जनता की परेशानी ज्यों की त्यों

शिवचन्द्र चौधरी:विभिन्न प्रकार के बाधा-अवरोध, उतार-चढÞाव और परिवर्तनों के प्रवाह को पार करता हुआ हिमालय की तलहटी में बसा हुआ देश नेपाल लोकतन्त्र से लेकर तथाकथित गणतन्त्र तक की यात्रा कर चुका है । राणातन्त्र, राजतन्त्र, लोकतन्त्र और अब गणतन्त्र के रुप में परिवर्तनों की आशा लगायी गयी, वह जस की तस रह गई, कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आता । जनता ने सुशासन की परिकल्पना की थी । लगा था, नियम कानून सरल हो जाएगा । र्सवसाधारण आसानी से अपने रोजमर्रर्ााी जरुरतों को पूरा कर सकेंगे । अड्डा-अदालत, मालपोत, नापी, कृषि, उद्योग, वन, बैंक, प्रहरी-प्रशान सहित गा.वि.स. से लेकर जि.वि.स. तक की उनकी कार्ययात्रा सुखद होगी । बिना जालझेल के सुगमतापर्ूवक उनका कानूनसम्मत काम हो जाएगा । परन्तु दर्ुभाग्य, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । आज भी उन्ही परम्परागत पंचायतकालीन फन्दों, जाल-झेल एवं ‘तर-तापनि’ के चक्कर में आम जनता परेशान है । विशेषतः तर्राई-मधेश अथवा दर्ुगम पहाडÞ के जिलों में जहाँ का आम जनमानस, किसान, मजदूर अनपढÞ है, अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति अनभिज्ञ हैं, उन लोगों को आये दिन अधिकांश कठिनाइयों का सामना करना पडÞता है । अगर रिश्वत -घूस) नहीं दें तो एक छोटे-से काम के लिए भी उन्हें कईर्-कई दिनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पडÞते हैं । nepal rastrabad
कहा गया है कि ‘प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्’ । अर्थात् जो तथ्य स्वतः स्पष्ट है, जिन्हें हम अपनी खुली आँखों से देख रहे हैं, उसके लिए भी प्रमाण सबूत प्रस्तुत करने की आवश्यकता पडेÞ, र्सर्ूय को र्सर्ूय और दीपक को दीपक कहालने के लिए प्रमाण देना पडेÞ तो इससे बडÞा दर्ुभाग्य क्या होगा – जी हाँ ! हम आज भी ऐसे लोकतन्त्र वा गणतन्त्र में जीवन बसर कर रहे हैं, जहाँ ‘तर-तापनी’ के जंजाल में ‘प्रत्यक्ष’ का भी प्रमाण देना पडÞ रहा है ।
उदाहरण के लिए सभी जानते है कि हम प्रकृति-प्रदत्त मधेशी हैं । हमारी मुखाकृति, हमारे नाक-नक्शे, हमारी वेश-भूषा, हमारा रहन-सहन तथा सामाजिक परम्परा अनुसार हम ब्राहृमण, क्षत्रीय, कायस्थ, यादव, कर्ुर्मी, कानु, साहू, महाजान, थारु, दनुवार, मुस्लिम, हरिजन आदि हैं । हम स्वाभाविक एवं नैर्सर्गिक रुप से मधेशी हैं । परन्तु मधेशी को मधेशी प्रमाणित कराने का भी वर्तमान व्यवस्था में एक संजाल है । गा.वि.स. सचिव लिखेगा कि ‘फलानो को नाति फलानो को छोरा फलानो व्यक्ति मधेशी रहेको व्यहोरा प्रमाणित गरिन्छ’ । फिर्रर् इलाका प्रहरी, जिला प्रहरी, और फिर जिला प्रशासन तय करेगा कि हम मधेशी हैं या नहीं – अर्थात् वही ‘लकीर के फकीर’ वाला कानून । कायदे से होना यह चाहिए कि राज्य अपने ‘राज-पत्र’ में अधिसूचित कर दे कि अमुक-अमुक जातियाँ मधेशी की श्रेणी में हैं । अधिकारी इस सूची को देखे और तत्क्षण लिखे कि हाँ ये मधेशी हैं । ये पचास जगह की भाग-दौडÞ का नाम ही क्या लोकतन्त्र है –
