जब मानवता और नैतिकता दोनो एक साथ रो पडीं

   गजेन्द्रबाबू की मौत पर मछली-दारू की मस्ती
रामाशीष:२४ जनवरी २००२ को, नेपाल में नवनियुक्त भारतीय राजदूत डा. आईं पी. सिंह, अर्थात नेपाल में जाना सुना नाम डा. इन्दुप्रकाश सिंह जी का पहला प्रेस भेंट कार्यक्रम था । मैं आकाशवाणी के नेपाल स्थित प्रतिनिधि रामसागर शुक्ल के साथ रिपोर्र्टर्स क्लब पहुंचा था । वहीं पता चला कि गजेन्द्र बाबू अब नहीं रहे । राजदूत डा. सिंह ने भरे गले से कहा ‘हमने आज न केवल एक हितचिन्तक खोया है अपितु आज नेपाल-भारत मैत्री का एक बहुत बडÞा स्तंभ धराशायी हो गया है । आज भारत के एक बहुत ही बडÞे gagenहितचिन्तक का अन्त हो गया है, एक महान त्यागी चिन्तक का अन्त हो चुका है । यह अपूरणीय क्षति है न केवल नेपाल के लिए अपितु भारत के लिए भी ।’
यह सुनते ही हम सभी भारतीय पत्रकार शान्तिनगर स्थित नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीे केन्द्रीय कार्यालय पहुंचे । देखा अस्पताल से ही लाए गए एक स्ट्रेचर जमीन पर रखी पडÞी थी, जिस में गजेन्द्र बाबू चीर न्रि्रा में विलीन थे । स्ट्रेचर के निकट ही बैठे थे ‘गजेन्द्र बाबू को कदम-कदम पर नीचा दिखाते रहनेवाले पार्टर्ीीांसद हृदयेश त्रिपाठी । और, प्रखर भारत विरोधी एवं पाकिस्तान र्समर्थक एक दाउदी स्वर्ण्र्ााकर साहूकार, जिनके साथ त्रिपाठी, ‘समधी जी-समधी जी’, कहकर चोंच में चोंच मिलाते हुए चहक रहे थे । वहीं एक अन्य कर्ुर्सर्ीीर विराजमान थे- तत्कालीन पार्टर्ीीपाध्यक्ष बद्रीप्रसाद मंडल । उनमें से किसी के भी चेहरे पर शोक की छाया तक नहीं थी । एक सामान्य शव को देखकर भी किसी भी आदमी का चेहरा एक क्षण के लिए मलीन हो जाता है, जबकि मानवता के नाते भी उक्त तीनों की आंखें न तो नम हर्ुइ थीं और न ही उनकी आखों में ‘घडिÞयाली आंसू’ की बूंदें ही थीं ।
मैंने जाते ही कहा ‘आपलोगों को दो-चार फूल भी नहीं मिले गजेन्द्र बाबू के शव पर चढÞाने के लिए – क्या, आपलोगों ने धूप-अगरबत्ती की कुछ तिल्लियों की व्यवस्था भी नहीं की -‘ मैंने तुरन्त वहां पहुंचे किसी मोटर साइकिल वाले मित्र का साथ लिया और शान्तिनगर से न्यू रोडस्थित मेची किराना स्टोर पहुंच गया । वहां से हवन सामग्री के कुछ डब्बे खरीदे और लौटते वक्त अपने डेरे से भागवत पुराण का एक कैसेट ले लिया । मैंने शान्तिनगर पहुंचकर पार्टर्ीीार्यकर्ता मंजू अन्सारी से कहा क्या आपके पास कैसेट प्लेयर है – उन्होंने कहा, हां है । और, वह तुरंत अपने निवास से कैसेट प्लेयर ले आयीं । मैंने कुछ फूल चढÞाया और अगरबत्ती तथा हवन सामग्री के धुंए से वातावरण को पवित्र किया । कैसेट पर गीता पाठ प्रारंभ हो गया । ‘रघुपति राघव राजा राम’ के भजन भी सुनायी देने लगे ।
