जब भाग्य में अंधेरा, तो शहर किसके लिए था, जब धूप थी किस्मत तो सजर किसके लिए था|गुल्जारे अदब की गजल गोष्ठी

गुल्जारे अदब की मासिक गजल गोष्ठी
2नेपालगन्ज,(बाके) पवन जायसवाल,२०७२ असोज २ गते ।
गुल्जारे अदब की मासिक गजल गोष्ठी शनिवार असोज २ गते बा“के जिला के नेपालगन्ज त्रिभुवनचौक पूर्वलाइन स्थित महेन्द्र पुस्तकालय में सम्पन्न हुआ है ।
उर्दू साहित्यकारों की सहभागिता रही मासिक गजल गोष्ठी में नेपालगन्ज के वरिष्ठ पत्रकार पन्नालाल गुप्त के प्रमुख आतिथ्य में, मौलाना नूर आलम मेकरानी के अध्यक्षता में मासिक गजल गोष्ठी सम्पन्न हुआ है ।
कार्यक्रम में नेपालगन्ज के उर्दू साहित्यकारों की सहभागिता में ‘खोया हुआ मैं शामी शहर किस के लिए था, मालूम नही दिदाऐ तर किस के लिए था’ मिश्ररा पर गुल्जारे अदब के अध्यक्ष अब्दुल लतीफ श्ँौक, मोहम्मद अमीन ख्याली, सचिव मोहम्मद मुस्तफा अहसन कुरेशी, अवधी सा“स्कृतिक विकास परिषद् बा“के जिला के अध्यक्ष सच्चिदानन्द चौबे, मोहम्मद यूसुफ आरफी, सैयद् असफाक रसूल हाशमी, मौलाना नूर आलम मेकरानी, जमील अहमद हाशमी, मेराज अहमद ‘हिमालय’, नसीम अहमद ‘नसीम’, लगायत लोगों ने अपना अपना शैर वाचन किया था ।
इसी तरह कार्यक्रम में अमरलाल सोनी, बिजय कुमार चौबे लगायत लोगों की सहभागिता रह िथी, गलज गोष्ठी की आयोजन गुल्जारे अदब ने हरेक महीने के अन्तिम शनिवार के दिन करते आ रहा है अदब के सचिव मोहम्मद मुस्तफा अहसन कुरेशी ने जानकारी दी है ।
कार्यक्रम में अवधी सा“स्कृतिक विकास परिषद् के अध्यक्ष सच्चिदानन्द चौब शैर वाचन किया था ……………

जब भाग्य में अंधेरा, तो शहर किसके लिए था
जब धूप थी किस्मत तो सजर किसके लिए था
हक की लडाई लोग हैं, शदियों से लड रहे हैं
सत्य की डगर की डगर पे, तो डर किसके लिए
चलते ही जा रहें हो, मञ्जिल का नहीं छोर
मञ्जिल ही जब पता नहीं, तो सफर किसके लिए
संयम, नियम, पूजा, इबादत कर नहीं सका
जब काहिली बदन में थी तो नजर किसके लिए
रहते हुए यहा“ पे, पुस्ता गुजर गए
यक घर न बनासका तो नगर किसके लिए था
जिस मुल्क में अपने हृदय की कहन सके बात
उस मुल्क में अब तक का वसर किसके लिए था
बिष के बुझाए खञ्जर, चुभाते हो रात दिन
तो फिर मिलावटी ए जहर किसके लिए था
‘आनन्द’ से न उड सकें परिन्दें आकाश में
कतरे हैं जिससे पंख वो शेर किसके लिए था ।
नेपालगन्ज–२, बाके के उर्दू साहित्यकार मेराज अहमद ‘हिमालय’ ने शैर वाचन किया था ………………………………………..
खोया हुवा मैं शामी शहर किस के लिए था
मालूम नही दिदाए तर किस के लिए था
अन्जामे मोहब्बत से परेशान बहोत था
रहे रहै के उठा दर्दे जिगर किस के लिए था
बे मौत जो मर जाते नजरों से तुम्हारी
आ“खों से जो टपका वो जहेर किस के लिए था
ये जान भी हाजीर इसे प्यार से मा“गो
ये तेग औ तलवार तबर किस के लिए था
बिमारे मोहब्बत हूं मै आगोश में ले लो
जब धूप थी किशमत तो सजर किस के लिए था
आ“खों मे सजाकर के यू“ बदनाम ना करना
पाकीजा मोहब्बत का सभर किस के लिए था
मेराज भी हाजीर है, इसे प्यार से देखों
ये चश्मा“ए, अन्दाजे शरर किस के लिए था

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