जनकपुरधाम का संरक्षण और विश्व सम्पदा

गोपाल झा:नेपाल सांस्कृतिक सम्पदाओं का धनी देश है । यहाँ पर अनेकों मन्दिर, स्तूप, बिहार, बहुत सारे भवन, असंख्य कलाकृति देखने को मिलते हंै । ये सांस्कृतिक सम्पदा हमारे इतिहास संस्कृति और सभ्यता का सम्वाहक है । इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि ही हमारी सम्पदा है । ये सांस्कृतिक सम्पदा हमारी राष्ट्रीयता की पहचान है । इन सांस्कृतिक सम्पदाओं का नाश होना, जीर्ण होना एवं इनको खतरा पहूँचाना सम्पूर्ण मानव समुदाय की सभ्यता एवं संस्कृति का क्षति होनी है । इसलिए ऐसी सांस्कृतिक सम्पदाओं का संरक्षण, सुरक्षा और बचाने के लिए राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहल होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है । मूत्र्त सांस्कृतिक सम्पदाएँ चाहे वह चल हो, वा अचल हो, उन सबों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए ऐन, नियम, कानून, निर्देशिका की व्यवस्था की जानी चाहिए । साथ ही सम्पदा संरक्षण सम्बन्धी ऐन, नियमों का कार्यान्वयन करने के लिए निश्चित निकायों की आवश्यकता भी होती है । इस पृष्ठभूमि में सर्वश्रेष्ठ एवं विश्वव्यापी महत्व का सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक सम्पदाओं के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहल करनेवाला अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी औजार के रूप में विश्व सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक संरक्षण सम्बन्धी महासन्धि, १९७२ को लिया गया था । नेपाल ने भी सन् १९७८ में इस महासन्धि का अनुमोदन कर सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक सम्पदाओं का संरक्षण व सुरक्षा करने की प्रतिवद्धता व्यक्त कर चुका है । इसी क्रम में काठमांडू उपत्यका सन् १९९७ में सांस्कृतिक विश्व सम्पदा सूची में सूचिकृत हो चुका है और सन् १९९७ में भगवान गौतम बुद्ध का जन्मस्थल लुम्बनी नेपाल को दूसरा सांस्कृतिक विश्व सम्पदा स्थल के रूप में विश्व सम्पदा सूची में समावेश किया गया है । janki temple
इन सांस्कृतिक सम्पदाओं के संरक्षण के लिए अनेकों कार्य होते आ रहे हैं । इसीतरह लुम्बिनी के अतिरिक्त काठमांडू उपत्यका से बाहर विश्व सम्पदा सूची में सूचिकृत प्राकृतिक सम्पदाओं में सगरमाथा राष्ट्रीय निकुञ्ज (सन् १९७९) और चितवन राष्ट्रीय निकुञ्ज (सन् १९८४) है ।
सन् १९७९ में काठमाडू उपत्यका सांस्कृतिक, धार्मिक तथा कला एवं वस्तुकला के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण, सर्वश्रेष्ठ और विश्वव्यापी महत्ववाला स्मारक तथा स्मारक क्षेत्रों को समावेश कर काठमांडू उपत्यका एक सांस्कृति विश्व सम्पदा स्थल के रूप में विश्व सम्पदा सूची में सूचिकृत किया गया था । विश्व सम्पदा सूची में समावेश होने वाला स्मारक क्षेत्रों में हनुमानढोका, पाटन और भक्तपुर दरबार क्षेत्र, पशुपतिनाथ मन्दिर और चाँगुनारायण मन्दिर क्षेत्र, स्वयम्भू और बौद्ध स्तुप क्षेत्र हैं । इसी प्रकार ये स्मारक एवं स्मारक क्षेत्र विश्व के सर्वोत्कृष्ट स्मारक के सूची में सूचिकृत हंै । ये नेपाली मात्र के लिए ही नहीं सम्पूर्ण मानव समुदायों की साझा निधि एवं गौरव के प्रतीक के रूप में है ।
