जरा इनकी भी सुनें…

मैं दश वर्षकी उमर में ही अच्छी कविता लिख लेता था । लेकिन मेरे दोस्तों को इस पर विश्वास ही नहीं होता था । इससे मुझे सुख और दुख दोनों होता था । दुःख इस अर्थ में कि लोग मेरी क्षमता को नहीं पहचान पा रहे हैं । और सुख इस अर्थ में कि मैं भी बडे कवि की तरह कविता रचने लगा हूँ । कभी-कभी तो मैं उन लोगों को ‘यह कविता मेरी नहीं है, दूसर बडÞे कवि की कविता चुरा कर लाया हूँ’ ऐसा भी बोल देता था ।
– ध्रुवचन्द्र गौतम, साहित्यकार
-८ नवम्बर, नयाँ पत्रिका से)

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राजनीति सिर्फपद की उपभोगिता ही नहीं है, जनता और कार्यकर्ता के प्रेम और विश्वास को न्याय करने की क्षमता भी है । लेकिन एक दुखद पक्ष- नेपाल की राजनीति में पुरुष पर जितना विश्वास होता है,  महिला पर नहीं किया जाता । हमारी पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस में भी इसी तरह की कई महिलाएं हैं, जो पार्टर्ीीे सामने आ नहीं पाती । इसी तरह ०१७ साल में रजा महेन्द्र को काला झण्डा दिखाने का अदम्य साहस करनेवाली शैलजा आचार्य, मंगलादेवी, नोना कोइराला के योगदान का अभी तक कोई कदरनहीं हुआ है ।
-चित्रलेखा यादव
नेतृ नेपाली कांग्रेस
-सौर्य दैनिक से)

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वक्ता के रुप में कोई भी कार्यक्रम में जाने से पहले मैं पूरी तैयारी करके जाता हूँ । सामान्यतः वह तैयारी करीब एक-डेढ घण्टे की होती है । तीन महिने तक तैयारी करके पाँच मिनेट का भाषण करने का उदाहरण भी मेर पास है । अभी तो किसी समय आकस्मिक भाषण भी करना पडता है । ऐसे समय मैं पर्ूववर्ती वक्ताओं के भाषण में ध्यान देता हूँ और अपने भाषण के लिए विषय चुन लेता हूँ ।
-गगन थापा, नेता नेपाली कांग्रेस
-सौर्य दैनिक से)

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अठारह वर्षवाद पहली बार नेपाल ने बंगलादेश को हराया है । सिर्फमेर गोल के कारण ही बंगलादेश पराजित नहीं हुआ, नेपाल लम्बे समय के बाद पुरुष साफ च्याम्पियनशीप के सेमिफाइनल में पहुँचा । उस समय मेर द्वारा हुए ‘प|mी किक गोल’ संसार के ही उत्कृष्ट पाँचवंे गोल के रुप में परिचित हुआ ।
-सागर थापा
कप्तान-राष्ट्रिय फुटबल टोली
-नवम्बर ९ नया“ पत्रिका से)
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जब मैंने नाटको में अभिनय करना शुरु किया, निन्दा करनेवाले बहुत सारे हुए । उस समय मिथिला प्रदेश की एक बहू का इस तरह रगकर्मी होना बहुत ही हिम्मत की बात थी । फिर भी मेरे श्रीमान घर के लोगों ने मेरा साथ दिया । मेरी हिम्मत बड। अगर मुझे श्रीमान का साथ नहीं मिलता तो आज मैं एक साधारण गृहमणी के रुप में ही रहती ।
-अनितारानी मण्डल, मिथिला रंगकर्मी
-२४ नवम्बर, नागरिक दैनिक से)

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पुस्तकों से मेरा अति ही लगाव है । जिस समय मैं अध्ययन के लिए बैठता हूँ, बेडरुम में जानेका समय ही भूल जाता हूँ । कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि पुस्तक पढते-पढते सुबह के तीन बज जाते हैं । लेकिन मुझे कुछ पता ही नहीं चलता ।
– हृदयेश त्रिपाठी
भौतिक योजना तथा निर्माण मन्त्री
-नया“ पत्रिका से)

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