जरा इनकी भी सुनें…

राजनेता बनने का उद्देश्य लेकर मैं राजनीति में क्रियाशील नहीं हूँ। लेकिन अभी नेपाल की राजनीति ऐसी अवस्था में है, जहाँ मैं ही केन्द्र में हूँ। ऐसी अवस्था में कहना होगा कि prachand_hindi_magazineआगामी निर्वाचन में मेरी पार्टर्ीीो या मुझे जीत हासिल होना उतना महत्त्वपर्ूण्ा नहीं माना जाता। लेकिन नेपाली जनता और राष्ट्र को अवश्य ही जीत का महसूस होना चाहिए।
पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड, अध्यक्ष-एमाओवादी
-नेपाल टेलिभिजन में)
कांग्रेस जैसी प्रजातान्त्रिक पार्टर्ीीो कोई संघीयता विरोधी आरोप लगाते हैं, यह सरासर झूट है। हम लोग जातीय और संस्कृतिक पहिचान को स्वीकार करते हैं। लेकिन जातीय आधार में जो संघीयता की बात हो रही है, उसको स्वीकार नहीं किया जा सकता।
– प्रदीप पौडेल, नेता -नेपाली कांग्रेस) -अनलाइन खबर डटकम से)
किसी भी देश में राष्ट्रपति आजीवन नहीं रहते है। सामान्यतः उनका कार्यकाल सिर्फपाँच साल का होता है। अगर नेपाल में भी आगामी मार्गशर्ीष्ा में निर्वाचन नहीं हो सका तो हमारे राष्ट्रपति की वैधानिकता पर भी सवाल उठ सकता है।
– उपेन्द्र यादव, अध्यक्ष मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल -नया“पत्रिका से)
अगर समय में निर्वाचन कराना चाहते हैं तो मन्त्रिपरिषद अध्यक्ष खिलराज रेग्मी को अपने पद से इस्तीफा देना ही होगा। उसके बाद असन्तुष्ट दल भी निर्वाचन के लिए राजी हो सकते हैं। लेकिन एकाध राजनीतिक दल और नेता के हठ के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है। ऐसी ही अवस्था रही तो दूसरा संविधानसभा निर्वाचन सम्भव नहीं है।
-डा. शेखर कोइराला, नेता-नेपाली कांग्रेस
-जुलाई २९ में रिपोर्टस क्लब काठमांडू में)
नेपाल को समझाने मंे भारत की अर्समर्थता हो अथवा नेपाल के छोटे से छोटे विषयों में भी उसकी दिलचस्पी बढÞने के कारण हो, नेपाल में भारत विरोधी मानसिकता तीव्र रुप में बढÞ रही है। लेकिन यह मर्ज पुराना है। वि.सं. २००७ से ही ऐसा हो रहा है। इस में हमारे नेताओं को भी सचेत रहना चाहिए। प्रोटोकल क्या है – इसके अनुसार दो देशीय सम्बन्ध सुमधुर बने रहें तो अच्छा। लेकिन हमारे नेता गण इसके बारे में कुछ भी सीखने-समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।
– प्रा.डा. लोकराज बराल, पर्ूवराजदूत, -नागरिक दैनिक से)
मधेशी जनता अब नेपाली शासक वर्ग के अधिन से मुक्ति होना चाहती है। वे लोग स्वतन्त्रता चाहते है। मधेशी जनता की चाहना स्वतन्त्रत मधेश है।  इसलिए स्वतन्त्र मधेश के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल में जनमत संग्रह होना चाहिए।
रञ्जित झा, संयोजनक जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा -देशीया मासिक से)
जब मैं ९ दिनों की प्रसूती थी, उसी समय पुलिस और स्थानीय जमीन्दार ने मिल कर हमारा घर तोडÞ दिया। हम लोग वृक्ष के निचे बैठने के लिए बाध्य हुए। खाने के लिए कुछ भी नहीं था। पाँच दिन तक मैंने सिर्फपानी पीकर अपनी जान बचाई, लेकिन अपने बच्चे को नहीं बचा सकी। क्योकि मेरे भूखे रहने से नवजात शिशु के लिए मेरे स्तन से दूध नहीं आ रहा था। जिसके कारण मैंने अपने शिशु को केवल १९ दिन बचा पाई।
– शान्ता चौधरी, पर्ूवसभासद, -न्यूज-२४ टेलिभिजन में)
इससे पहले संविधानसभा में हर्ुइ बहस को समेटा जाए तो अभी भी जनमतसंग्रह कर सकते हैं। ऐसा करना ठीक भी रहेगा। अगर कल भी संविधानसभा से बाहर जाकर रिसोर्ट से संविधान लाने का प्रयास होगा तो कभी भी संविधान निर्माण नहीं हो सकता। लेकिन जनमत संग्रह जैसे लोकतान्त्रिक विधि के विषय में अभी तक कुछ भी बहस नहीं हो पा रही है।
– नारायण वाग्ले, पत्रकार -सेतोपाटी डटकम से)
भोजपुरिया समाज अभी परिवर्तन की दहलीज पर खडÞा है। परिवर्तन के समय जहाँ भी द्वन्द्व होता है और समाज विभाजित हो जाता है। ऐसी अवस्था में हम जैसी नई पीढÞी को आगे आने के लिए कुछ कठिनाइ भी होती है। लेकिन परिवर्तन के लिए जिम्मेदार भी तो युवा वर्ग ही है।
– प्रिना तिवारी, अभिनेतृ -देशीया मासिक से)

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