विश्व सम्पदा सूची में सूचिवद्ध स्मारक तथा स्मारक क्षेत्रों की सुरक्षा, संरक्षण तथा व्यवस्थापन के विषय में पहला दायित्व राज्य पक्ष का ही होता है । साथ ही इन स्थलों का संरक्षण की अवस्था के विषय में तथा विश्व सम्पदा महासन्धि के कार्यान्वयन के सम्बन्ध में युनेस्को लगायत के अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें भी सजग रहती हंै । सम्पदाओं के संरक्षण में सम्पूर्ण मानव समुदाय को सक्रिय होने की आवश्यकता होते हुए भी इस कार्य को करने की विशेष जिम्मेदारी सम्बन्धित सरकार और उसके प्रतिनिधि संस्था चाहे वह सरकारी हो वा अर्धसरकारी निकायों में ही निहित रहने का प्रचलन होता है । सम्पदाओं के संरक्षण, सुरक्षा तथा व्यवस्थापन सम्बन्धी विभिन्न राज्यों का अपना अलग अलग कानून और नीति होती है । नेपाल के सन्दर्भ में सांस्कृतिक सम्पदाओं का संरक्षण एवं सुरक्षा करने के प्रयोजन के लिए प्राचीन स्मारक संरक्षण ऐन लगायत अनेकों ऐन लागू किया गया है ।
सन् २००८ जनवरी ३ तारीख में जनकपुर अञ्चल, धनुषा जिल्ला के रामजानकी मन्दिर को पुरातत्व विभाग द्वारा विश्व सम्पदा सूची में सूचिकृत करने के लिए सम्भाव्य सूची में युनस्को को भेजा गया था । रामजानकी मन्दिर के साथ ही लोमाङ्गथान, साँखु का बज्रयोगिनी मन्दिर, कीर्तिपुर का मध्यकालीन बस्ती, रुरु का ऋषिकेश क्षेत्र, नुवाकोट का दरबार क्षेत्र, तानसेन (पल्पा) का मध्यकालीन शहर, सिंजा उपत्यका और दैलेख का भूर्ति मन्दिर क्षेत्र भी समावेश है । इस से पहले सन् १९९६ में पनौती, तिलौराकोट, मुस्ताङ, गोरखा दरबार क्षेत्र, रामग्राम के स्तुप, खोकना आदि को भी सम्भाव्य सूची में भेजा गया था । सम्भाव्य सूची में श्री जानकी मन्दिर का नाम राम जानकी मन्दिर उल्लेख होने से पुनः नाम सुधार कर भेजना आवश्यक है । वैसे वि.सं. २०७२ आषाढ़ ३१ गते (सन् २०१५ जुलाई १६) पुरातत्व विभाग द्वारा जनकपुरधाम में आयोजन किया गया विचार गोष्ठी का विषय– ‘जनकपुर धामलाई विश्व सम्पदा सूचीमा सूचिकृत गर्न पूर्वाधार तयार गर्नेबारे अन्तरक्रिया गोष्ठी’ होने से उसी के आधार पर पुनरावलोकन कर सिफारिस करना आवश्यक है ।
विश्व सम्पदा स्थल चयन करने का पूर्वाधार
विश्व सम्पदा सूची में स्थापना करने का कार्य अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए एक जटिल एवं चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है । कोई भी स्थल वा स्मारक कैसे विश्व सम्पदा का हिस्सा हो सकता है, यह निर्णय करना अपने आप में जटिल कार्य है । वह कौन सी विशेषता एवं महत्व है, जो एक सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक सम्पदा या स्थल को सर्वश्रेष्ठ एवं विश्वव्यापी महत्व का विश्व सम्पदा है, इसकी पुष्टि करती है । तसर्थ विश्व सम्पदा महासन्धि का कार्यान्वयन करने के लिए विश्व सम्पदा समिति द्वारा इकोमोस के सहयोग से एक कार्यान्वयन निर्देशिका तैयार किया गया है । जिस को विश्व सम्पदा महासन्धि का कार्यान्वयन के लिए कार्यान्वयन निर्देशिका कहा जाता है । इस कार्यान्वयन निर्देशिका में एक सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक सम्पदा तथा सम्पदा स्थल को विश्व सम्पदा सूची में समावेश करने के लिए कैसे मनोनयन किया जाना चाहिए, इसका आवश्यक पूर्वाधार सब उल्लेख किया गया है । उक्त कार्यान्वयन निर्देशिका के अनुसार कोई भी सांस्कृतिक स्थल विश्व सम्पदा सूची में मनोनयन होने के लिए निम्न लक्षण एवं विशेषतायें होना आवश्यक है ।
