जरा हट के, जरा बच के, ये है काठमाडूं मेरी जान ! बिम्मी शर्मा

 बिम्मीशर्मा , काठमांडू ,१९ अप्रिल |

हाय रे राजधानी ! जरा हट के,जरा बच के,यह काठमाडूं है मेरी जान !
दुसरे देशों की राजधानी कैसी होगी कभी देखाऔर भोगा नहीं है । पर अपने देशकी राजधानी काठमाडूं तौबा तौबा। खुदा नूर बख्से इसको । काठमाडूं शहर सिर्फ देश की राजधानी ही नहीं दुखऔर समस्याओं किभी राजधानी है । यदी जहन्नुम भी कहीं है तो वह भी माशाल्लाह सुंदर और सुव्यवस्थित ही होगा । पर हमारे देश की राजधानी को यहां के शासकों ने ईतनाअव्यस्थित करके रख दिया है कि पान की पीक को सडक में थुकने पर बेचारे पान का ही अपमान हो जाता है ।

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तराई में लोटा में पानी ले कर शौच जाते हैं, पर राजधानी में पानी दिाखाई देना तो दूर हर सार्वजनिक नल या ढुगें धारा पर खाली लोटा, बाल्टि, गैलन और घैला का लाईन दिखाई देता है । अब आपका जात्रा शुभ बनता है या अशुभ यह काठमाडूं खाने पानी लिमिटेड पर निर्भर है । अबतो यह लाईन फिसलते फिसलते पेट्रोल पंप और गैस डिपो तक चला गया है । पेट्रोल पंप पर मोटर साईकलऔर खाली गैलन कि लंबी कतार दिखाई देना हमारे पिएम ओली को देशवासी के संपन्नताका घोतक लगता है । मोटर साईकलऔर गैस सिलिडंर देश के नागरिकों के पास है भले ही वह खाली क्यों न हो । ईसे ही देख और पढ कर पिएम ओली तसल्ली कर लेते हैं कि वह देश के सबसे सफल प्रधानमंत्री हैं ।
अब गटर मेंपत्थर कौन मारे ? पिएम ओली के बिचार भी राजधानी के बडे बडे गटर जैसा ही है । दिमाग में तो ईन के यही गटर कि गंदगी चिपक कर बैठा हुआ है । ईसी लिए राजधानी को जहां से और जिस ओर से भी देखिए यह कुडे काही ढेर नजर आता है । देश की राजधानी महानगर कहलाती है, पर यह महान कहीं से भीनहीं दिखती है । हप्तों तक कुडा सडक के किनारे से नहीं उठता, उसे मक्खी भिनभिनाते रहते हैं । पर महानगरपालिका अपनी महानता पर खुद ही ढेरों आंसू बहा कर शहीद हो जाता है । जगह, जगह पर फैला हुआ मैलाऔर कुडा राजधानी की “सुंदरता”को और ज्यादा“निखार” रहा है ।
महानगरपालिका शहर को हरा भरा बनाने का नयां तकनिक जान गया है ।जगह, जगह की दिवारों और होर्डिगं बोर्ड को हरा रगं से पेंट कर के हरा भरा होने का सवुत देता है । ईतने आसान तरिके से हरा भरा होने का तकनिक शायद ही किसीऔर देश को पता हो । ऐसा सस्ता और आसान तकनिक को पेटेटं कर के दुसरें देशों को भी निर्यात करना चाहिए न ? पर काठमाडूं महानगर पालिकाबहुत ही भोलाऔर मूर्ख है । उसे पैसे के सिवा कुछ सुझताऔर दिखता नहीं है ।