दूसरे दिन, अर्थात् २५ जनवरी को, सुबह नौ बजे के लगभग मैं काठमांडू के टुंडिखेल मैदान शहीद मंच पहुंचा, जहां गजेन्द्र बाबू का शव अन्तिम दर्शन के लिए रखा गया था । पार्टर्ीीपाध्यक्ष बद्रीप्रसाद मंडल ने शवयात्रा में मुझे भी शामिल होने के लिए राजबिराज चलने को कहा । कुछ ही समय बाद अर्थी को त्रिभुवन हवाई अडडे पर लाया गया और हेलिकाप्टर में रखा गया । सरकार की ओर से सूचना मंत्री जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता शवयात्रा में शामिल थे । पार्टर्ीीार्यकर्ता सरिता गिरी, गजेन्द्र बाबू की शोक सन्तप्त पत्नी आनन्दी देवी का सिर अपनी गोद में लिए, उन्हें सांत्वना दे रही थीं । हेलिकाप्टर उडÞा और कुछ ही समय में राजविराज के आकाश में पहुंच गया । आसमान से जब राजविराज को देखा तो लगा राजविराज के लोग ही नहीं अपितु वहां की मिट्टी और पेडÞ-पौधे तक शोक संतप्त एवं मूक खडÞे थे । राजविराज के सभी वर्ग के लोगों की अश्रूपूरित आखें अपने प्रिय नेता को शांत श्रद्धांजलि दे रही थीं । शवयात्रा, नगर परिक्रमा का रूप ले चुकी थी । ‘गजेन्द्र बाबू – जिन्दावाद’ के नारे से राजविराज का आकाश गूंज रहा था । सभी के मुंह से एक ही वाक्य निकलता था- अब राजविराज वीरान हो गया । अब इस धरती पर देश-विदेश के नेताओं, राजनेताओं और राजदूतों का आगमन सपना हो जाएगा ।
नगर परिक्रमा के बाद शवयात्रा सप्तरी सेवाश्रम पहुंची, जो गजेन्द्र बाबू की राजनीतिक तपस्या स्थली थी । आश्रम पर उपस्थित हजारों की संख्या में जनसमुदाय ने मौन श्रद्धांजलि के साथ गजेन्द्र बाबू को अन्तिम विदाई दी । देश की रक्षा पंक्तियों द्वारा उन्हें राजकीय सलामी दी गई, और राजकीय सम्मान के साथ, सदा-सदा के लिए उन्हें नेपाली धरती और नेपाली राजनीति से बिदा कर दिया गया । शव को मुखाग्नि दी गई, चिता दहक उठी, उपस्थित लोगों की आंखों से आंसू टपक रहे थे । लेकिन, वहीं एक खादी कर्ुता-पायजामा और जवाहर बंडी में सजे चहक रहे थे, वह पार्टर्ीीे अगुवा कार्यकर्ताओं से ‘खुद को अध्यक्ष बनाने के लिए कन्वैसिंग कर रहे थे । वहां उपस्थित अमृता जी अर्थात् पार्टर्ीीी महिला नेतृ अमृता अग्रहरि ने मुझसे कहा, देखिए रामाशीष बाबू, अभी शव पूरी तरह जल भी नहीं पायी है कि गजेन्द्र बाबू को ‘तेरी सुबह की जय, तेरी शाम की जय’ की रट लगानेवाले महामंत्री राजेन्द्र महतो ने अध्यक्ष-बनने का अभियान भी शुरू कर दिया है, यह कैसी श्रद्धा, यह कैसी विडम्बना है – इस आदमी में मानवता नाम की चीज भी है या नहीं – मुझे भी ऐसा लगा जैसे उन्हें करोडÞों की लाटरी मिल गई हो, और वह जलती चिता का परवाह किए बिना ही उसके चारो ओर ऐसा फुदक रहे थे, जैसा वह अमर होकर इस धरती पर उतरे हों ।
