जनता के साथ धोखा !

पंकज दास

तीन महीना के लिए संविधान सभा की समय सीमा बढाए जाने के साथ ही अगले तीन महीनों की अग्रिम बुकिंग करते हुए जेठ १४ की मध्यरात के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रम को किसी भी कोण से शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है । तीन दलीय सहमति पत्र के आधार पर हुए पाँच सूत्रीय समझौते को एक बाध्यकारी व्यवस्था के बदले शाब्दिक गोलमोटोल में ही सिमट के रख दिया गया है । अपने ही द्वारा रखे गर्ए शर्त पर अडिग ना रहते हुए अचानक पीछे हटने वाले नेपाली कांग्रेस के सभापति सुशील कोइराला ने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर लोकतांत्रिक पद्धति के पैर पर ही कुल्हाडी दे मारी है । परिणामतः अगले तीन महीने के बाद इस देश में होने वाले दर्ुभाग्यपर्ूण्ा दर्घटना को कोई भी नहीं रोक सकता है । तत्काल के लिए तीन महीने की समय सीमा बढाए जाने के पूरे प्रकरण में यदि कोई सफल हुआ है तो वह है माओवादी की कुटिल रणनीति । यही कारण है कि इन तीन महीने में शांति प्रक्रिया का मूलभूत काम संपन्न करने का प्रस्ताव भी विशुद्ध रुप से माओवादी का ही है । हथियार व लडÞाकु को अलग करने की बाध्यात्मक अवस्था के निदान के लिए माओवादी द्वारा रची गयी प्रपंचकारी शब्दजाल में नेपाली कांग्रेस सहित अन्य दल बुरी तरह फंस गए हैं ।
संविधान सभा की बढÞायी गई समय सीमा के भीतर माओवादी और कुछ करे ना करे अपनी उच्चतम शक्ति संचय की योजना बनाई है । कांग्रेस सहित लोकतंत्र के पक्षधर रहे अन्य दलों द्वारा तीन महीने बाद शब्दों के जाल में फंसकर एक बार फिर सहमति समझौता कर आसानी से कार्यकाल बढÞाने में माओवादी का सहयोग करे तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । क्योंकि इस बार भी जिस जोर शोर के साथ नेपाली कांग्रेस ने उधार की सहमति पर हस्ताक्षर ना करने की घोषणा की थी । लेकिन माओवादी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है । वास्तव में देखा जाए तो इस पाँच सूत्रीय समझौते में कुछ भी नयाँ नहीं है जो माओवादी देने के लिए ना कर रहे हो और कांग्रेस की वह मांग पहले से ना हो ।
आर्श्चर्य की बात यह है कि सेना समायोजन जो कि शांति प्रक्रिया का एक अहम अंग है, उसके लिए लडÞाकुओं का र्रि्रुपिंग करने के लिए माओवादी ने दो महीने से भी कम का समय मांगा था तो फिर किस आधार पर उसके लिए उदार बनते हुए तीन महीने का समय दिया गया । जिसका कोई तुक नहीं है । संविधान का पहला मसौदा तैयार करने के लिए इसी तीन महिने के भीतर तैयार करने के लिए रखी गई शर्त और भी आर्श्चर्यजनक लगती है । संघीयता, शासकीय स्वरुप व निर्वाचन प्रणाली में सहमति होना काफी मुश्किल है । पृथक राजनीतकि सिद्धांत पर अडिग राजनीतिक सिद्धांत की पार्टियाँ ५ सूत्रीय सहमति को बाध्यकारी ना बनाने का रहस्य भी यही है ।
नेपाली सेना को समावेशी बनाने का मुद्दा भी एक नई व्रि्रोह को जन्म दे दिया है । मधेशी मोर्चा के द्वारा उठाए गए १० हजार मधेशी समुदाय के युवाओं को सेना में सामूहिक प्रवेश दिए जाने की मांग तो उस समुदाय के लिए फायदेजनक है लेकिन अन्य क्षेत्रों के जनजाति व आदिवासियों के लिए व्रि्रोह का आधार तैयार कर दिया है । जनव्रि्रोह की कार्यदिशा को तत्काल के लिए किनारा करने वाले माओवादी अप्रत्यक्ष रुप से इसकी तैयार कर रही है ।
राष्ट्रीय सहमति की सरकार के लिए प्रधानमंत्री का इस्तीफा भी कोई नयाँ नहीं है । झलनाथ की खुद की पार्टर्ीीे इसका औपचारिक निर्ण्र्ाापहले ही कर लिया था । अब तो यह सुनने में आया है कि माओवादी के साथ हुए गोपनीय समझौते को पूरा करने के लिए खनाल अपना वादा पूरा करते हुए माओवादी को ही सत्ता सौंपने की तैयारी कर रहे है । इसके लिए पूरी कार्यतालिका बना ली गई है । और संभवतः ३० जुन के आपसपास खनाल अपना पद छोडÞकर माअेावादी के हाथों सत्ता सौंप देंगे । इसमें कोई दो मत नहीं कि यह संभव भी हो जाए क्योंकि खनाल सरकार के गठन के बाद अब तक वही होता आया है जो कि माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड चाहते हैं । चाहे मंत्रालय बँटवारे पर हो या गृहमंत्रालय को लेकर चला विवाद । हर बार माओवादी ने अपनी मनमानी की है ।
इस बार भी ऐसा ही कुछ होने वाला है । कुछ दिनों तक शांति प्रक्रिया के काम में सक्रियता दिखाकर माओवादी द्वारा समय कम होने के बहाना बनाते हुए तीन महीने की और समय सीमा बढÞवाने में सफल होगी । उसके बाद के तीन महीने में भी कोई खास उपलबिध होगी इसकी संभावना बिलकुल कम है । ऐसे में यह समझौता या यूँ कहें कि बिना वहज संविधान सभा क सिमय सीमा बढÞाया जाना जनता के साथ धोखा है, जनादेश का घोर अपमान है, लोकतंत्र पर प्रहार है । और इसके खिलाफ नेपाली जनता को ही एक बार फिर जागना होगा और नेताओं के एकाधिकार रवैये के खिलाफ बिगुल फुँकनी ही होगी ।   िि
ि

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz