जनकपुर – क्षेत्र नम्बर तीन निधि या महतो ! जबर्दस्त भिडन्त : डा.श्वेता दीप्ति

डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू |  चुनावी रणभूमि में सबकी आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है धनुषा का क्षेत्र नम्बर तीन जहाँ से दो दिग्गज आमने सामने हैं । राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल के अध्यक्ष मण्डल के सदस्य राजेन्द्र महतो और नेपाली काँग्रेस के नेता विमलेन्द्र निधि सभी अटकलों को विराम देते हुए फिलहाल एकदूसरे के सामने हैं । माना जा रहा है कि महतो की उम्मीदवारी को रोकने की पूरी कोशिश की गई पर महतो २०७० से की गई अपनी तैयारी को बरबाद होते नहीं देख सकते थे और इसलिए उनके फैसले से उन्हें कोई हटा नहीं पाया । काँग्रेस की वर्चस्व की जिद ने लोकतांत्रिक गठबन्धन पर रोक लगा दी । वैसे भी जीतने या हारने का मजा तब है, जब दो प्रतिद्वन्द्धी एक समान हों । पर इस क्षेत्र में सबकी दिलचस्पी इसलिए भी है कि यहाँ एक और पक्ष परदे के पीछे से सक्रिय है और वो है संजय टकला । संजय टकला जेल में है पर क्षेत्र में वर्चस्व ऐसा है कि उनके आशीर्वाद के बिना किसी भी पक्ष को कमजोर माना जा रहा है । और यही वजह है कि समर की शुरुआत से पहले महतो जी ने कोशिश की कि टकला का वरदहस्त प्राप्त हो जाय और अब कोशिश निधि जी ने भी की है । उड़ती सी खबर है कि अपनी गिरफ्तारी से नाराज टकला का झुकाव निधि जी की तरफ है और उसके पक्ष का वोट निधि जी के झोले में जाने वाला है । बावजूद इसके माना जा रहा है कि महतो जी की स्थिति मजबूत है तो कमतर निधि जी को भी नही. आँका जा सकता है । देखा जाय तो धनुषा का क्षेत्र नम्बर तीन प्रतिष्ठा का विषय बना हुआ है । संजय टकला के करीबी का मानना है कि उनकी गिरफ्तारी में महतो जी की भूमिका थी और उन्हें छुड़ाने की पार्टीगत कोई कोशिश नहीं की गई बल्कि उनकी गिरफ्तारी का फायदा महतो जी ने उठाने की कोशिश की और उसके क्षेत्र पर अपनी नजरें टिका दी । सर्लाही से हारने के बाद महतो जी का सारा ध्यान धनुषा पर केन्द्रित रहा और अब वो समय आया है जिसका इंतजार वो वर्षो से कर रहे थे ।

जनता में एक पक्ष ऐसा है जिसका मानना है कि उन्हें अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहिए था यहाँ वो भगोड़े साबित होंगे । पर यह कोई मजबूत वजह नहीं है किसी को किसी क्षेत्र से चुनाव न लड़ने देने की । कई नेता ऐसे हैं जो अपने क्षेत्र को छोड़कर अन्य क्षेत्रों से चुनावी मैदान में है । यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसे गलत नहीं कहा जा सकता । पर यह क्षेत्र इसलिए बहस में है क्योंकि यहाँ वर्षो. से निधि जी का वर्चस्व रहा है । अब देखना है कि महतो जी इस किले में सेंध लगा पाते हैं या नहीं ?
जमीनी हकीकत को देखा जाय तो जातिगत रुप से महतो का पलड़ा भारी नजर आ रहा है । वहीं दूसरी ओर जनता अपने पहले प्रतिनिधि के किए गए काम का लेखाजोखा निकाल रही है ऐसे में उनके पास उपलब्धि से अधिक शून्यता है जिसका असर मत पर जरुर पड़ेगा ऐसा माना जा रहा है । वैसे वर्तमान में राजर्षि विश्वविद्यालय की घोषणा कर इसका भरपूर फायदा उठाने की कोशिश में है पर जनता को बहलाना इतना आसान भी नहीं है । बात किसी हद तक सही है जिन्हें अवसर मिला कार्य करने का उसका परिणाम तो जनता जरुर देखना चाहेगी क्योंकि नेता अपने उसी उपलब्धि को लेकर जनता के समक्ष जाता है । ऐसे में जनकपुर के विकास से जुड़े कई आरोप प्रत्यारोप निधि जी पर लग चुके हैं । ऐसे में जनता उन्हें फिर से एक अवसर देना चाहेगी या दूसरे पक्ष को आजमाना चाहेगी यह तो जनता जनार्दन पर निर्भर करता है । वैसे हार जीत के कई अनदेखे पहलू होते हैं जिसका भरपूर असर परिणाम पर पड़ता है ।
दूसरी ओर महतो जी की राह भी आसान नहीं नजर आ रही क्योंकि जातिगत समीकरण और राजपा के समर्थन की लहर उनके पक्ष में है तो वहीं संजय टकला का प्रभावित मत उनके चुनावी राह में रोड़े अटका सकते हैं । महतो के चुनावी मैदान में आने की वजह से संजय टकला की पत्नी ने अपना नाम वापस ले लिया है क्योंकि जीतना असम्भव था । पर उनका हटना काँग्रेस के हक में जा रहा है यह माना जा रहा है । पर स्थानीय चुनाव में राजपा की जीत से महतो जी का मनोबल बढा हुआ है । परन्तु रास्ता आसान नहीं है यह तो मानना ही होगा और ऊँट किस करवट बैठता है इसका इंतजार करना ही होगा ।

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