जनकपुर की व्यथा

आज भी वही जनकपुर है जो पहले था । फर्क केवल इतना है कि पहले जनकपुर को सीता का जन्म स्थल, देव लोक का तपःस्थल, अष्टावक्र का ज्ञान भूमि के नाम से नमन किया करता था । आज यही जनकपुर में हिंसात्मक क्रियाकलाप, द्वन्द, उत्पीडन, विभेद, भ्रष्ट कुटनीति, पर्यटक की असुविधा, असुरक्षा की अनुभूति तथा प्रचार प्रसार के अभाव में यहाँ आने पर लोग डरते है ।

  • राज्य की विभेदी नीति और राजनीतिक दल के स्वार्थ जनकपुर चुरोट कारखाना बन्द कराने में सफल रही है जो एक समय में देश को सबसे ज्यादा टैक्स दिया करता था

  • ७५ प्रतिशत लोगाें के घर में पानी जम जाता है । अगर कड़ी धूप निकल जाए तो सड़कों पर श्वास प्रश्वास लेना कठिन हो जाता है । चापाकल में पानी का हाहाकार बच जाता हो इससे स्पष्ट है कि नेपाल के नमूना शहर के रूप में पर्यटकीय स्थल जनकपुर किस प्रकार विस्थापित होता जा रहा है ।

