जरा इनकी भी सुनें…

विगत में अपने ही नेतृत्ववाली अदालत द्वारा किया गया फैसला तत्कालीन सरकार नें नहीं माना, लेकिन अभी आप खुद सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। प्रधानन्यायाधीश तथा मन्त्रिपरिषद् के अध्यक्ष खीलराज रेग्मी जी ! अपने ही उस फैसले को कार्यान्वयन करके सुशासन की यात्रा शुरुवात करें तो कैसे रहेगा – र्
इश्वर पोख्रेल, महासचिव नेकपा एमाले
-फेशबुक में)
उज्जन कहलानेवाले भुवन श्रेष्ठ को मार कर मंै माओवादी आन्दोलन में आया नहीं हूँ। लेकिन इसी आरोप में मै ने ८ वर्षजेल में बिताया। इस अवधि में मुझे इतनी यातना दी गई कि मुझे हिटर में पेशाब करना पडÞता था। ऐसी अमानवीय यातना के कारण ही मेरी किड्नी ड्यामेज हो गई है। अभी भी शरीर सूजा हुआ है। इसीलिए सत्य क्या है, उसको ख्याल करना चाहिए। कनकमणि दीक्षित, सुवोध प्याकुरेल और मन्दिरा शर्मा जैसे डलरवादिओं को इस बात को समझने के लिए मैं अनुरोध करता हूँ। कृपया एकबार बालकृष्ण ढुंगेल की फाइल को गम्भीरतापर्ूवक अध्ययन करें, उसके बाद ही मेरे बारे में कुछ बोलें।
-बालकृष्ण ढुंगेल, पर्ूवसभासद, एमाओवादी
-अनलाइनखबरडटकम में)
०६४ साल के निर्वाचन में कांग्रेस को बहुमत न मिलने के कारण ही संविधान न बन सका। अब फिर कांग्रेस को अगर बहुमत नहीं मिला तो संविधान फिर भी नहीं बन सकता है। इस बात को जनता भी समझ रही है।
-प्रकाशमान सिंह, कांग्रेस महामन्त्री
-२३ मार्च काठमांडू में)
रियल स्टेट तथा शेयर बाजार में देखी गई मन्दी के कारण सभी वित्तीय संस्था प्रभावित हैं। कौन कितना प्रभावित है, मात्रागत रुप में अन्तर हो सकता है। हम लोग भी कुछ हद तक प्रभावित हुए है, लेकिन हम लोग सुधार की ओर अग्रसर हैं।
-अजय मिश्र,
प्रमुख कार्यकारी अधिकृत, प्रुडेन्सियल फाइनान्स
-अभियान दैनिक में)हमारी अर्थ प्रणाली में बजट विनियोजन पद्धति ही गलत है। इसको सुधार करना आवश्यक है। जो अर्थमन्त्रालय और राष्ट्रिय योजना आयोग के पदाधिकारी की असमझदारी के कारण समस्या बनी है। स्वास्थ्य में १० प्रतिशत भी बजट विनियोजन नहीं होता, उससे पहले ही ‘बजट का सिलिङ’ निर्धारित होता है। यह पद्धति ही गलत है।
डा. प्रवीण मिश्र, सचिव,
स्वास्थ्य मन्त्रालय, -कारोबार दैनिक में)
एकीकृत माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड ने मधेश के मिथिला, भोजपुरा और अवधी क्षेत्र से आगामी निर्वाचन में अपनी उम्मेदवारी देने की घोषणा की है। साथ ही विगत संविधान सभा के निर्वाचन में जो हार हर्ुइ थी, उसे व्याज के सहित वसूल करने की बात कही। अब हम जैसे युवाओं की ओर से माधव, प्रचण्ड, सुशील और झलनाथ जैसे घोर संघीयता विरोधी नेता के विरुद्ध उम्मेदवारी देकर प्रत्यक्ष चुनौती देनी चाहिए। और मधेश को आन्तरिक उपनिवेशवाद से मुक्त करने का साहस दिखाना चाहिए।
– योगेन्द्र राय यादव, युवा नेता- सद्भावना पार्टर्ीी-फेशबुक में)
चैत १ गते की २५ सूत्रीय -बाधा अड्चन हटानेवाली) सहमति ने मुल्क में ‘कू’ किया है। इसीलिए जब तक यह खारेज नहीं होगा, तब तक राजनीतिक निकास के लिए संबैधानिक रास्ता भी बन्द ही रहेगा। ऐसी अवस्था में निर्वाचन भी सम्भव नहीं है। अगर निर्वाचन कराने की कोशिश होगी तो हम उसका प्रतिकार करेंगे।
-देव गुरुङ, सचिव -नेकपा-माओवादी)
-२३ मार्च काठमांडूमें)
पहले संविधानसभा निर्वाचन और उससे पहले का संसदीय निर्वाचन में भूमिगत सशस्त्र समूह का गठन तथा दबदबा नहीं  था। अभी इस तरह के सशस्त्र समूह बहुत सारे हैं। दूसरी ओर जातीय और क्षेत्रीय समूहों ने भी अपनी उपस्थिति जताई है। प्रहरी के लिए यह दूसरी चुनौती है। इस कारण समग्र में देखा जाए तो विगत के निर्वाचन की तुलना में आगामी संविधानसभा निर्वाचन सुरक्षा के दृष्टिकोण से ज्यादा चुनौतीपर्ूण्ा होगा।
कुवेरसिंह राना, प्रहरी महानिरीक्षक
-कारोबार दैनिक में)नेपाल का अर्थतन्त्र धीरे-धीरे विकास की ओर अग्रसर है। ऐसी अवस्था में आर्थिक वृद्धिदर बढाने के लिए सभी पक्ष -र्सार्वजनिक, निजी और साझेदारी) आपस में मिलकर जाना अपरिहार्य है। सभी सरोकारवाले पक्ष आपसी सहकार्य से आगे बढने से ही मुल्क के विकास में महत्वपर्ूण्ा योगदान दे सकते हैं।
सुनील केसी -महाप्रबन्धक, एनएमबी बैंक
-अभियान दैनिक में)

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