जनता की दस्तक

जयप्रकाश अग्रवाल

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मन्दिर पर चढ़ते फूल, चादर चढ़ती दरगाहों पर ।
भूखा बचपन माँगे भीख, शहरों के चौराहों पर ।
हुई बहुत है चर्चा, अबतक हुआ बहुत है खर्चा,
कब होगा सच में कुछ, वञ्चित की आहों–चाहों पर ।

चमक–दमक बाकी केवल, सत्ता के गलियारों में ।
कराहता दुःखी बुढापा, गलियों के अंधियारों में ।
जाति–धर्म का भरा जहर, दिलों के टुकड़े–टुकड़े कर,
युवा भविष्य को बदल दिया, आतंकी–हत्यारों में ।

चीर खींचते दुःशासन, लाचार असुरक्षित नारी ।
पाँच बरस की बच्ची.की, सुने न कोई सिसकारी ।
गरीबी नहीं, मिटे गरीब, कोस रहे अपना नसीब,
सूनी आँखों में सपने, कब मिटेगी मक्कारी ।

मन के नेता कालों से, इनकी काली चालों से ।
सत्ता और दलालों से, भ्रष्टाचार–घोटालों से ।
कब इनसे पीछा छूटेगा, कब तिलस्म ये टूटेगा,
उन निवालों का हिसाब कब, छीने जो कंकालों से ।

वोट माँगने वालों, जनता को दबाब देना होगा ।
हर पाँच साल के बाद, अब हिसाब देना होगा ।
मिटाने होंगे भेद भाव, मिटाने होंगे सब अभाव,
हर सवाल सुनना होगा, हर जवाब देना होगा ।

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