एक छोटा सा अन्य उदाहरण- आप का कोई उद्योग भीतरी मधेश अर्थात राजमार्ग स्थित राष्ट्रिय वन-जंगल से कोसों दूर की दूरी पर चल रहा है । उद्योग के लिए लाईसेन्स लेने के क्रम में आपको राष्ट्रिय वन-जंगल से उद्योग स्थल की दूरी प्रमाणित करवानी है । जि.वि.स. के रर्ेकर्ड में अथवा आधुनिक युग के ‘कम्प्युटर या लैपटाँप’ के जमाने में स्वतः स्पष्ट है कि अमुक स्थान से अमुक स्थान की दूरी इतनी है । सिर्फबटन दबाईए और देश या विदेश की दूरी पलक झपकते ही मालूम हो जाएगी । परन्तु, हमारे तथाकथित लोकतान्त्रिक वा गणतान्त्रिक नेपाल में आज भी दूरी प्रमाणित कराने के लिए समिति बनती है । जिला बन कार्यालयर्,र् इलाका बन कार्यालय को लिखेगार्,र् इलाका घरेलू को लिखेगा, नापी को लिखेगा । फिर तीनों एक जगह एकत्रित होंगे, उद्योगस्थल पर जाचेंगे, गा.वि.स. सचिव सहित दस स्थानीय लोगों का मुचुल्का खडÞा होगा, फिर प्रतिवेदन तैयार होगा र्।र् इलाका से प्रतिवदेन जिला बन कार्यालय जाएगा और तब जाकर दो पंक्ति का प्रमाणपत्र प्राप्त होगा, जिसमे लिखा होगा कि ‘गठित समिति को प्रतिवेदनको आधारमा राष्ट्रिय वन-जंगलबाट उक्त उद्योगको दूरी कम्तीमा १५ कि.मीं रहेको व्यहारोरा अनुरोध छ ।’ अर्थात् “खोदा पहाडÞ निकली चूहिया” यानी एक मिनट के काम के लिए एक सप्ताह की भाग-दौड, अनावश्यक खर्च और परेशानी । क्या यही है लोकतन्त्र –
ऐसे न जाने कितने अनुत्तरित उदाहरण और सवाल हैं । सत्ता-शासन में समानुपातिक भागीदारी का सवाल है । नागरिकता या पहचानपत्र के जालझेल का सवाल है । एक अत्यन्त ज्वलन्त समस्या है- ने.रु. और भा.रु. की । पता नहीं इस देश को क्या हो गया है – कौन से अंग को लकवा मार गया है – इसी देश में पहले दैनिक जरुरतों, शादी-व्याह, पढर्Þाई-लिखाई, औषधोपचार आदि के लिए भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में जाने के समय नेपाल बैंक लि. के सटही काउन्टर से आवश्यकता अनुसार ने.रु. को भा. रु. में बदल लिया करते थे । मगर आज अवस्था यह है कि इसके लिए आम जनता को प्रति सैकडÞा ५ से ८ रुपये तक की नाजायज रकम चुकानी पडÞती है । चन्द बिचौलिये मालामाल हो रहे हैं और सीमावर्ती इलाकों में बसनेवाली तर्राई-मधेश की जनता गहरी चुप्पी साधे हुए हैं ।
डरे हुए, सहमे हुए मधेश के मन में जो थोडÞी बहुत आजादी, थोडÞा बहुत लोकतन्त्र या गणतन्त्र का एहसास भी है, उसे खो जाने का खतरा मडÞरा रहा है । उसे लगता है कि-
फिर हमारी मधेश आजादी न कोई छीन ले
फिर हमारी हम से आजादी न कोई छीन ले
हर डगर पर खौफ कायम, हर शहर गमगीन है
क्या पता कब कौन किस के, अस्मतों को कीन ले
फिर हमारी हम से …
तन्त्र जनमत, मस्त नेता, हाले वतन की क्या कहे
इससे बेहतर है कि जालिम, उल्टी गिनती गिन ले
फिर हमारी हम से …
तार्त्पर्य यह है कि राज्य की नीति तो सदियों से विभेदकारी रही ही है । वे तो अपने धर्म और राजनीति के तहत ही पक्षपात करते ही आए हैं । परन्तु मधेश के इन तथाकथित मसिहाओं और जम्बो मन्त्रिमण्डल में मधेश की इतनी व्यापक भागीदारी को क्या कहें …. – क्या देश या मधेश में इसीतरह लोकतन्त्र की बयार बहती रहेगी, जिसमें आम जनसमुदाय का दम यूँ ही घुटता रहे … – परिवर्तन के इन संवाहकों की संवेदना को क्या हो गया है…. – सिर्फ अपनी झोली भरना ही क्या लोकतन्त्र हैं … – जनता जवाफ की प्रतीक्षा में है ।
-लेखक नागरिक समाज, र्सलाही के महासचिव हैं)

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