जनकपुर की दुर्दशा ! “मौका में चौका” वालों की चाँदी है : डा. मुकेश झा

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डा. मुकेश झा, जनकपुर , १२ नवम्बर | नेपाल सरकार अपना दाइत्व को किसी दूसरे ओर सरका कर आगे निकलने में माहिर है, संसार में विरले ही कोई भी देश इसमें नेपाल से आगे निकल सके। नेपाल में देश का हर कार्य विदेशियों के जिम्मे लगे हुए हैं। कार्य छोटा हो या बड़ा विदेशी लगानी, अनुगमन, नियमन निर्वाध रूप से चल रहा है और नेपाली सत्ता उसका माध्यम बना हुवा है।
एकाध क्षेत्र को छोड़कर किसी भी क्षेत्र को उठाकर देखें तो यह निश्चित तौर पर नहीं कह सकते की इस क्षेत्र में विशुद्ध नेपाली लगानी है और यह क्षेत्र पूर्ण रूप से नेपाल सरकार के पूर्ण स्वामित्व में किसी के सहयोग या कर्ज के बिना संचालित है। इसका फायदा नेपाल के सत्ताधारी और कर्मचारी खूब उठा रहे हैं। जैसे अगर पूर्वाधार विकास को ही लें तो उसमे सड़क नाला इत्यादि है। अगर सड़क को लें तो छोटा से छोटा और बड़ा से बड़ा सड़क किसी न किसी विदेशी अनुदान और परियोजना से जुडी है। विकास निर्माण का कार्य अगर विदेशी परियोजना समय पर नही करती जो की वास्तविकता है तो सरकार दोष उसी को देती है। सामान्य रूप से देखने में यह ठीक भी लगता है कि जिसने काम पूरा नही किया दोषी तो वही है। लेकिन जनता से कर तो सरकार उठाती है और सुविधा देने की बात विदेशी परियोजना के उपर है। यह कितना जिम्मेदारी पूर्ण बात है ? नेपाल सरकार की ढेर सारी योजनाएं नेताओं के क्षणिक लोभ और अदूरदर्शिता के कारण बलि बेदी पर चढ़ी हुई है। हरेक साल बड़ी बड़ी परियोजना में लगानी के नाम पर विदेशी के जिम्मे लगाना एक चलन सा बन गया है। बिभिन्न देश, विश्व बैंक, एशियाई विकाश बैंक का कर्ज जनता पर दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है लेकिन भौतिक पूर्वाधार विकास के नाम पर जो कार्य हो रहा है वह वीरवल की खिचड़ी हो गई है। मधेस का हुलाकि मार्ग और काठमांडू का मेलम्चि खाने पानी परियोजना जैसा ढेरों उदहारण दिए जा सकते हैं जिसमे सरकार ने बड़ी बखूबी से अपना दोष दूसरे पर मढ़ कर आगे बढ़ जाता है। यह कैसा न्याय है की सरकार कर तो नेपाल सरकार को दे और जनता के सुविधा के दाइत्व दूसरे पर?
 नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र के नेता और जनता जागरूक हैं, सत्ता भी बड़ी तदारुकता के साथ पहाड़ में पूर्वाधार निर्माण करने में ध्यान दे रही है परन्तु मधेस क्षेत्र की अवस्था बहुत ही विकट है। मधेस के इस अवस्था के लिए सरकार को ही जिम्मेवारी लेनी होगी न कि ए डी बी या विश्व बैकको। मधेस के सारे शहर की अवस्था एक सी है पर उसमे जो जनकपुर की जो दुर्दशा है उसका कोई जवाब नहीं। जनकपुर विकाश के लिये सिर्फ वृहत्तर जनकपुर में अरबो का बजट आया लेकिन अवस्था ऐसा है कि एक भी नाला पर ढक्कन नही है, पूरा शहर बदबू से बेहाल है। सरकार के बजट का पूरा उपयोग होना, समय पर काम पूरा करना, विदेशी लगानी को सुनियोजित तरीका से लगाना इन सब कार्य में तो पीछे है पर तरह तरह के सुविधा कर, सेवा कर और न जाने किस किस तरीके से जनता का पैसा लूटने में आगे है। नेपाल सरकार सुविधा या सेवा शुल्क लेता क्यों है यह समझ में नही आता। सड़क की अवस्था देखकर यह लगता है कि सड़क कर लेता क्यों है ? कर लेने में आगे और सेवा सुविधा में शून्य का एहसास दिलाने वाला निन्दित कार्य के लिए जनता के पास कोई शब्द नही है। राजनैतिक अस्थिरता का बहाना बनाकर जनताको लूटने और महल अटारी बनाने में व्यस्त उच्च स्तरीय निकाय के सरकारी कमर्चारी, नेताओं को जन आवाज सुनाई नही दे रही है। जनकपुर की अवस्था देखें तो पिछले बीस साल से जैसी थी वैसी है वल्कि कहें तो और भी गई गुजरी हो गई। जनकपुर में क्या नेपाल सरकार का कोई निकाय नहीं है जो व्यवस्था बना सके ? सारा निकाय है लेकिन सब के सब निकम्मे बने हुए हैं, भ्रष्ट और लोभी बने हुए हैं। सड़क, नाला, कूड़ा हर चीज के व्यवस्थापन का निकाय है परन्तु जनकपुर का सड़क नाला कूड़ा जैसा अस्तव्यस्त शायद ही कोई दूसरा शहर हो। इस में सरकार की और निकाय की कमजोरी तो है ही साथ में उस क्षेत्र की जनता की अपने शहर के प्रति उदासीनता भी है जिसके वजह से जनकपुर में “मौका में चौका” वालों की चाँदी है। जनकपुर में बड़ी मसक्कत के बाद एशियाई विकाश वैंक के सहयोग से अरबों का बजट से विकाश का कार्य पिछले एक साल से चल रहा है लेकिन कार्य कितना हुवा है वह जनकपुर दर्शन करने वालों को भी पता है फिर स्थानीय को नही हो ऐसी बात ही नही। इसमें भी अगर कार्य सही समय पर नही हुवा, गुणस्तरीय नही हुवा तो सरकार फिर से दोष इस परियोजना को ही देगी और अपना पल्ला झाडलेगी।
 अगर वास्तव में मधेस में पूर्वाधार विकाश को मूर्तरूप देना है तो स्थानीय वासी को आगे आना ही होगा, नगरवासी को जागरूक हुए बिना दूसरा कोई रास्ता नहीं है । जनमानस को उठना होगा और स्थानीय स्तर पर स्वतन्त्र रूप से अपना एक अनुगमन टोली निर्माण करना होगा जो सरकार द्वारा दी गई बजट और हो रहे काम पर नजर रखे जिस से बजट चट करने वालों को मौका न मिले।
 
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