इसी प्रकार अन्तिम संस्कार के अवसर का लाभ उठाने तथा लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए रामेश्वर राय यादव भी वहां पहुंचे थे, जिन्हें गजेन्द्र बाबू ने र्सलाही में हुए ‘तहलका-कांड’ के सिलसिले में पार्टर्ीीे निकाल दिया था । रामेश्वर राय यादव पर आरोप था कि पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी आइएसआइ द्वारा संचालित तहलका आपरेशन के दौरान उनके टेसलफोन से करीब तीन सौ काल पाकिस्तान के विभिन्न नम्बरों पर किए गए थे । वहीं पता चला, गजेन्द्र बाबू से हृदयेश त्रिपाठी की बोल-चाल भी बन्द हो चुकी थी फिर भी वह, दिखाने के लिए ही क्यों न सही, अन्तिम संस्कार में शामिल होने राजविराज सप्तरी सेवाश्रम में पहुँच चुके थे ।
चिता बुझी, अब बात आयी राजविराज से विराटनगर पहुंचने की, जहां से २६ जनवरी को विमान से काठमांडू लौटना था । उपाध्यक्ष बद्रीप्रसाद मंडल, अघोषित रूप से अध्यक्ष का कार्यभार संभाल चुके थे । इसलिए इस ओहदे की जिम्मेवारी को निभाते हुए उनके द्वारा काठमांडू से राजविराज पहुंचे पार्टर्ीीेताओं तथा कुछ पत्रकारों के लिए विराटनगर से काठमांडू का विमान टिकट बुक कराया जा चुका था । हम सभी दो जीपों में सवार हुए और विराटनगर के लिए प्रस्थान कर गए । मैं जिस गाडÞी में सवार हुआ था। उसमें बद्री मंडल के अलावा हृदयेश त्रिपाठी, अनिल कुमार झा, राजेन्द्र महतो आदि पार्टर्ीीदाधिकारी भी बैठे थे । गाडÞी में बैठे नेताओं की गपोरबाजी शुरू हर्ुइ । सभी गजेन्द्र बाबू के साथ का अपना अनुभव सुना-सुनाकर इस प्रकार हंसी के फब्बारे बिखेर रहे थे, जैसे वह कोई बहुत बडÞी जंग जीतकर लौट रहे हों या उन लोगों की कोई लाँटरी खुल गई हो, जिसकी वषर्ाें से उन्हें प्रतीक्षा थी ।
मैं सोचने लगा यदि यहां शोकमग्न होने की मैंने कोई नैतिक चर्चा छेडÞ दी तो चहकते-फुदकते इन लोगों के दिलोदिमाग को नहीं टटोल सकूंगा । इसलिए मैंने सामान्य सहभागिता दिखायी । कुछ ही देर में दोनों गाडिÞयां कोशी बराज पर पहुंच गईं । लोगों को प्यास-पानी की तलाश भी थी । मैंने सोंचा- देखूं इन्हें छेडÞकर, इनका क्या रवैया रहता है । गाडÞी से उतरते ही मैंने कहा- बद्रीबाबू आपके घर आपकी ही पार्टर्ीीे इतने बडÞे नेता लोग पहुंच रहे हैं, तो क्या आप अपने नेताओं को कोशी की ‘नामी-गिरामी मछली जलकपूर से स्वागत नहीं करेंगे -‘ बस क्या था, बद्रीबाबू ने कोशी से अभी-अभी जाल में निकाली हर्ुइ एक बडÞी-सी मछली खरीद ली और गाडÞी की डिकी में रखवा दिया । मछली करीब नौ-दस किलो की रही होगी । दोनों ही गाडिÞयां बद्री मंडल के घर पहुंची । गप-शप चलता रहा और मछली पककर तैयार होते-होते काफी रात भी बीत गई । इसी बीच खाना तैयार है, यह सूचना घर के अन्दर से मिली और सभी लोग एक ही कमरे में लगायी गई कर्ुर्सियों पर विराजमान हो गए । पहले तली हर्ुइ मछली लायी गई और देखते ही देखते शराब की बोतलें भी खुल गईं । उस जमघट में उपस्थित बद्री मंडल से लेकर हृदयेश त्रिपाठी, राजेन्द्र महतो, अनिलकुमार झा, देवेन्द्र मिश्र और रामेश्वर राय यादव करीब एक दर्जन से भी अधिक पार्टर्ीीेता कार्यकर्ता शामिल थे और शराब की चुस्कियों के साथ मछली का चटखारे के साथ लुत्फ उठा रहे थे । मैं भौंचक्का बना सबों की मस्ती का लेखा-जोखा कर रहा था और एक बात बार बार सोच रहा था कि ‘इन लोगों में आदमीयत है भी या नहीं । मधेश हितों के इन मधेशी साहूकारों की मानवता एवं नैतिकता विहीन घिनौनी हरकतों को देख ऐसा लग रहा था जैसे मानवता और नैतिकता दोनों एक साथ बिलख-बिलखकर रो रही हो ।
बद्रीप्रसाद मंडल के घर की मस्तियों के बाद इन सभी नेताओं के साथ मुझे भी विराटनगर के अतिथि सदन पहुंचा दिया गया जहां रैन बसेरे की व्यवस्था थी । सुबह जल्द ही जागना पडÞा क्योंकि सभी लोगों को ९ बजे हवाई अडÞडा पहुंचना था । सुबह का दृश्य भी यही देखने को मिला कि कुछ लोग अनिल कुमार झा के कमरे में गुफ्तगू कर रहे थे, तो कुछ लोग हृदयेश त्रिपाठी के साथ खुसुर-फुसुर कर रहे थे । रामेश्वर राय यादव को चिन्ता थी, यही अवसर है जब वह बद्री प्रसाद मंडल को मनाकर फिर से पार्टर्ीीें प्रवेश कर जाएं और अपना पुराना मुकाम हासिल कर लें । जबकि राजेन्द्र महतो का अभियान ही था कि अध्यक्ष पद उन्हें मिल जाए ।
सभी लोग विमानस्थल पहुंचे और विमान में भी वही चर्चा तथा कानाफुसी चलती रही । सभी लोग कठमांडू पहुंचे और कुछ ही समय में भारतीय राजदूतावास के इंडिया हाउस में आयोजित गणतंत्र दिवस स्वागत समारोह में शामिल हो गए । वहां भी देखा अन्य पार्टियों के नेता नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीे नेताओं और कार्यकर्ताओं को जहां शोक संवेदना दे रहे थे वहीं दूसरी ओर मधेशी नेता अध्यक्ष पद लूटने के लिए कानाफुसी में लगे हुए थे ।
लेकिन, अन्त में हुआ वही जिसकी आशंका थी, अर्थात् नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीो फिर से विभाजित करने की । कुछ ही दिनों बाद पार्टर्ीीा अधिवेशन राजबिराज में आयोजित किया गया और ‘राजेन्द्र महतो-हृदयेश त्रिपाठी-सरिता गिरी एण्ड कम्पनी ने गजेन्द्र नारायण सिंह की विधवा को मनाकर, नेपाल सदभावना पार्टर्ीीो तोडÞ दिया । पार्टर्ीीा नाम रखा गया ‘नेपाल सदभावना पार्टर्ीीआनन्दी देवी) । इसी नाम के साथ राजेन्द्र महतो, हृदयेश त्रिपाठी और श्यामसुन्दर गुप्ता आदि नेताओं ने मंत्री पद का कई बार सुख-भोग किया । यह दूसरा अवसर था, जब राजेन्द्र महतो को दूसरी पार्टर्ीीवभाजित करने में सफलता मिली थी । इससे पहले गजेन्द्र बाबू के जीवित रहते हुए पार्टर्ीीो विभाजित कर अलग पार्टर्ीीनायी गई थी, जिसका नामकरण किया गया था- समाजवादी जनता दल ।
इसी बीच पार्टर्ीीें हृदयेश त्रिपाठी, राजेन्द्र महतो और श्यामसुन्दर गुप्ता के बीच फिर रस्साकस्सी मची और इसी जोडÞ-तोडÞ में उक्त तीनों ही लोगों को अनेक बार मंत्री बनने का मौका मिला । और, अन्त में राजेन्द्र महतो ने तीसरी बार फिर इस पार्टर्ीीो तोडÞा और पार्टर्ीीे नाम से ‘नेपाल’ शब्द निकालकर, ‘सदभावना’ पार्टर्ीीख लिया । और, इस पार्टर्ीीो ही ‘गजेन्द्र बाबू’ की पार्टर्ीीा असली उत्तराधिकारी बताते हुए दो अधिवेशन भी कर लिए । पहली, संविधान सभा में ‘सदभावना’ पार्टर्ीीे नौ सदस्य थे और उन्हें भी राजेन्द्र महतो ने उचित सम्मान के साथ पार्टर्ीीें नहीं रहने दिया । कभी भी चुनाव में खडÞा नहीं होने वाले तथा समानुपातिक के पीछले दरबाजे से संविधान सभा में प्रवेश करनेवाले मुंशी लक्ष्मणलाल कर्ण्र्ााो छोडÞ, अन्य कोई भी सदस्य राजेन्द्र महतो के घमंडी रवैये को बर्दाश्त नहीं कर सके । यहां तक कि, पिछले दरबाजे से ही संविधान में पहुंच चुके अनिल कुमार झा ने भी अलग पार्टर्ीीडÞी कर ली ।
अब स्थिति यहां तक पहुंच गई कि स्वास्थ्य मंत्री पद पर विराजमान राजेन्द्र महतो ने ‘जनकपुर में महाधिवेशन किया ‘सदभावना’ पार्टर्ीीा और घोषणा कर डाला कि यह ‘पांचवां अधिवेशन’ है । जबकि, सच्चाई तो यह है कि वीरगंज में अधिवेशन करने के बाद उनकी पार्टर्ीीा यह दूसरा अधिवेशन था । राजेन्द्र महतो ने जनकपुर अधिवेशन में ही अपनी पार्टर्ीीो राष्ट्रीय पार्टर्ीीोने का दाबा करते हुए गजेन्द्र बाबू की ‘नेपाल सदभावना पार्टर्ीीके मूल मंत्र ‘हिन्दी’ को सदा सदा के लिए बिदा कर दिया ।
मालूम हो कि ‘गजेन्द्र बाबू’ द्वारा स्थापित ‘नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीने सदा-सदा के लिए समाधि ले ली और नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीा तिरंगा झंडा और ‘पंजा छाप’ चुनाव चिन्ह फटी हर्ुइ धरती में विलीन हो गई । सच्चाई तो यह है कि ‘नेपाल सदभावना पार्टर्ीीअपने तिरंगे झंडे और ‘पंजा छाप’ चुनाव चिन्ह मंे अभी भी जीवित है । र्फक इतनी सा है कि मधेश और मधेशी हितों के उक्त साहूकारों की ‘धनबटोरू’ हरकतों के कारण ‘एक महिला नेतृ’ की गोद में अंतिम सांस गिनते हुए संजीवनी की तलाश कर रही है ।
‘नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीके साहूकारों द्वारा, पार्टर्ीीो टुकडÞों में विभाजित करनेवाले साहूकारों ने तो इस हद तक घटिया हरकत कर डाली है कि खुद के अपने मतदाताओं द्वारा ठुकरा दिए जाने और चुनाव हार जाने के बाद, मधेशी मतदाताओं के समानुपातिक वोटों से प्राप्त सीटों को या तो अपनी ‘राजनीतिक-निरक्षर’ पत्नियों की हैंड बैगों में डÞाल दिया है या मधेशी जनता के वोटों को कुख्यात सेठ-साहूकारों के हाथ नीलाम कर दिया है ।
नेपाल के जानेमाने त्यागी-तपस्वी नेता गजेन्द्र बाबू के निधन की खुशी में, मछली-मदिरा की मस्ती लेनेवाले ‘महतो एण्ड कम्पनी’ को जब ‘गजेन्द्र बाबू के वाषिर्क श्राद्ध अर्थात् पुण्य तिथि के अवसर पर नेपाल के प्रधानमंत्री -मंत्री परिषद के अध्यक्ष) खिलराज रेग्मी तथा अन्य पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं एवं भारत सहित अन्य अनेक देशों के राजदूतों की आंखों में ‘नकली श्रद्धांजलि’ की धूल झोंकते हुए देखा तो सन्त कबीर की याद आ गई-
‘मोहे सुनी-सुनी लागे हांसी राय

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: