जनता दासता की जंजीर को तोड़कर राज्य व्यवस्था में भागीदारी चाहती है : सुरेश गुप्ता

नेपाली भाषा को देश का औपचारिक भाषा सावित करने के लिए अन्य भाषा को दबाने का प्रयास किया गया है । जबकि नेपाल का आधी से अधिक आवादी बाला मधेश का बोलचाल और संपर्क की भाषा हिन्दी ही रही है । अतः पंजीकृत संशोधन विधेयक में हिन्दी को कामकाज की भाषा के रूप मे उल्लेख करना आवश्यक है ।

सदियों से नेपाल में ब्राह्मण, क्षत्रीय और नेवार समुदायों का शासन रहा है । ये समुदाय सदियों से अन्य समुदायों को दबाकर रखती आयी है । जबकि आज मधेशी, पिछड़ावर्ग, मारवाड़ी, बंगाली, जैन, दलित, जनजाति किसी भी कीमत पर किसी खास जाति विशेष, वर्ग या समुदाय के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करते ।

सुरेश गुप्ता, काठमांडू २७ जनवरी |लोकतंत्र को व्यापक रूप से संस्थापित करने का तात्पर्य यह है कि देश की शासन व्यवस्था से एक भी नागरिक अपने को अलग महसूस न करे । नागरिक अधिकार की बहाली देश के कोने–कोने में बसे बूढे, जवान, महिला, पुरुष, मधेशी, आदिवासी जनजाति, पिछड़ावर्ग, मारवाड़ी, बंगाली, जैन, सिख, दलित सभी समुदायों के लिए समान रूप में हो । राष्ट्रीय पटल पर सभी समुदाय की पहचान हो और उनकी भाषा, वेशभूषा, संस्कृति और परम्परा को सम्मान मिले । कोई भी जात, जाति, समुदाय शासित और शोषित जिन्दगी जीना पंसद नहीं करना चाहते । शोषित की जिन्दगी का दूसरा नाम गुलामी है, दासता है और जनता दासता की जंजीर को तोड़कर राज्य व्यवस्था के संचालन में भागीदारी चाहती हैं । सभी को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि इक्कीसवीं सदी के मानव को चाहिए स्वतंत्रता । वे स्वतंत्रता हैं — वैयक्तिक स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता, भाषिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक स्वतंत्रता, क्षेत्रीय स्वतंत्रता आदि ।

सुरेश गुप्ता मारुती नन्दन टूर्स एण्ड ट्राभल्स प्रा.लि.के चेयरमैन हैं

नेपाल किसी एक जाति या समुदाय का देश नहीं है । यहां पहाड़ी इलाकों में इसी स्वभाव, रहन–सहन, जनजीवन के लोगों का बसोबास हैं । वैसे ही मधेश में उसी जनजीवन और रहन–सहन के लोगों का बसोबास हैं । पूर्वी और पश्चिमी पहाड़ी इलाकों तथा पूर्वी मधेश और पश्चिमी मधेशों में भी भाषिक एवं सांस्कृतिक समानता एवं असमानताएं हैं । हर क्षेत्रों में भी वहां के निबासियों का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि माने में आगे और पीछे हैं । सदियों से नेपाल में ब्राह्मण, क्षत्रीय और नेवार समुदायों का शासन रहा है । ये समुदाय सदियों से अन्य समुदायों को दबाकर रखती आयी है । जबकि आज मधेशी, पिछड़ावर्ग, मारवाड़ी, बंगाली, जैन, दलित, जनजाति किसी भी कीमत पर किसी खास जाति विशेष, वर्ग या समुदाय के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करते । देश में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक, राजनीतिक शोषण एवं विभेद को अंत कर शासन व्यवस्था के संचालन में सभी जाति, वर्ग, समुदाय की साझेदारी व भागीदारी ही समय की मांग है, मधेश जनआंदोलन का ध्येय है ।
मधेश का अपना इतिहास है । अपनी जमीं और आसमान हैं । अपनी भाषा, जीवन और संस्कृति हैं । अवधी, थारु, मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, राजवंशी, संथाली, मारवाड़ी, उर्दू, भाषा भाषी का यह भूमि है । नेपाल में सभी भाषाओं का अपना इतिहास हैं, संस्कृति हैं, स्वर हैं, संगीत हैं और भी सभी कुछ हैं । किन्तु देश में इन भाषाओं की झोली में सिर्फ उपेक्षा ही मिली है ।
नेपाल में चल रहे विभिन्न सामाजिक न्याय के आंदोलनों का एक हिस्सा भाषा आंदोलन भी है । नेपाल में सिर्फ एक भाषा नेपाली का दबदबा रही है । एकल भाषा के वर्चस्व और शासन के कारण अन्य भाषा को विकसित होने का अवसर ही नहीं मिला । कई–भाषा तो लोप होने के कगार पर हैं । नेपाली भाषा को देश का औपचारिक भाषा सावित करने के लिए अन्य भाषा को दबाने का प्रयास किया गया है । जबकि नेपाल का आधी से अधिक आवादी बाला मधेश का बोलचाल और संपर्क की भाषा हिन्दी ही रही है । अतः पंजीकृत संशोधन विधेयक में हिन्दी को कामकाज की भाषा के रूप मे उल्लेख करना आवश्यक है ।
इसी प्रकार मारवाड़ी, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, बज्जिका, मगही, सहित हिमाल और पहाड़ी इलाकों में बोली जाने बाली भाषाओं को भी काम–काज की भाषा के रूप में उल्लेख करना आवश्यक है । इसके साथ–साथ राज्य के हरेक अंगों में जनसंख्या के आधार पर मधेशी, जनजाति, दलित, अल्पसंख्यक, एवं धार्मिक समुदायों का प्रतिनिधित्व, भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं भाषिक एकरूपता के आधार पर स्वशासन के अधिकार सहित प्रान्त की स्थापना तथा नागरिकता की प्राप्ति जैसे मुद्दों में भी परिमार्जन की आवश्यकता है । दूसरी तरफ सदियों से मधेशियों का राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, भाषायी एवं सांस्कृतिक शोषण हुआ है । अतः इन सभी प्रकार के शोषणों से मुक्ति पाने के लिए एकजुट होकर हमे आगे बढ़ना है । इसी में हम सब की भलाई है ।
(सुरेश गुप्ता मारुती नन्दन टूर्स एण्ड ट्राभल्स प्रा.लि.के चेयरमैन हैं )

 

Loading...

Leave a Reply

1 Comment on "जनता दासता की जंजीर को तोड़कर राज्य व्यवस्था में भागीदारी चाहती है : सुरेश गुप्ता"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
wpDiscuz
%d bloggers like this: