जब, अनिश्चितता में हो, राजनीति ! …

जब, अनिश्चितता में हो, राजनीति ! …
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ग‌गेश   मिश्र

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एक के बाद एक,
धराशायी होते,
आदर्श के,
प्रतिमानों को देख;
व्यथित होती धरा,
विवश हो, पुकारती है;
कहाँ है, निष्ठा ?
सदाचार और नैतिकता ?
ओह ! कितनी अकेली हूँ, मैं।
उदासी ही नियति है,
राज ने, छोड़ी नीति है;
बस, अनीति ही अनीति है।
गुज़रे ज़माने में,नैतिकता !
सर्वोपरि हुआ करती थी;
जो आज,
किसी कोने में दुबकी;
अपने हाल पर,
आँसू बहाया करती है।
निष्ठा कहीं दिखती नहीं,
सदाचार ! लाचार है,
रक्त पिपासु, नरभक्षी का,
चहुँओर बोलबाला है,
क्या, पता ?
अब, क्या होने वाला है ?
जब,
अनिश्चितता में हो, राजनीति !!!

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