क) कम से कम अद्वितीय सांस्कृतिक परम्परा प्रमाणित करने वाली अद्वितीय वस्तु या जीवित या लुप्त हो चुकी सभ्यता
ख) सर्वश्रेष्ठ नमूना के रूप में दिखनेवाला भवन या वस्तुकला या प्रविधि संयोजन या मानव इतिहास की महत्वपूर्ण अवस्था दिखनेवाले भू–दृश्य वा
ग) कोई भी संस्कृति (अथवा संस्कृतियोँ) का प्रतिनिधित्व करनेवाला परम्परागत मानव बास अथवा भू–उपयोग का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण खासकर जब यह स्थिर परिवर्तन के प्रभाव अन्तर्गत संवेदनशील बना होता है । या,
घ) सर्वश्रेष्ठ विश्वव्यापी महत्व की कोई घटना या जीवन परम्पराओं से सम्बद्ध विचार अथवा विश्वास, कलात्मक और साहित्यिक कृतियों के साथ ही प्रत्यक्ष वा मूर्त रूप में सम्वद्ध या
ङ) मानव सृजनात्मक प्रतिभा का एक उत्कृष्ट नमूना का प्रतिनिधित्व करता हुआ या
च) वास्तुकला के विकास या प्रविधि, स्मारक के रूप में रही कला, नगर योजना या भू–दृश्य तथा डिजाइन के बारे में अधिक समयावधि तक मानव मूल्य के एक अन्तर परिवर्तन प्रस्तुत करनेवाला या विश्व का एक सांस्कृतिक क्षेत्र के परिधि में रहा हुआ ।

ऊपर उल्लेखित लक्षण और विशेषताओं के आधार पर जनकपुर धाम को मूल्यांकन करने पर विश्व सम्पदा सूची में मनोनयन करने का बहुत आधार मिलता है । वैसे तो विश्व सम्पदा सूची में नहोने पर भी जनकपुरधाम और श्री जानकी मन्दिर विश्व प्रसिद्ध है । एक सौ करोड़ से अधिक सनातन धर्मावलम्बी जिसको हिन्दू कहा जाता है, उसके लिए तो तीर्थ स्थल है ।
नेपाल में राजर्षिजनक और जगत जननी सीता को राष्ट्रीय विभूति घोषित किया गया है । राजर्षि जनक मिथिला के महाराज थे । जनक वंशीय महाराजाओं की राजधानी होने से राजधानी का नाम जनकपुर पड़ा । सिरध्वज जनक द्वारा लोक कल्याण के लिए हल जोतते समय पृथ्वी से एक बालिका की उत्पत्ति होती है, जिसका नाम सीता रखा गया । जनकवंशी के पहले महाराज निमि थे । जिन्हें विदेह नाम से भी जाना जाता है । निमि द्वारा बसाया गया नगर का नाम बैजंत कहा गया । जनक वंश के दूसरे महाराज मिथि हुए । इन्होंने बैजन्त का नाम बदल कर मिथिलापुरी कर दी । जनक वंश के इतिहास में सबसे प्रसिद्ध राजा सिरध्वज हुये । ये उस वंश के बाइसवें राजा थे । अन्तिम राजा के रूप में कराल का नाम आता है, जो बहुत दुराचारी था । जिसके कारण जनक वंश का अन्त हुआ । जनक वंशी राजाओं की सूची के अनुसार कराल बावनवें पीढी के राजा थे ।
आदर्श नारी सीता के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द कहते है, जब तक भारत में एक मात्र परिवार भी हिन्दू रहेगा, तब तक माता सीता के चरित्र का वर्णन होता रहेगा । सम्पूर्ण हिन्दू नारी को सीता माता की प्रतिमुर्ति माना जाता है । वैसे ही (युग ऋषि युग निर्माण आन्दोलन के प्रणेता) वेद मूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य पं. श्री राम शर्मा जी द्वारा सन् १९८७ में दिए गए एक प्रवचन से सम्पादित की गई पुस्तक का नाम है– संस्कृति की सीता की वापसी । यह प्रवचन उन्होंने परिव्राजकों (युग निर्माण योजना के समयदानी प्रचारकों) के प्रशिक्षण के बाद उन्हें क्षेत्र में भेजने की तैयारी के क्रम में दिया था ।
युग ऋषि भी स्वामी विवेकानन्द तथा योगी श्री अरविन्द की तरह भारत द्वारा विश्व के साँस्कृतिक, आध्यात्मिक नेतृत्व को दैवी योजना के अंग मानते रहे हैं । भारत और विश्व में जो विसंगतियाँ, समस्याएँ विकट रूप में दिखाई देती है, उन सब के पीछे मुख्य कारण है, मनुष्य का सांस्कृतिक पतन । इस प्रवचन में उन्होंने अलंकारिक ढंग से अनगढ़ रुढि़वादी पूर्वाग्रहों में बँधी संस्कृति की उपमा रावण के कैद में रह रही सीता से करते हुए उसकी वापसी की बात कही है ।
रावण एक विकृत मानसिकता का प्रतीक है । रावण सप्तऋषियों में से एक महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और कुवेर के पिता ऋषि विश्रवा का पुत्र था । लेकिन वह अपनी अहं, अपनी सुविधा, अपनी सम्पत्ति के नशे में अपने उस महान गौरवमय, साँस्कृतिक स्वरूप को भूल गया । आज का मनुष्य भी अपने ऋषियों, अवतारों, पीर–पैगम्बरों की विरासत को भूलकर अपनी इन अनगढ़ महत्वाकांक्षाओं को ही सब कुछ मानकर चल रहा है । इन अंधी महत्वाकांक्षाओं से मुक्ति मिले, तो सारी बसुधा को अपना कुटुम्ब (वसुधैव कुटुम्बकम्) तथा सभी प्राणियों को अपना आत्मीय (आत्मवत् सर्वभूतेषु) की अनुभूति हो तो गरिमामय जीवन शैली फिर से विकसित हो । ऐसी ही सांस्कृतिक क्रान्ति को देशव्यापी और विश्वव्यापी बनाने की, युग ऋषि ने संस्कृति की सीता की वापसी का अलंकारिक सम्बोधन दिया है । उन्हीं सीता का विवाह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ धनुष यज्ञ के माध्यम से हुआ था ।
धनुष यज्ञ का स्थल रंगभूमि, धनुष के तीन टुकड़ा का एक खण्ड गिरा हुआ स्थान धनुषाधाम है । धनुष सागर को सम्पूर्ण सनातन धर्मावलम्बी जीवन में एक बार दर्शन करना चाहते हंै और उस स्थान की मिट्टी से तिलक लगाना चाहते हैं । इसी आस्था और विश्वास के कारण जनकपुर धाम में श्री जानकी मन्दिर का निर्माण सन् १८९४ ई. में टीकमगढ़ (भारत) की महारानी वृषभानु कुँवर द्वारा राजस्थानी वास्तुकला के अनुपम नमूना के रूप में निर्माण करवाया है । सम्भवतः इसे नेपाल में सबसे बड़ा मन्दिर माना जाता है, जो विश्व प्रसिद्ध है । इतना विशाल स्वरूप का मन्दिर जिसका निर्माण करने में पन्द्रह–सोलह वर्ष का समय और नौ लाख रकम व्यय हुआ है, कोई अनजान, अनकंटार जंगल में नहीं बना होगा यह हमें विचार करना होगा, उस समय में जनकपुरधाम कैसा रहा होगा, जिसे देखकर टीकमगढ़ (भारत) की महारानी को दरबार जैसा मन्दिर निर्माण करने की प्रेरणा मिली हो ।
बाबन कुटी बहत्तर कुण्डा, फिरहिं सन्तजन झुण्डहि झुण्डा
पाँच दशक पूर्व तक यह दृश्य जनकपुर धाम में देखा जाता था । उपरोक्त पंक्ति से स्पष्ट होता है, जो जनकपुरधाम में पग–पग पर मन्दिर हैं । इन मन्दिरों का अपना अलग–अलग इतिहास है । लेकिन सम्पूर्ण में जब इन मन्दिरों को देखते हैं तो एक बात उभर कर सामने आती है– यहाँ कुछ ही मन्दिर है, जिनकी पहचान मन्दिर के रूप में है । जैसे जानकी मन्दिर, राम मन्दिर, लक्ष्मण मन्दिर, जनक मन्दिर, दशरथ मन्दिर, संकट मोचन, हनुमान मन्दिर आदि । बाकी जितने मन्दिर है, उनकी पहचान या तो कुटी के रूप में हैं या कुण्ड के रूप में । कुटी के रूप में पहचान रखने वालों मन्दिरों का उदाहरण कलवार कुटी, रौड़ कुटी, सरहंचिया, कायथवनियाँ कुटी, बराही कुटी, पासवान कुटी, थारु कुटी आदि हैं । इन मंदिरों को प्रायः प्रत्येक जाति के लोगों का अपना–अपना आश्रय स्थल के रूप में देखा जाता था । नगर निर्माण में इन कुटी और कुण्ड का महत्वपूर्ण स्थान है ।
