जरुरी है, दृष्टिकोण में बदलाव

लीलानाथ गौतम:हमारे समाज में ऐसी मान्यता व्याप्त है कि अपाङ्गता वाले कोई भी व्यक्ति खुद कुछ भी नहीं कर सकते हैं। लेकिन अब ऐसी मान्यता गलत साबित हो रही है। इसी साल विश्व के सर्वोच्च चोटी सगरमाथा आरोहण करनेवाले रामेछाप के सर्ुदर्शन गौतम हों या साहित्यकार झमक घिमिरे, दोनों को कौन नहीं जानता – अपाङ्ग होकर भी इस तरह के प्रेरणादायी काम करनेवाले बहुत सारे हैं। कोई तो ऐसे भी हो सकते हैं, जो हमारी नजर में नहीं आए हों, लेकिन समाज और देश के लिए उन लागों के द्वारा महत्त्वपर्ूण्ा योगदान मिल रहा हो। इस तरह हमारे समाज में अपाङ्गता के प्रति रहे नकारात्मक धारणा में धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है। इतना होते हुए भी सभी अपाङ्ग व्यक्तियों को समान अवसर नहीं मिल रहा है और वैसे लोग पीछे ही रह जाते हैं। ऐसी अवस्था में कुछ अपाङ्ग लोग ऐसे भी हैं, जो किसी माने में स्वस्थ व्यक्ति से कम नहीं हैं।
व्यक्तिगत पहल में हो वा कोई संघ-संस्था के सहयोग में बहुत सारे अपाङ्गता वाले लोग अपनी आजीविका के लिए सक्षम भी हो रहे हैं। अपाङ्गता की प्रकृति के अनुसार ऐसे लोग कोई न कोई रोजगारी में भी लगे हैं। इतना होते हुए भी अपाङ्ता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण सही नहीं होने की बात बताते हैं, उदयपुर स्थायी निवासी दिनेश कार्की। हाल काठमांडू में रहनेवाले कार्की का अपना ही अनुभव है कि अपाङ्गता के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण विल्कुल आपराधिक है। उनके इस कथन के पीछे एक राज है। कार्की ने कञ्चनपुर की यशोदा सेठी के साथ प्रेम विवाह किया। यशोदा शरीरिक रुप से अपाङ्ग हैं तो दिनेश स्वस्थ। दोनों के प्रेम की निशानी एक छोटी सी बेटी ‘दिया’ भी है। लेकिन यशोदा अपाङ्ग होने के कारण ही अभी तक बहू के रूप में स्वीकार्य नहीं हर्ुइ हंै। इसलिए दिनेश कहते हैं- ‘अपवाद को छोडÞकर अपाङ्गता के प्रति हमारे समाज के दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन नहीं आ पाया है।’
इधर राज्य द्वारा उन लोगों के प्रति जैसी जिम्मेवारी बहन होनी चाहिए थी, वह नहीं हुआ। अपाङ्गता के प्रति राज्य की नीति कैसी है – इस बारे में अधिवक्ता युवक गौतम कहते हैं- ‘अपाङ्ग व्यक्ति के लिए राज्य द्वारा कानून बने हैं, लेकिन उसका प्रभावकारी कार्यान्वयन नहीं हो पा रहा है।’ फिर भी उनका कहना है कि क्रमशः अपाङ्गतावाले व्यक्ति भी अपने अधिकारों के प्रति सचेत होते जा रहे हैं, इसलिए कानून भी धीरे-धीरे क्रियाशील हो रहा है। अधिवक्ता गौतम कहते हैं- ‘मगर अभी भी राज्य और सम्बन्धित पक्ष द्वारा अपाङ्ग मैत्री वातावरण निर्माण के लिए बहुत कुछ करना बाँकी है।’
डिसेम्वर ३ तारीख अपाङ्ग लोगों के लिए अन्तर्रर्ाा्रीय दिवस मनाया जाता है। इस दिवस में होनेवाले कार्यक्रम में हमारे नेता लोग और इस क्षेत्र से जुडÞे लोग उनके पक्ष में बडÞी-बडÞी भाषणबाजी करते हैं। लेकिन उन लागों की बात पर कोई विश्वास नहीं करता। रामेछाप स्थायी निवासी चिरन केसी कहती हैं- ‘नेता लोगों की बात पर हम कैसे विश्वास करंे – उन लोगों से आश्वासन तो हम लोगों ने बहुत ही पाया है लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की अपाङ्गता सम्बन्धी विषयगत पुस्तिका-२०६९ के अनुसार नेपाल की कुल जनसंख्या का ७ से १० प्रतिशत अर्थात् २४ लाख व्यक्ति किसी ना किसी स्वरुप में अपाङ्ग हैं। इसी तरह राष्ट्रीय जनगणना २०६८ के अनुसार नेपाल में अपाङ्गता होनेवाले लोगों की संख्या साढे पाँच लाख से ज्यादा है।
