जरुरत है थारु, मधेसी, आदिवासी जनजाति एकता की

क्षमता होते हुए भी नेपाल के थारु, मधेसी, आदिवासी जनजाति देश के निर्णायक स्तर पर तो क्या थोड़ी सी भी “उच्च स्तर“ पर नही पहुँच सकते 

कुछेक परिवार और उनके सगे संबंधियो ने समूचे देश को अपना व्यक्तिगत और पारिवारिक संपत्ति बना लिया है ।madheshi-janta_hindi-magazine

मुकेश झा
नेपाल के इतिहास के अनुसार गोर्खा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल का एकीकरण किया । इस इतिहास के आधार पर नेपाल एक “बहुराष्ट्रीय“ देश है जहाँ बहुत ही छोटे–छोटे राज्यों को एक किया गया और एक देश बनाया गया । इसका सीधा अर्थ है नेपाल एक “बहुराष्ट्रीयता“ वाला देश है । इतिहास की बात माने और वर्तमान का मूल्याङ्कन करें तो नेपाल भौगोलिक रूप से तो एक हो गया परन्तु राष्ट्रीयता के रूप से खण्ड–खण्ड ही रह गया । सिर्फ भौगोलिक रूप से एक करना, जमीन जोड़ लेना परन्तु जनता को नहीं जोड़ना एकता नही कहा जा सकता । एकता करने का एक ही तरीका है सबको समान अधिकार, समान हक, समान मान सम्मान इज्जत प्रतिष्ठा मिले, क्याेंकि समानता के बिना एकता नहीं टिक सकती । नेपाली सत्ता ने स्थापना काल से ही यह भूल कर दी । देशों की जमीन जोड़ कर राजा बन बैठे और सेना, लाठी, खुकुरी, बन्दूक के बल पर हुकुमी शासन खड़ा करके नश्लवादी कब्जा कर लिए ।

नेपाल मं नश्लवादी सोच की राष्ट्रीय पार्टी नेकपा एमाले जो आज भी महेन्द्रवादी पद्धति अनुसार देश को चलाना चाहता है, जिसके हरेक केन्द्रीय स्तर के नेता सांप्रदायिक सोच के हैं और जिनके हरेक वक्तव्य थारु मधेसी आदिवासी जनजाति विरोधी ही रहता है वह अपने आपको राष्ट्रवादी कहता है ।

एकीकरण के बाद इस तन्त्र पर जंगबहादुर राणा ने अपना शिकंजा और मजबूती से पकड़ा और “बहुराष्ट्रीय“ देश नेपाल एक परिवार का गुलाम हो गया । नेपाल के सभी “राष्ट्र“ के लोग जो एकीकरण से पहले स्वतन्त्र जीवन जीते थे उनको ऐसी शासन नागवार गुजरी और जनता ने विद्रोह किया । नेपाल में शाह वंश और राणा शासन के उदय समय भारत में अंग्रेजों का हुकूमत था । नेपाल के राणाओं ने भारत में अंग्रेज के विरुद्ध चल रहे आंदोलन में अंग्रेज को सहायता करने के लिए सैन्य सहायता प्रदान किया और अंग्रेजों का कृपा पात्र बनकर नेपाल पर अपनी पकड़ और मजबूत बनायी । राणा अंग्रेज को खुश करने पर लगा था और अंग्रेज राणा शासक का समर्थक था । इस दोस्ती के नाम पर दोनों ने कुछ विख्यात संधियां और समझौता भी किये । जब अंग्रेज की पकड़ भारत पर कमजोर पड़ने लगी और भारत में स्वतंत्रता के नारों ने जोर पकड़ा तो नेपाल में भी राणा शासन के विरुद्ध आवाज बुलन्द होनी शुरू हुई । भारत से अंग्रेज के पलायन होते ही नेपाल से राणा शासन का अंत

जिस लोकतंत्र में संविधान घोषणा के समय राष्ट्रपति सिर्फ सम्विधान को “माथे“ से लगा सकते हैं, उसका “विमोचन“ कर सकते हैं लेकिन उस संविधान पर कुछ बोल नहीं सकते उसी से सब को समझना चाहिये की यह वास्तविक लोकतंत्र नही है
हुवा । भारत में दूरदर्शी नेतृत्व होने के कारण उस देश में कोई एक व्यक्ति समूचे देश का राजा नही बना बल्कि लोकतान्त्रिक पद्धति से राज्य व्यवस्था चलाने का संविधान बना परन्तु नेपाल में दुर्भाग्यवश पुनः वंश परम्परा के अनुसार शाह वंश को ही सत्तासीन किया गया । कुछ गिने चुने व्यक्तियों ने नेपाल में भी भारत की तरह ही पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना की मांग उठाई तो एकात्मक सोच के सत्ता और शाह वंश के समर्थकों द्वारा उनको मौत के घाट उतारकर रास्ते से हटा दिया गया और परिणामस्वरूप नेपाल की विविधता पर पुनः एक बार महेन्द्र के रूप में एकात्मवादी काले बादल का छाया ने घेरा डाल दिया । “एक भाषा एक भेष, एक राजा एक देश“ नारा के दम पर नेपाल के “बहुराष्ट्रीयता“ को करीब ३० साल तक दबा कर रखा गया । नेपाल की जनता “एक भाषा एक भेष, एक राजा एक देश“ के नारा को नकार चुकी थी । २०३६ में पुनः एक जनांदोलन हुवा जिसके फलस्वरूप शासक ने जनमत संग्रह का एलान किया और उस आन्दोलन को बड़ी चतुरतापूर्वक समाप्त कर दिया । इसलिए एक बार पुनः २०४६ में जनआंदोलन हुवा और जनता को अपने अधिकार प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुवा । परन्तु जनता के सामने “जनभक्त“ और राजा के सामने “राजभक्त“ की दोहरी नीयत रखने वाले नेपाली कांग्रेस ने पुनः राजा को खुश करने के लिए “संवैधानिक राजतन्त्र“ की व्यवस्था कायम किया । २००७ साल में जो गलती कांग्रेस ने किया था वही गलती २०४७ में किया और जनता के हाथ में आई हुई सत्ता को पुनः राजा के गोद में दे दिया । नेपाली कांग्रेस के इस कार्य से सापÞm प्रमाणित होता है कि यह पार्टी हमेशा से सत्ता लोलुप रही है । कांग्रेस पार्टी हमेशा जनमुखी कार्य से ज्यादा सत्ता केंद्रित रही है ।
जनता की आवाज को अपनी आवाज बनाने की कला में माहिर कांग्रेस नेतृत्व जनआन्दोलन को अपना समर्थन देकर पहले जनता का विश्वास जीतती है और फिर जब परिवर्तनकारी पकड़ उसके हाथ में आ जाती है तो बड़ी ही धूर्तता पूर्वक उसका प्रयोग करके सत्ता पर पहँुचती है । परन्तु जनभावना के अनुरूप कार्य नही करने के कारण देश में द्वन्द शुरू होता है और पुनः राजतंत्र की स्थापना होती है । नेपाल में आजतक जितने भी आंदोलन हुए हंै उसमें से अधिकतर नेपाली कांग्रेस के धूर्तता, छल, प्रपञ्च और अदूरदर्शिता के कारण ही हुवा है । नही तो नेपाली जनता आज से ६५ साल पूर्व ही अधिकार सम्पन्न हो लोकतंत्र में सांस ले रही होती । नेपाली कांग्रेस के अहंकार के कारण बार बार नेपाल की जनता को कष्ट सहना पड़ा । २०४७ साल के संवैधानिक राजतन्त्र के साथ ही जनता के हाथ में आई हुई पूर्ण शासन पुनः वंश परम्परा के हाथ में देने का श्रेय भी नेपाली कांग्रेस को ही जाता है । पता नही शाह वंश से क्या मिला जो नेपाली कांग्रेस के आदर्श वीपी कोइराला ने यहाँ तक कह दिया की “कांग्रेस और राजा का गर्दन एक ही है“ । इसका कारण भी पता नही चलता कि आखिर क्यों नेपाली कांग्रेस जनआन्दोलन की उपलब्धि राजा को देने को आतुर रहती थी ।
काठमांडू नारायणहिटी दरबार हत्याकांड में राजा वीरेन्द्र के वंश विनाश के बाद उनके छोटे भाई ज्ञानेन्द्र ने “गद्दी“ संभाली और संवैधानिक राजतंत्र को खारिज करते हुए पुनः “पूर्ण राजतन्त्र“ की घोषणा कर दी । लेकिन जिस जनता की चाह लोकतंत्र हो उसको एकतंत्र या राजतंत्र कैसे रास आए । नेपाल के हरेक “राष्ट्र“ की जनता ने पुनः शाहवंश के वंशवाद के खिलाफ आंदोलन की घोषणा की । इस बीच माओवादी का सशस्त्र द्वन्द भी चरम पर था, परिणाम स्वरूप राजतन्त्र की समाप्ति और पूर्ण लोकतंत्र की स्थापना हुई ।
गौर से देखें तो नेपाली शासन सत्ता में शुरुवात से ही कुल चार पांच सौ परिवार और उनके सगे सम्बन्धियो का पकड़ रही है । शासन चाहे राजा का हो, राणा का हो, प्रजातंत्र हो या लोकतंत्र हो, निर्णायक जगह पर यही परिवार के लोग और इनके सगे सम्बन्धी मिलेंगे । इसीलिए आज के दिन में क्षमता होते हुए भी नेपाल के थारु, मधेसी, आदिवासी जनजाति देश के निर्णायक स्तर पर तो क्या थोड़ी सी भी “उच्च स्तर“ पर नही पहुँच सकते । कुछेक परिवार और उनके सगे संबंधियो ने समूचे देश को अपना व्यक्तिगत और पारिवारिक संपत्ति बना लिया है ।
परंतु नेपाल का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि नेपाली शासन में हमेशा ही एकात्मक सत्ता साझेदार रहे सामुदायिक सोच वाले व्यक्तियों का ही वर्चस्व रहा है । राजनैतिक, न्यायिक, प्रशासनिक, संचार सब में ऐसे ही व्यक्ति निर्णायक जगह पर जमे रहने के कारण कागजों पर तो शासन व्यवस्था में परिवर्तन हुवा है परन्तु व्यवहार में नही । दो बार संविधान सभा का चुनाव होना, संविधान बन कर भी एकल जातीय वर्चस्व वाला संविधान आना भी इसी सोच का परिणाम है । इतिहास के अनुसार जैसे नेपाल बहुत छोटे छोटे राज्य मिलकर एक देश बना है तो जब तक देश के हर महत्वपूर्ण निर्णय में नेपाल के हरेक “राष्ट्र“ के जनता को समान अधिकार नही दिया जाएगा तब तक विद्रोह की आग शांत होने वाली नहीं है । यह बात नेपाली कांग्रेस सहित दूसरे सभी राजनैतिक पार्टीयों को पता है पर राणा वंश और राज वंश के तरह सत्ता को पकडे रहने की चाहत ने इन्हें अँधा बना दिया है । आखिर कब तक यह नश्ल पृथ्वीनारायण शाह को लड़ाई में किये गए सहयोग की भर्पाइ लेते रहेंगे?
अब थारु,मधेसी, आदिवासी, जनजाति नेपाल के वास्तविक लुटेरों को पहचान चुकी है, जो कि देश विकाश की तरफ थोड़ा सा भी ध्यान नहीं दे कर सिर्फ शासन सत्ता का ही लुत्पÞm उठाने में व्यस्त हैं । इस कारण अगर देश को विकाश की तरफ अग्रसर करना है और निर्णायक जगह पर पहुंचना है तो थारु मधेसी जनजाति आदिवासी एकता होना अपरिहार्य है । जो लोग अपने परिवार के वर्चस्व बनाये हुए हैं और दूसरे की क्षमता का कदर नही करते उनके विरुद्ध शंखनाद करते हुए जब तक एकताबद्ध नही होंगे तब तक अपमानित होना और अधिकार से वंचित रहना ही होगा ।
करीब एक दशक के लंबे मसक्कत के बाद जो संविधान आया उस संविधान सभा के अध्यक्ष बाबुराम भट्टराई ही उस संविधान से संतुष्ट नही हैं तो बाँकी की बात ही क्या किया जाय । उनका भी कहना है कि वर्तमान संविधान ने हरेक क्षेत्र के जनता को समान अधिकार नही दिया । इसी वजह से वह “कुर्सी“ और “पार्टी“ छोड़कर जनता के बीच आ गए । अब सवाल यह है कि क्या उनको यह बात संविधान घोषणा होने के बाद पता चली ? जब उनको यह बात पहले पता था संविधान लागु करने से पहले जब सर्वेक्षण के दौरान मधेसियों ने संविधान को विभेदी बताया और सत्ता द्वारा इतना दमन हुवा तो उसी वक्त क्यों नही “कुर्सी“ छोड़ी ? किस अदृष्य शक्ति के दवाब के कारण उनको यह संविधान लागू करवाना पड़ा ?
अगर संविधान घोषणा होने के दिन की ही बात लें तो सड़क पर सेना, सांसद पर पावंदी,राष्ट्रपति को एक शब्द भी बोलने का मौका नहीं, क्या इस से नही लगता की हमने कैसा लोकतंत्र पाया ? जिस लोकतंत्र में संविधान घोषणा के समय राष्ट्रपति सिर्फ सम्विधान को “माथे“ से लगा सकते हैं, उसका “विमोचन“ कर सकते हैं लेकिन उस संविधान पर कुछ बोल नहीं सकते उसी से सब को समझना चाहिये की यह वास्तविक लोकतंत्र नही है
नेपाल मं नश्लवादी सोच की राष्ट्रीय पार्टी नेकपा एमाले जो आज भी महेन्द्रवादी पद्धति अनुसार देश को चलाना चाहता है, जिसके हरेक केन्द्रीय स्तर के नेता सांप्रदायिक सोच के हैं और जिनके हरेक वक्तव्य थारु मधेसी आदिवासी जनजाति विरोधी ही रहता है वह अपने आपको राष्ट्रवादी कहता है । वह पार्टी जो देश के आधी जनसंख्या वाले मधेसी को नागरिक तो क्या इंसान ही नही गिनता वह भला संविधान के माध्यम से मधेसी को कैसा अधिकार देगा ? समय समय पर नेकपा एमाले के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा दिए गए गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी से मर्माहत हुए मधेसी जनता अब खुलेआम रूप से एमाले पार्टी की सफाया करने का प्रण ले रहा है । तात्कालिक वाहवाही समेटने के लिए मधेस और भारत दोनों को जोड़कर विवादस्पद अभिव्यक्ति देना कितना महंगा पड़ता है यह बात एमाले को अगले चुनाव में समझ आएगी । मधेस आंदोलन को बदनाम करने में अपना पूरा तंत्र और सरकार को लगाने में भी बाज नहीं आने वाले के पी शर्मा ओली के पास अगर सोचने की क्षमता हो तो उन्हें आराम से बैठ कर सोचना चाहिए की आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया जिससे मधेसी जनता एमाले की मधेस से पत्ता सापÞm करने की ठान ली है । उनके वक्तव्य से न की सिर्फ मधेस में वल्कि विदेशों में भी नेपाल सरकार की किरकिरी हुई । मधेसियों के आंदोलन को बार बार भारत द्वारा परिचालित कह कर बदनाम और अपमानित करने का बीड़ा उठाने की नाकामयाब कोशिश के कारण नेकपा एमाले मधेस से अपना पकड़ दिन ब दिन खोता जा रहा है । एमाले नेतृत्व को यह बात समय रहते चेत होना चाहिए कि अगर के पी शर्मा ओली जी अगले चुनाव तक एमाले अध्यक्ष रहे तो उनके द्वारा किये गए करतूत की कीमत पूरी पार्टी को भुगतनी होगी । अगर एमाले को मधेस पर पूर्वकालीन पकड़ बनानी है तो केपी ओली का विकल्प ढूंढने के अलावा कोई रास्ता नही । जिससे मधेसी के आक्रोश थोड़ा शांत हो ।
ओली सरकार के बाद प्रचण्ड सरकार ने भी आज के दिन तक मधेसियों को धोखा ही दिया है । जिस ३ बुँदे सहमति के आधार पर मधेसी पार्टियों ने प्रचण्ड को सत्तासीन कराया, माओवादी उस वायदे पर कायम नहीं रहा । संविधान संसोधन के बात पर महीनों आलटाल करने के बाद मधेसी पार्टियो से बिना विचारे एक ऐसा संसोधन प्रस्ताव लाया जिससे मधेसियों के मांग अनुसार “प्यासे को बून्द“ बराबर भी तृप्ति नही मिलने वाली है । फिर भी वैसे अधूरे संसोधन के विरुद्ध भी नेकपा एमाले पूरा दमखम दिखा रहा है । संसद, सड़क, सर्वोच्च तक का जोर आजमाइस कर रहा है । सर्वोच्च ने तो नेकपा एमाले का जिद गैर संवैधानिक है यह प्रमाणित कर दिया । सड़क पर भी सिर्फ एमाले के गिनेचुने कार्यकर्ता ही दिखाई दिए । ऐसे में नेकपा एमाले को संबिधान संसोधन का विरोध करने का कोई औचित्य नही दिखाई दे रहा है । जैसे प्रचण्ड सरकार ने दावा किया था की संसोधन थारु, मधेसी, जनजाति, आदिवासी के हित के लिए होगा, और वास्तव में वह ऐसा चाहते हैं तो संविधान प्रस्ताव को परिमार्जित करना अति आवश्यक है । इस संविधान के संसोधन से भले ही मधेसी पार्टी या मोर्चा का आंदोलन थम जाए लेकिन मधेसी जनता का आंदोलन थमने वाला नहीं है ।