नेपाली वास्तुकला के रूप में प्रसिद्ध पैगोडा शैली में वि.सं. १८३९ (सन् १७८२) में जनरल अमर सिंह थापा ने श्री राम मन्दिर का निर्माण करवाया था । ई. १९२७ में राणा प्रधानमन्त्री चन्द्र शमशेर ने ताम्रपत्र पर स्वर्ण जलप लगाकर श्रीराम मन्दिर का जीर्णोद्वारा करवाया था । पुरातत्व विभाग द्वारा श्रीराम मन्दिर का जीर्णोद्धार ई. २०१३÷१४ में सम्पन्न हुआ है । इतिहास और वास्तुकला के दृष्टिकोण से यह मन्दिर बुहत ही महत्पूर्ण है ।
राणा शासन के संस्थापक जंगबहादुर के समय में अन्तरगृही परिक्रमा सड़क भीतर के तालाबों का जीर्णोद्धार करवाया गया और संरक्षण के लिए बनाया गया नियम महत्वपूर्ण है । इन तालाबों में कपड़ा धोना, बरतन साफ करना, भैंस आदि को नहाना निषेध किया गया था । तालाबों में मछली मारना और तालाब के चारों तरफ लगे पेड़–पौधों पर बसे चिडि़या को मारना बहुत बड़ा अपराध माना गया । मछली और चिडि़या मारने वालों को अढ़ाई रुपया मोहर और देखकर शिकायत नहीं करने वालों को सवा एक रुपया मोहर जुरमाना करने का नियम बनाया गया था । जुरमाना से संकलित रकम का खर्च विवाह पञ्चमी, राम नवमी में आए साधु–सन्तों के सत्कार में खर्च करने का नियम बहुत ही महत्वपूर्ण है । जंगबहादुर द्वारा जारी किया गया यह कठोर नियम जनकपुरधाम का महत्व को बताता है ।
जनकपुर धाम को विश्व सम्पदा घोषित करना क्यों आवश्यक है ?
एक समय करोड़ से अधिक सनातन धर्मावलम्बी के आस्था का केन्द्र सीताजी का जन्मस्थल, क्रीड़ास्थली, विवाहस्थल आज रावण प्रवृत्ति के लोगों द्वारा अपहृत, अतिक्रमित हो गया है । इस पुण्य क्षेत्र को बचाने के लिए संरक्षित स्मारक क्षेत्र घोषित करना आवश्यक है । नेपाल के शासकों द्वारा पचास वर्ष से इसको लूटा जा रहा है । परिणामस्वरूप जनकपुरधाम एक छोटा सा शहर, बाजार जो नेपाल में सब से गन्दा और मच्छर का घर के रूप में परिचित हो गया है । जनकपुर धाम को धार्मिक पर्यटकीय क्षेत्र के रूप में विकास भारत सरकार के सहयोग के बिना असम्भव है । नेपाल और भारत सरकार द्वारा जनकपुर धाम और अयोध्या को भगिनी शहर के रूप में विकसित करने की आपसी सहमति हो गई है । जनकपुरधाम के मठ–मन्दिर, कुटी, तलाव और महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण करने में बहुत धनराशि की आवश्यकता है, जो नेपाल सरकार के आन्तरिक स्रोत, साधन से सम्भव नहीं है । विश्व सम्पदा सूची में सूचिकृत होने पर मित्र राष्ट्र भारत लगायत अन्य सदस्य राष्ट्रों को सहयोग करने के लिए आग्रह किया जा सकता है । जैसे हाल ही में वैशाख १२, १३ और २९ गते के महाभूकम्प और उस बीच के पराकम्प से क्षतिग्रस्त काठमांडू उपत्यका के विश्व सम्पदा में सूचिकृत सम्पदाओं के पुनः निर्माण के लिए मित्र राष्ट्र भारत, चीन, जापान, अमेरिका आदि राष्ट्रों ने प्रतिवद्धता जाहिर किया है । इस महाभूकम्प से जनकपुरधाम के विश्व प्रसिद्ध श्री जानकी मन्दिर की भी सामान्य क्षति हुई है । इस को अनदेखा नहीं करना चाहिए । नेपाल सरकार के पुरातत्व विभाग को जनकपुरधाम को विश्व सम्पदा में सूचिकृत करने के प्रयास में विलम्ब नहीं करना चाहिए ।

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