जबतक मधेश विद्रोह नहीं करेगा तबतक रोचक कहानी सुनानेवाले ह्रिदेश और ओली जन्म लेते रहेंगें : कैलाश महतो

वेश्यायें भी सीमा तय करती है-सबसे नहीं बिकती

कैलाश महतो, परासी | “मेरा रुप ने कहीं का नहीं छोडा.., ऐसे गलियों में ला के मुझे छोडा कि घूघरु बाँध लिये ।” आजकल इस गीत ने अपना सुन्दर बाजार बना ली है । लोग बडे चाव से इस गीत का भिडिओ देखते सुनते हैं ।
“संभोग से समाधि की ओर” नामक पुस्तक में भगवान् रजनीश ने एक प्रतिक का प्रयोग किया है । शायद उनके खोज में एक वेश्या कल्पना करती है कि उसके सामने बाले मन्दिर के पवित्र प्रांङ्गन में कितना आनन्द होगा जहाँ भगवान् के पूजा में सन्त लिप्त रहते हैं । अगर वो गन्दी नहीं होती तो मन्दिर में भगवान् का दर्शन करने जाती । वहीं उस मन्दिर के पुजारी कहता है कि इस मन्दिर ने उसके जीवन के सारे आनन्द को उससे दूर कर दी है । उसके सामने बाले कोठी के तरफ इसारा करते हुए कल्पना करता है कि वह महिला, जो वेश्या कहलाती है, कितनी खुशकिस्मत है कि उसे शारीरिक आनन्द के साथ वैभव भी प्राप्त है ।
हकिकत यही होता है कि वेश्याएँ भी सीमा तय करती है । वो सबकी ग्राहक नहीं बनती । मगर कुछ नेताओं के लिए कोई सीमा नहीं दिख रही है ।
मधेश राजनीति के संसार में घटे एक अकल्पनीय घटना से मधेश हतप्रभ और आश्चर्यचकित है । लोग इसे रात का सपना समझ रहे हैं जो दिन में हकिकत नहीं हो सकता । मगर रात का देखा हुआ सपना भी सही होता है जिसे सिग्मण्ड फ्रायड, डीएच लॉ‘रेन्स जैसे मनोवैज्ञानिक व साहित्यकारों ने सावित ही किया है । फर्क सिर्फ इतना होता है कि बहुतेरे सपने लोगों को होश में याद नहीं आते । वही सपना मधेश को विपना में आश्विन दो गते को देखना पडा जब खबर यह आयी कि दशकों से मधेश के नामपर छुपछुपकर किसी की रखैल रहे मधेशी नेताओं ने खुलकर ही अपने वर्षों के अवैद्य पति को वैद्य बना लिये । दशकों से मधेश के नाम पर ब्रत रखने बाले, मधेशी के नामपर करवा चौथ करने बाले उन नेताओं ने जो मधेश से बगावत की है, मधेशियों के नाम का मंगलसूत्र फेकी है, वह कम साहस की बात नहीं है । वह एक किस्म की विद्रोह ही तो है जो समान्य अवस्था में लोग नहीं कर पाते ।
बेचारे करते भी क्या ? उनका क्या दोष है ? उन्होंने तो अपना धर्म निर्वाह किया है । एक न्याय भी किया है । कहते हैं न “जब प्यार किया तो डरना क्या ?” आखिर एक प्रेमिका कबतक छुपछुपकर अपने प्रेमी से प्यार करती ? जब तन और मन दोनों अपने प्रेमी को सौंप चुकी हो तो पति कहलाने बाले बेचारे निर्दोष प्राणी को अन्धेरे में रखना अच्छी बात तो थी नहीं । और वैसे भी कल्हतक तो मधेश की यह भूल ही रही थी कि उसने उसके वैश को नहीं समझा । उसके रुप को नहीं देखा कि वो मदमस्त हो गयी है । उसके वर्षों की चाल को नहीं भाँपा कि उसका लसपस कहीं और भी है । बस्, विश्वास कर लिया । घुमने को छुट दे दी । वो देर आये या सबेर, रात को आये या बेरात को । अन्धेरे में आये या उजाले में । समय पर आये या कुसमय पर । वो घर के दीवाल को तोडे या छत को फोडे, सब स्वीकार्य । आज भी मधेश उन्हीं गल्तियों को बार बार दोहरा तेहरा रहा है जात के नाम पर, सम्प्रदाय के नाम पर, पंडितों के नाम पर, मूलों के नाम पर, दलितों के नाम पर, अल्पसंख्यकों के नाम पर, हिन्दुओं के नाम पर और मुसलमानों नाम पर । मधेश जबतक ठोस निर्णय नहीं लेगा, तबतक फिर एक उपेन्द्र यादव पैदा होगा यह कहते हुए कि नेपाल में मधेश है ही नहीं । जबतक मधेश अपने स्वभाव को नहीं बदलेगा, तबतक रोचक कहानियाँ सुनाने बाले दर्जनों ह्द्येश त्रिपाठी जन्म लेते रहेंगे । जबतक मधेश हिम्मत नहीं करेगा, तबतक ओली जैसे किसी का घर बिगारने बाला नेपाली शासक उत्पादन होता रहेगा । तजबक मधेश विह द्रोनहीं करेगा, तबतक उसे मधेश को बिहार और यूपी में ही खोजना पडेगा ।