और राजधानीकी ट्रैफिक जाम की तो बात ही मत किजिए । यह ईतनी उम्दा है किआपको तुंरत ब्रेड मे ईस जाम को लगा कर खाने का मन करेगा । पर दूर्भाग्य से यह जाम तो हर सडक, गल्लीऔर चौराहा में मिलेगा पर ब्रेड की फैकट्री कहीं भी नहीं मिलेगी । इसी ट्रैफिक जामऔर गाडियों के बेलगाम और अंधाधूंध चलाने से कई लोग चटनी बन कर काल की उदर पूर्ति करने चले जाते हैं । पर कोई बात नहीं लोग आएं हैं तो जाएगें ही । पैदा हुए हैं तो मरेगें ही । ईसकी चिंता क्या करना , गीता पढो और मस्त रहो । और राजधानी की सडकों पर धूल फांको ।
राजधानी की धूल  भी शरीर पर ऐसा चढ जाता है कि होली का रगं भी शर्मा जाए बेचारा । कपडे का रगं और सिलवट राजधानी के सार्वजनिक बस में चढने पर ऐसे बदलजाती है जैसे छिपकली अपना रगं बदल लेती है । राजधानीकी सडकों पर चलते चलते कहीं आपको प्यास लग जाए तो पानी या नल नहीं मिलेगा पर जगह जगह वियर या दारु कि भरी हुई बोतल आपको हंस कर ईस तरह स्वागत करेगी जैसे किसी होटल की मालकिन हो । और आपको कहीं गलत समय पर लघुशंका हुई तो आप ने बैठे बिठाए दुसरी मुसिबत मोल ले ली ।
राजधानी में जरुरी दवा जल्दि या जनदिक नहीं मिलता पर चाउ चाउ, मोमो और मटन कि दूकान आपको कदम कदम पर मिल जाएगें । आपका शीर दर्द से फट रहा हो तो एस्प्रो नहीं मिलेगा पर शराब की भट्टी जरुर किसी कोने पर मिल जाएगी । भगवान बुद्ध का देश कह कर गर्व करने वाले राजधानी वासी मिट, मछली और शराब पर भी उतनाही गर्व करते हैं और प्रेम लुटाते है । गौतम बुद्ध के अहिंसा के सिद्धातं को खुब बढा चढा कर बखानते है और बुढी भैंस को काट कर उस के मांस से तैयार किया गया मोमो को बुद्ध का वचन मान कर निगल लेते है ।
राजधानी की सार्वजनिक बस में आप चढ गए तो समझ लिजिए किआप ने बहुत बडा समाज सेवा कर लिया । वह ऐसे कि बस में चढ्ते हीआपको कहीं सौभाग्य से सीट मिल गया तो वह तुंरत दूर्भाग्य में बलद जाएगा । आप के सीट में बैठते हीकोई बच्चे वाली महिला बस में चढी तो आपको मन मार कर अपनी सीट का त्याग करना जरुरी हो जाता है । यदि कोई वृद्ध व्यक्ति बस में चढा तो भी आपको अपनी सीट त्याग करने के लिए आगे रहना पडेगा । नहीं तो बस का खलासी या कडेंक्टर आपको ऐसे लताडेगा जैसे आप कोई नरभक्षी हो । फिर भी यदि ईतने रहमो करम के बाद भी आपको बस में सिट मिल गयाऔर मन ही मन खुशहो रहे हैं तो आपकी खुशी का गुब्बारा फुट्ने ही वाला है । कोई महिला या पुरुष अपने कधें का बैग और थैले को आपकी गोदी का शोभा बढाने के लिए हाजिर हो जाएगा ।
ते देखा न हमारे देश की राजधानी कितनी अच्छी है । ईस के नाम के आगे काठ का लगना ही ईस बात को दर्शाता है कि यहां बैठने वालों का दिल काठ का ही है उस मे कोई भावना नहीं हैं । यदि सच में ईन लोगों में मानवीय भवना होती तो जब राजधानी में जरुरी वस्तुओं की भारी किल्लत होने पर जा कर सिंह दरवार घेरते । प्रधानमंत्री का घेटूंवा पकडते । आखिर में ४० लाख से ज्यादा लोग ईस देश की राजधानी में विराजते हैं । ४० या ४ सौ लोग जा कर अपना दमखम दिखाते पर नहीं । पर ईन्हे तो चिकनी चुपडी बातें करने और बनाव श्रृगांर से ही फुर्सत मिले तब न ?
काठमाडूं वासी हाय तुम्हारी यही कहानी !
हात में हैं खाली गैलन और गैस सिलिडंर,
और आंखों में है बागमती का बहता गंदा पानी !!

व्यग्ंय,

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