janaki temple
कैलाश दास
ऐतिहासिक धार्मिक स्थाल जनकपुर का अस्तित्व संकट में है । यहाँ का सौन्दर्य गायब होता जा रहा है । पहचान लुप्त होने की कगार में है । मन्दिर से बड़ा महल बना दिया गया है । भ्रष्ट राजनीति खेल के कारण जनकपुर का सौन्दर्य खत्म होता जा रहा है । मठ मन्दिरों पर पर्चा, पम्पलेट, पार्टिंयों के बैनर तथा ऊँची आवाज में भाषण दिया जाता है । जीर्ण सड़के है, नालियाँ गन्दगी से भरी है । सड़क के किनारे कटघरे लगाकर दुकान खोले गए हैं कहने का मतलव गाँव से भी बदतर है । सुअर और गायों ने सड़को पर अपना हुुकुमत जमा रखा है । कब, कहाँ दुर्घटना होगी कहना मुश्किल है । जिस प्रकार से धार्मिक संरक्षण के लिए ऐन कानून की आवश्यकता होती है, इसमें राज्य और पुरातत्व विभाग असफल रही है । क्योंकि एक धार्मिक पर्यटक नगरी के लिए जिस प्रकार की नीति, कानून और व्यवस्थापन होनी चाहिए थी, न तो राज्य ने इस बारे में किसी प्रकार की सोच बनाई है और न ही स्थानीय स्तर से प्रयास हुआ है ।
जनकपुर नगरपालिका देश की सबसे पुरानी नगरपालिका है । नगर के विकास में नगरपालिका की सबसे बड़ी भूमिका होती है । इसे उपमहानगरपालिका तो बना दिया है । टैक्स सभी नागरिको पर लाद दिया गया है किन्तु विकास का मामला बिलकुल शुन्य है ।
जबकि जनकपुर धार्मिक, ऐतिहासिक, समाजिक एवं सवल राजनीतिज्ञ में सफल रही है । इसके वावजूद भी इसकी स्थिति खस्ताहाल है । नेपाल में सम्पदा का धनी मानने वाला धार्मिक पर्यटकीय स्थल जनकपुर सभी के लब्जों पर होते हुए भी शर्मसार बनी हुई है । इस मुल्क में अगर कही भी रेल चली है तो वह जनकपुर है । सबसे बड़ा कारखाना रहा है तो यहाँ का ‘जनकपुर चुरोट कारखाना’ । राम जानकी का वैवाहिक स्थल जहाँ पर बिना निमन्त्रण के लाखों पर्यटक आते है वह जनकपुरधाम है । हिन्दु धर्मालम्बी की बात की जाए तो सबसे बड़ी आस्था का केन्द भी यहाँ का जानकी मन्दिर है । फिलहाल जनकपुर द्वार, स्वर्गद्वार तथा गंगा आरती की भी चर्चा किसी से कम नही है ।
यहाँ पाँव रखते ही भावविभोर और प्रफ्फुलित हो जाते हैं श्रद्धालुगण । विवाहपञ्चमी, जानकी नवमी, रामनवमी ऐसे दर्जनों उत्सव में गाँव—गाँव से लोग आते हैं और सीमा पर आते ही श्रद्धालुगण नमन ही नही मिट्टी का तिलक लगाया करते हैं । आज भी वही जनकपुर है जो पहले था । फर्क केवल इतना है कि पहले जनकपुर को सीता का जन्म स्थल, देव लोक का तपःस्थल, अष्टावक्र का ज्ञान भूमि के नाम से नमन किया करता था । आज यही जनकपुर में हिंसात्मक क्रियाकलाप, द्वन्द, उत्पीडन, विभेद, भ्रष्ट कुटनीति, पर्यटक की असुविधा, असुरक्षा की अनुभूति तथा प्रचार प्रसार के अभाव में यहाँ आने पर लोग डरते है ।
विश्व के किसी भी धार्मिक स्थलों पर घूमने की स्वतंत्रता, सुरक्षा व्यवस्था, रमणीय वातावरण, सड़के, नाले, पार्क, साँस्कृतिक, आदर्श, शिष्ट विचार, व्यापारियाें का व्यवहार, मठ मन्दिर की सरसफाई, पर्यटन बोर्ड की सक्रियता, सवारी साधन और स्थानीय गाइड पर्यटकों को मोहता है । किन्तु यहाँ पर इन सबकी कमी है ।
जनकपुर की धड़कन यहाँ का जानकी मन्दिर, राम मन्दिर, रंगभूमि मैदान, धनुषाधाम, रामजानकी मड़वा और सरसरोवर है । लोग यहाँ दानपुण्य करने आते हैं । नेपाल—भारत सहित के देशों का हिन्दु धर्मावलम्बियाें के लिए सबसे बड़ी आस्था का केन्द्र है यह । आर्थिक रूप में जनकपुर चुरोट कारखाना और जनकपुर रेलवे विकास का माध्यम था । अगर यहाँ पर यह दोनाें नहीं होता तो शिक्षा, राजनीति, खेलकूद का विकास सम्भव नहीं होता । देश में राजनीतिक परिवर्तन के लिए सबसे अग्रिम भूमिका खेलनेवाला तथा राष्ट्र को सबल राजनीतिज्ञ देने में यह भूमि सफल रही है । लोकिन आज उसी का अस्तित्व संकट में है और सभी अङ्ग बेखबर है ।
कहते हंै राजनीति परिवर्तन होने पर बहुत सारे सपने खिलखिला उठते हैं । विकास का द्वार, जनचेतना का माहोल, सांस्कृतिक संरक्षण, पर्यटन प्रबद्र्धन से लेकर सड़कें नाले, व्यापार व्यवसाय, शिक्षा, खेलकूद, नौकरी, कारोवार तथा विश्वपटल पर पहचान का सपना देखने लगता है जिसका मोहताज जनकपुर भी है । होना भी स्वाभाविक है क्योंकि यह माओवादी का जनयुद्ध स्थल, लोकतन्त्र के प्रथम राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव, गृहमन्त्री तथा उपप्रधानमन्त्री विमलेन्द्र निधि, डा. महेन्द्र मिश्र, महेन्द्र निधि, शाही काल का शेर ए धनुषा कहलानेवाला हेम बहादुर मल्ल की कर्मभूमि ही नहीं जन्म भूमि भी रही है । जिस पर आज गर्व होना चाहिए था, लज्जा बोध हो रहा है । सर उठने की जगह झुक गया है । इसलिए की विकास की जगह विनाश हुआ है । इस भूमि को सभी ने अनदेखा किया है ।
राज्य की विभेदी नीति और राजनीतिक दल के स्वार्थ जनकपुर चुरोट कारखाना बन्द कराने में सफल रही है जो एक समय में देश को सबसे ज्यादा टैक्स दिया करता था । उसे भी राजनीतिकरण, युनियनवाजी और निजी कारखाना को बढ़ावा देने के लिए हमेशा के लिए बन्द करवा दिया गया है । यहाँ तक की भौतिक संरचना भी खत्म होने लगी है । दूसरा छुक छुक कर चलने वाला कोयला इन्जन रेल भी छू..मन्तर कर दिया गया है । जानकी मन्दिर आने वाली सभी सड़कों की पहचान खत्म होती जा रही है । वैसे भी जनकपुर का पहचान, सौन्दर्य एवं संरक्षण सम्बद्र्धन में नेपाल सरकार और राजनीतिक दल का निवेश बहुत कम है । पड़ोसी मुल्क भारत के टिकमगढ़ की रानी वृषभानु ने करीब सवा सौ वर्ष पहले जानकी मन्दिर बनवाया था । युद्धशमशेर के पाला में भारत में शासन करे रहे अँग्रेज ने महोत्तरी के बिजलपुरा से लेकर जयनगर तक रेल सेवा सञ्चालन किया था । रुस सरकार के सहयोग में जनकपुर चुरोट कारखाना सञ्चालन में आया था । जनकपुर भीठामोड सड़क भारत सरकार ने ही बनवाया था । इतना ही नहीं यहाँ का मठ मन्दिर, सरसरोवर तथा धार्मिक स्थलों का संरक्षण सम्बद्र्धन और सौन्दर्यीकरण के लिए भारत सरकार ही रकम उपलब्ध कराती आयी है ।
फिलहाल अभी तक तराई÷मधेश से देश के सबसे बड़े पद पर धनुषा के ही राजनेता पहुँचे है । किन्तु उन्हें जनकपुर का विकास करने के लिए सोचने तक की फुर्सत नहीं हुई है । लोकतान्त्रिक नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव जब तक राष्ट्रपति पद पर आसीन थे तब तक अपनी जन्म भूमि भी स्मरण नही हुआ । अगर पूर्व राष्ट्रपति डा. यादव जी ने धार्मिक पर्यटकीय स्थल के नाम पर भी विकास के लिए पहल कर दिया होता तो जिस प्रकार से आज जनकपुर कुरूप बन रहा है उससे अवश्य बचाया जा सकता था । यह भी बात नही है कि धार्मिक स्थल के नाम पर राज्य का राजस्व कम आता है । वार्षिक कहा जाए तो एक अरब से ज्यादा पर्यटक से राजस्व आता है । कहते हैं ‘बडेÞ मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्लाह’ जब बड़े पद पर आसीन होकर कुछ नही कर पाए तो छोटे का क्या कहना ।
धनुषा के तत्कालीन और वर्तमान में भी सबसे जुझारु नेता के रूप में रामचन्द्र झा, विमलेन्द्र निधि, लिला कोइराला, रामकृष्ण यादव, चन्द्रमोहन यादव, शत्रुधन महतो आदि इत्यादि हैं÷रहे हंै । प्रायः सभी ने मन्त्री पद तक प्राप्त किया है । यह भी नहीं है कि उन लोगाें ने विकास नहीं किया है, किन्तु ‘वोट बैंक’ के रूप में मात्र । नेतागण को कहना है कि दो नम्वर प्रदेश की राजधानी के लिए अगर उपर्युक्त है तो जनकपुर ही है । कौन से विकास और आधार पर बोल रहे हंै यह प्रश्न जनता का होना वाजिब है ।
ऐसा भी नही है कि जनकपुर सक्षम नहीं है । मुल्क का राजधानी भी बना दिया जाए तो देश चला सकता है । किन्तु इसके लिए इच्छाशक्ति आवश्यक है । यहाँ पर राजनीतिक दल, राजनीतिकर्मी, मठ मन्दिर, पत्रकार, युवा क्लव और बड़े–बड़े व्यापारीगण तो हुए लेकिन सामाजिक अभियन्ता की कमी होने के कारण कोई निकाय सफल नही हो सकी । सभी ने अपने–अपने ढंग से मनमानी की है और करते आ रहे हंै ।
यहाँ का विकास किस प्रकार किया जाए यह चिन्ता का विषय सब के लिए है, परन्तु इच्छा शक्ति नही होने के कारण असफल रही है । असफलता की भी सीमा होती है, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है कि जहाँ पर लगातार एक घण्टा बारिश हो जाए तो सड़कों पर गंगा नदी की तरह पानी बहने लगता है । ७५ प्रतिशत लोगाें के घर में पानी जम जाता है । अगर कड़ी धूप निकल जाए तो सड़कों पर श्वास प्रश्वास लेना कठिन हो जाता है । चापाकल में पानी का हाहाकार बच जाता हो इससे स्पष्ट है कि नेपाल के नमूना शहर के रूप में पर्यटकीय स्थल जनकपुर किस प्रकार विस्थापित होता जा रहा है ।

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