देखा जाय तो मधेसी मोर्चा, संघीय गठबंधन ने इस आंदोलन के दौरान बहुत सी गलतियां की है और आज के दिन में भी ऐसी गलतियों का क्रम जारी है । मधेसवादी पार्टी को पार्टी हित से ज्यादा मधेस हित को आगे रख कर आंदोलन करना चाहिए लेकिन यह पार्टी की वर्चस्व बढ़ाने में लग गए । मधेसी जनता की चाह है कि सम्पूर्ण थारु, मधेसी, जनजाति, आदिवासी शक्ति एक हो कर नस्लीय शासन पद्धति के विरुद्ध उतरे । अगर यह संभव हो सका तो आने वाले चुनाव में निश्चित ही भारी बहुमत से अधिकार विहीन समुदाय अपना सरकार बना सकते हैं । जनसंख्या के आधार पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की क्षमता रखने वाले थारु, मधेसी, आदिवासी, जनजाति जनता अपने नेता के सत्ता और स्वार्थ लोलुपता के कारण विभिन्न अधिकारों से वंचित रहने को मजबूर हैं । मधेसी राजनैतिक व्यक्तित्व द्वारा जब तक जातिवाद, नातावाद, कृपावाद से ऊपर उठकर “मधेसवाद“ के लिए आवाज बुलन्द नही किया जाएगा तब तक मधेसी जनता सबकुछ होते हुए भी विपन्न जीवन जीने के लिए बाध्य रहेंगे ।
मधेस केन्द्रित पार्टियों का कहना है “वोट दिया पहाड़ी नेतृत्व के पार्टी को और अधिकार दिलाने की अपेक्षा मधेसवादी पार्टी से ? अधिकार की लड़ाई की अपेक्षा मधेसी पार्टी से, ऐसा क्यों ?“ अगर वास्तविकता देखा जाए तो मधेसवादी पार्टी का मधेसी जनता के ऊपर लगाया गया आरोप बेबुनियाद है और अपना चेहरा छुपाने के लिए ऐसा कह रहे हैं । सब को पता है की पहली संविधान सभा चुनाव में मधेसी पार्टी को मधेसी जनता ने कितना अधिक मत से जिताया था और मधेसी जनाधिकार फोरम और सद्भावना मिला कर संसद में मधेसी की अच्छी खासी उपस्थिति थी । परन्तु पार्टियों के अन्तरकलह, नेताओं के सत्ता लोभ, पदीय झगड़े के कारण मधेसवादी पार्टी २ से २० हो गई । तदुपरान्त आज की “नया शक्ति“ के संयोजक बाबुराम भट्टराई जी जो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री थे, पहला संविधान सभा भंग किया और दूसरा संविधान सभा का चुनाव की घोषणा किया । इस घोषणा के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि उस समय मधेसी सांसद की अच्छी खासी उपस्थिति के कारण विभेदी संबिधान बनाने में सरल नही होता । चूँकि मधेसी नेतृत्व की पार्टीयां टुकड़ो में बँट चुकी थी और दम्भ एवम् अहंकार में भर कर अलग अलग चुनाव लड़ी जिसके कारण मधेसी जनता का मत आपस में ही बंट गया और इसका फायदा पुनः पहाड़ी नेतृत्व के पार्टीयों को हुई ।
अब अगले चुनाव में अगर यही हाल रहा तो पुनः मधेशियों का मत बंटेगा और मधेसी पार्टी का हाल जैसा दूसरे संविधान सभा चुनाव में हुवा वैसा ही होगा । शंका यह भी की जा सकती है कि जो मधेसी पार्टी आंदोलन करते समय भी एकता नही कर सकते वह चुनाव के लिए क्या एकता या गठबंधन करेंगे । परन्तु अगर थारु, मधेसी, आदिवासी जनजाति एक साथ मिल कर चुनाव लड़ें तो निश्चित ही पूर्ण बहुमत से सरकार बना सकते हैं । उम्मीद करें की थारु, मधेसी, आदिवासी, जनजाति एक हो कर विभेदी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष में लड़े और जीत दर्ज कराए ।

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