई और पहली ही गोली ‘छात्र मिथिलेश दूबे’ को लगी और उन्होंने शहादत प्राप्त किया ।
उस समय वो श्री दर्ुगा मा.वि. मनरा, महोत्तरी के सप्तम कक्षा के छात्र थे । उनकी प्रकृति जुझारु थी । नारा, सभा, जुलुस, विवाह पेन्टिङ उनकी दैनिकी थी । मृत शरीर भी परिजनों को नहीं दिया गया । परिवारजनों में शोक का माहौल था । लाश के लिए बहुत प्रयास हुआ पर लाभ नहीं मिली । दूवे ने अन्याय-अत्याचार और शेाषण के विरुद्ध लडÞते हुए रण क्षेत्र में राष्ट्र के लिए कर्ुवानी दी है । अन्ततः तानाशाही पञ्चायती व्यवस्था का अन्त हुआ और वि.सं. २०४६ साल चैत २६ गते रात्रि ११ बजे से प्रजातन्त्र की पुनः स्थापना की गई । तत्पश्चात् मिथिलेश शहीद घोषित हुए । इनके पीछे दो भाई और एक बहन हैं । जिन्हें सरकार की ओर से किसी प्रकार की राहत नहीं मिली है ।
शहीद घोषणा पश्चात् शहादत स्थल कटैया में स्मारक बनाने का कार्य अधूरा है । मनरा में इन के नाम के वाचनालय की अवस्था भी दयनीय है । रकम का अभाव, जागरुकता की कमी, शहीद प्रति अनास्थाभाव, जातीयतार्,र् इष्र्या द्वेष के कारण बडÞी कठिनाई है क्योंकि समाज जागृत नहीं है और राजनीति स्थिर नहीं । जो भी हो शहीद की सम्म्ाान सभी राजनीतियो के द्वारा संरक्षित रहे और शहीद का सपना साकार हो प्रजातन्त्र, गणतन्त्र और संघीयता की तरफ सभी उन्मुख रहें तभी शहीदों का सपना साकार होगा ।
इस तरह हम देखते हैं कि निर्वाण की प्राप्ति मनुष्य के लिए ही सम्भव है क्योंकि इसकी समझ केवल मनुष्य को ही हो सकती है और वह ही इस दिशा में कार्य कर सकता है और आवागमन के झंझट से मुक्त हो सकता है । अन्य प्राणियों को अनेक योनियों के चक्र में घूमना पडÞता है, तब ही मनुष्य का शरीर मिलता है । पुराने जमाने में मनुष्य रोगों के अलावा प्रायः युद्ध में मरते थे । अर्थात् यदि कोई युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो वह र्स्वर्ग जाता है और यदि जीत जाए तो इस धरा पर र्स्वर्ग भोगता है । बिस्तर पर लेट कर मरना अच्छा नहीं माना जाता था । अतः जब हम शहीदों का स्मरण करते हैं तो उस शहीद का नाम हम से जुडÞ जाना ही उन्हें अमरत्व प्रदान कर र्स्वर्ग का अधिकारी बना देता है । अतः छात्र शहीद मिथिलेश दूवे मर कर भी अमर हैं । उनके सपना को साकार करना हमारा कार्य और धर्म है । इसी में सबों की भलाई है ।

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