कल्हतक मधेश के नेता रहे चरित्रहीन लोग मधेश से भागकर किसी नेपाली का हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । उन्होंने वही किया है जो उन्हें करना चाहिए था । बेचारे किस मोह से वे मधेश के होकर रहें जिनके अपने तन और मन के साथ साथ उसके नाता गोता, अन्दर बाहर, नीचे उपर तथा सपना विपना सब कहीं और है किसी और का ? इसिलिए अभिभावकों को हमेशा इस बात का खयाल रखना चाहिए कि अपने औलादों का जहाँ वे सम्बन्ध जोडना चाहते हैं, वह टिकाउ होगा या नहीं ? अपने औलाद का भी एक्सरे कर लेना ही बुद्धिमानी होगी । नहीं तो इज्जत के नाम पर बेइज्ज होना तय होता है ।
मधेश को एक और गहन बात मानना होगा कि मधेशवादी कहलाने बाले सारे के सारे नेता इस बात से वाकिफ हैं कि वे बेचारे संघीयता का मुद्दा ही उठाकर फँस चुके हैं । इसिलिए तो झलनाथ के सरकार में जाने के लिए मधेश आन्दोलन का सर्वोच्च नेता उपेन्द्र यादव ने कहा था, “नेपालमा मधेश नै छैन ।”
अब यह साबित करने की आवश्यकता नहीं कि एकाध मधेशी नेतृत्व के आलावा मधेश के मुद्दों पर ताल ठोककर बात करने बाला कोई है । जिन मधेशी नेतृत्वों से कल्ह नेपाली राजनीति घबराता था, आज वह धमकी देने लगा है । एक तरफ मधेशी नेतृत्व जो कहता है, उसके ठीक विपरीत नेपाली राजनीति करती है । उसने नेपाल के अन्तरिम संविधान के सारे मधेशी प्रावधानों को निरष्त कर अपना संविधान बना ली । सैकडों मधेशियों को हत्या कर आन्दोलनकारी मधेशी पार्टिंयों के मतों ही से राष्ट्रपति बना ली । संविधान को नहीं मानने बाले मधेशी नेतृत्वों से चार चार प्रधानमन्त्री बनवाकर सारा पाँच वर्ष की सरकारें चला ली । मोर्चा में रहे पार्टिंयों को खण्ड खण्ड कर दी, एक को दूसरे के विरोध में खडा कर डाला । क्या कर लिए मधेशी दलों ने ? उपेन्द्र ताली पिट रहे होंगे राजेन्द्र मिठाई बाँट रहे होंगे । गच्छेदार नाता ढुँढ रहे होंगे । मधेशी पार्टी द्वारा चुनाव बहिष्कार करने के बावजुद राज्य ने चुनाव कर ली । न चाहते हुए भी राजपा को चुनाव में जाने को बाध्य कर डाली । मधेश के स्वीकृति बगैर संविधान को कार्यान्वयन कर ली । देखते देखते मधेश के नेताओं का नेतृत्व गमन कर ली ।
जानकर ताज्जुब होगा कि अब मधेशी नेतृत्व कुछ कर भी नहीं सकते । क्योंकि उन्हें मधेश के लिए कुछ करने के काबिल छोडा ही नहीं गया है । सरकार में पहुँचा पहुँचाकर भ्रष्टाचार, घुसखोरी और अनियमितता के रंङ्गों में इतने गहरे ढंङ्ग से रंङ्ग दिए गये हैं कि वे सत्य बात बोल ही नहीं पायेंगे । बोले तो गये काम से । अब वही उनकी जीवन है । प्राथमिक कक्षाओं में बच्चें एक कविता पढते हैं,
“मछली जल की रानी है, जीवन उसकी पानी है ।
हाथ लगाओ डर जाती, बाहर निकालो मर जाती ।।”
बस्, मधेशी नेतृत्व मछली सी ही नेपाली राज्य और उसके सत्ता जल के परिधियों में ही जी सकती है । बाहर निकलने की साहस की कि बेमौत मारे जायेंगे ।
अब इराक के कुर्दिस्तान और स्पेन के क्याटेलोनिया में हुए सेप्टेम्बर २५ और अक्टूबर १ के जैसे ही जनमत संग्रह का ऐलान करना होगा । कुर्दिस्तान और क्याटेनिया में कराये गये जनमत संग्रह के विरुद्ध रहे इराक और स्कटिश सरकार और अन्तर्राष्ट्रिय कुछ असहमति के बावजुद जनता ने भारी संख्या में जनमत संग्रह के निर्वाचन में भाग लेकर क्रमशः ९०% और ९२% की जनमत से स्वतन्त्रता की चाह रखी है । उसे अन्तर्राष्ट्रिय मान्यता मिलना तय है । मधेश की जनता को भी शान्तिपूर्ण जनमत संग्रह का ऐलान कर मधेश की आजादी प्राप्त करने की वैधानिक अधिकार है जिसे दुनियाँ की कोई ताकत नहीं रोक सकती ।
देखें कुर्दिस्तान और क्याटलन जनमत संग्रह का नतीजा ः
कुर्दिस्तान, इराक

Voter turnout 72.16 percent

1. Voter turnout was 72.16 percent, the election commission has announced.

2. Of 4,581,255 eligible voters, 3,305,925 cast ballots.  ‐Shirwan Zirar, commission spokesperson said in a press conference Monday evening._

3. Eligible voters :– 3,985,120 ‐in the Kurdistan Region and Kurdistani areas_

  1. 497,190 displaced from disputed areas and living in camps in the Kurdistan region, and 98,945 from the diaspora.

    5. In the lead up to the referendum, the commission had stated 5,338,000 people were eligible to vote

क्याटेलोनिया, स्पेन

The Catalan self-determination referendum on October 1st, 2017 :

  1. Approximately 90Ü of the votes casted in favor of independence.
  2. Nearly 8Ü percent of voters rejected the independence.
  3. Rest of the ballots were blank or void.
  4. 2.26 million people took part in the referendum
  5. Of a total voter pool of approximately 5.34 million, which represents a turnout of 42 percnt.
  6. The abstention rate was 58 percent.

देश, नेता, समाज, मालिक और परिवारों को सेवा करने बाले सेवक मधेशी दिन व दिन गरीब, कंगाल, दरिद्र और बेहाल होते जा रहे है । वहीं जनता मात्र के सेवा के लिए राजनीति करने बाले मधेशी और नेपाली दोनों नेतागण अरबपति बनते जा रहे हैं । सबका भरण पोषण मधेश से ही होता है । मधेशी सम्पूर्ण समाज को अब निर्णय करना होगा कि नेपाली राज्य उसे हक तथा अधिकार सम्पन्न, सुरक्षा सम्पन्न, शिक्षा सम्पन्न, रोजगार सम्पन्न, कृषि सम्पन्न, व्यापार सम्पन्न बना सकता है या आजाद मधेश– अपना देश ?

 

 

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