जबरन चुनाव हुआ तो आक्रोश की चिंगारी पराकाष्ठा में पहुंचेगी : सुरेन्द्र महतो

Surendra mahatto

चुनाव बंदूक की नाल पर भी करबाया जा सकता है जैसे राजा ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल में हुआ था । उस समय मधेश में वोटिंग हुआ था और वोटिंग का अनुपात भी ज्यादा था । इसका अर्थ यह नहीं कि वहां की जनता राजा को मानती हैं । आज मधेश में चुनाव करबाया जाता है, तो कथित बड़ी पार्टियां भाग लेंगी । अच्छे ढंग से वोटिंग भी होगा । लेकिन उससे जो उत्पादन होगा वह ज्यादा भयानक होगा । इसलिए बहरहाल जरुरी है कि मधेशी व जनजाति पार्टियों की सहमति से चुनाव करवाया जाए ।

सुरेन्द्रकुमार महतो, काठमांडू,१९ फरवरी | २०७२ आश्विन ३ गते नेपाल का संविधान जारी हुआ । संविधान जारी होने से पूर्व, जारी के समय और जारी के पश्चात् की परिस्थितियों को अनुशीलन किया जाय, तो मुल्क में चारों ओर कोलाहल की स्थिति छायी हुई थी । पहाड़ी इलाकों में अपनी मांगे स्थापित कराने हेतु जनजाति विरोध में उतरे थे । उधर मधेश में मधेशी, दलित, पिछड़ावर्ग, जनजाति आदि समुदाय संविधान के विरोध में आंदोलनरत थे । आंदोलन के दौरान सरकार द्वारा दमन किया जा रहा था । नारा, जुलुस करने में प्रतिबन्ध किया जा रहा था । आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसायी जा रही थीं । अश्रु गैस छोडेÞ जा रहे थे । खासकर जिस दिन सरकार द्वारा संविधान जारी किया गया उसी दिन बीरगंज में एक मधेशी सपूत को हत्या की गयी । ऐसे हालात में तत्कालीन सरकार ने देश की आधी आबादी की आवाजों को दरकिनार कर जवर्दस्ती संविधान जारी किया । गौरतलब है कि इतने विरोध के बावजूद दुनिया के किसी भी मुल्क में संविधान जारी नहीं किया गया है ।
मधेशी, आदिवासी जनजाति, दलित, पिछड़ावर्ग आदि समुदायों की असंतुष्टियों को संबोधन करने के लिए २०७२ फागुन १६ गते संविधान में पहली बार संशोधन किया गया । जिसके तहत राज्य के सभी अंगों में समानुपातिक समावेशी तथा जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व की गारंटी की गयी थी । जबकि नये संविधान में इन व्यवस्थाओं को हटा दी गयी । दूसरा संशोधन बिधेयक २०७३ अगहन १४ गते संसद सचिवालय में पंजीकृत किया गया । इस विधेयक में मधेशी व जनजाति पार्टियों की जो जायज मांगें प्रस्तावित की गयी हैं, वे सारी मांगें संबोधन नहीं हो रही हैं । खासकर सीमांकन के संबंध में आरंभ में ‘एक मधेश एक प्रदेश’ की बात उठायी गई थी । यह संभव न होने पर दो प्रदेश की बात उठाई गयी । लेकिन दो प्रदेश की मांगें नहीं मानी गयी । फिलहाल मधेश को छह प्रदेश में विभाजित कर दिया गया है । अतः सीमांकन संबंधित मुद्दे को मौजूदा संशोधन बिधेयक में घनीभूत रूप में विमर्श कर शीघ्रताशिघ्र सुलझाया जाए ।
मौजूदा संशोधन विधेयक द्वन्द्व व्यवस्थापन का एक अच्छा अवसर है । यह विधेयक परिमार्जन सहित पास हो जाने से मधेशी व जनजाति पार्टियों की असंतुष्टियां अंत हो जाएंगी । मधेशी, जनजाति, पिछड़ावर्ग, दलित आदि समुदाय इस संविधान को अपना संविधान होने का महसूस करेंगे । देश का एक बड़ा लोकतांत्रिक संविधान होगा । देश विकास के पथ पर आगे बढेगा । अगर मौजूदा संशोधन विधेयक को नजरअंदाज कर जबरन स्थानीय चुनाव करवाया जाता है, तो आधी आबादी के आक्रोश की चिंगारी पराकाष्ठा में पहुंचेगी । ऐसी स्थिति में यह देश उनका है ही नहीं, अपना राज्य ढंूढ़ने वाली भावना पैदा हो सकती है । परिणामतः देश निरंतर भंवर में फंसता चला जाएगा । फल सभी को भुगतना पडेगा ।
चुनाव देश का मेरुदंड है । चुनाव होना चाहिए और करवाना भी चाहिए । बशर्ते कि चुनाव में सभी की भागीदारी होनी चाहिए । चुनाव बंदूक की नाल पर भी करबाया जा सकता है जैसे राजा ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल में हुआ था । उस समय मधेश में वोटिंग हुआ था और वोटिंग का अनुपात भी ज्यादा था । इसका अर्थ यह नहीं कि वहां की जनता राजा को मानती हैं । आज मधेश में चुनाव करबाया जाता है, तो कथित बड़ी पार्टियां भाग लेंगी । अच्छे ढंग से वोटिंग भी होगा । लेकिन उससे जो उत्पादन होगा वह ज्यादा भयानक होगा । इसलिए बहरहाल जरुरी है कि मधेशी व जनजाति पार्टियों की सहमति से चुनाव करवाया जाए ।
फिलहाल तर्क किया जा रहा है कि संविधान में दर्ज समय–सीमा के भीतर अगर चुनाव नहीं करवाया जाए, तो मुल्क में भयानक संकट की स्थिति पैदा होगी, देश ध्वस्त हो जाएगा आदि, इत्यादि इत्यादिक । मौजूदा हालात को लेकर जितना तर्क किया जा रहा है, जितना विमर्श हो रहा है, जितनी बहस चल रही है मेरे ख्याल से र्वैसा नहीं होगा । क्योंकि मौजूदा संविधान रहेगा, संविधान के अस्तित्व पर कोई प्रश्न नहीं उठेगा । सरकार भी रहेगी । लेकिन सदन नहीं रहेगा । ऐसे हालात में अध्यादेश के जरिये चुनाव संबंधित कानून बनाकर प्रांत का चुनाव करवाया जा सकता है । परन्तु इसके लिए सहमति की आवश्यकता होगी । क्योंकि संविधान एक राजनीतिक दस्तावेज होता है । संविधान व कानून में किसी समस्या का हल नहीं होने पर राजनैतिक तौर पर हल किया जा सकता है । कभी–कभार संविधान व कानून से ऊपर होती है — राजनीति । इस प्रकार राजनैतिक सहमति से किसी भी समस्या को समाधान किया जा सकता है ।
(सुरेन्द्रकुमार महतो अधिवक्ता हंै ।)

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