अपाङ्गता कोई भी अपराध नहीं है। कोई व्यक्ति जन्मजात अपाङ्ग होते हैं तो कोई जन्म के बाद होनेवाले दर्ुघटना, प्रकोप, हिंसा, द्वन्द्व तथा किसी महामारी और दर्ीघकालीन रोग के चलते अपाङ्ग हो जाते हंै। इन सभी के मानव अधिकार का उचित संरक्षण और सर्म्वर्द्धन नहीं हो पा रहा है। राष्ट्रीय अपाङ्ग कोष में कार्यरत भरत कार्की कहते हंै- ‘जब तक कानून पर्ूण्ा रुप में कार्यान्वयन नहीं होता, तब तक अपाङ्गमैत्री वातावरण निर्माण नहीं हो सकता। हमारे यहाँ तो कानून कार्यान्वयन का पक्ष ही कमजोर है।’ क्यों ऐसा होता है – उन के अनुसार कानून कार्यान्वयन कमजोर होने के पीछे का कारण यह है कि अपाङ्गता के पक्ष में वकालत करनेवाली संघ-संस्था इसके लिए जिम्मेवार नहीं है। कार्की कहते हैं- ‘हमारे पक्ष में बोलने वाली संघ-संस्थाएं और राज्य दोनों ही इस सवाल में कमजोर हैं। यह बोलते कुछ हैं और करते कुछ और।’ कानून कार्यान्वयन की कमजोरी के कारण अपाङ्गता वाले व्यक्ति राज्य से प्राप्त सेवा-सुविधा से बञ्चित हैं और न्याय की सहज पहुँच से दूर हैं। विशेषतः शारीरिक, मानसिक, वौद्धिक एवं इन्द्रिय सम्बन्धी दर्ीघकालीन अशक्तता वाले व्यक्ति को अपाङ्ग कहा जाता है। अपाङ्ग संरक्षण तथा कल्याण ऐन २०३९ ने अपाङ्ग के सम्बन्ध में कहा है कि सामान्य दैनिक दिनचर्या करने के लिए अर्समर्थ, शारीरिक एवं मानसिक पक्ष में कमजोर रहना ही अपाङ्गता है।
कैलाली के लक्ष्मण विक के अनुसार हमारे परिवार, समाज, रीतिरिवाज और संस्कृति में बहुत सारे सामाजिक पक्ष अपाङ्गता मैत्री अनुकूल नहीं हैं। जिसके कारण भी अपाङ्ग व्यक्ति समाज में दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह जी रहे हैं। नेपाली साहित्यिक क्षेत्र में चमकते सितारे के रुप में परिचत साहित्यकार झमक घिमिरे की आत्मकथा ‘जीवन काँडा कि फूल’ के अध्ययन से भी यह पता चलता है कि हमारे समाज में अपाङ्गता के प्रति ऐसी धारणा है कि यह पर्ूवजन्म के किसी पाप का ही परिणाम है। लेकिन कञ्चनपुर की यशोदा सेठी इस कथन को नहीं स्वीकारती हैं। वह कहती हैं- ‘अपाङ्गता कोई भी पाप नहीं है। इसलिए हमारे प्रति ऐसी धारणा बनाना गलत है। उनके अनुसार समाज अपाङ्गता के प्रति उदार दृष्टिकोण नहीं रखता है। सेठी कहती है- ‘इसीके परिणामस्वरुप हमें घरपरिवार से बहिष्कृत होना पडÞ रहा है। लेकिन हम विश्वास करते हैं- किसी न किसी दिन इस मान्यता में जरूर परिवर्तन आएगा।’
जनसरोकार से प्रत्यक्ष सम्बन्ध राखनेवाले सडÞकें, विद्यालय, स्वास्थ्य संस्था आदि की संरचना अपाङ्ग मैत्री के अर्न्तर्गत नहीं है। सूचना के प्रमुख स्रोत केन्द्र के रूप में रहे इन्टरनेट सुविधा अपाङ्ग व्यक्ति की पहुँच से दूर है। नेपाल सरकार के कतिपय मन्त्रालय का वेभ साइट दृष्टिविहीन मैत्री नहीं है। बहरे व्यक्ति के लिए किसी भी सरकारी कार्यालय में दोभाषिया की व्यवस्था नहीं है। अधिवक्ता युवक गौतम कहते हैं- ‘नेपाल जैसे विकासोन्मुख देश में ऐसी व्यवस्था करने में थोडÞा समय लगता है।’
‘अपाङ्गता वाले व्यक्ति के लिए समावेशी शिक्षा हमारे यहाँ उपलब्ध नहीं है। यदि अपाङ्गमैत्री वातावरण और उसके अनुसार शिक्षा की व्यवस्था हेती तो हम भी किसी से कम नहीं है’, वाटरएड नामक एक गैरसरकारी संस्था में कार्यरत सागर प्रसार्इं कहते हंै। प्रर्साई के अनुसार जब तक अपाङ्गता लक्षित कार्यक्रम और उनके जीवनस्तर को बढÞावा देनेवाले आयमूलक, रोजगारमूलक अभियान सञ्चालित नहीं होते, तब तक अपाङ्ग व्यक्ति के जीवनस्तर में सुधार नहीं आ सकता। प्रर्साई कहते हैं- र्’र्सवप्रथम अपाङ्गता के प्रति राज्य को शिक्षा, स्वास्थ्य और कानूनी सवाल में स्पष्ट रहना चाहिए। उसके बाद ही अपाङ्ग लोगों का गुणस्तरीय जीवन का सपना साकार हो सकता है।’
अपाङ्गता को प्रकृति के आधार में सात और गम्भीरता के आधार पर चार भागों में विभाजित किया गया है। नेपाल सरकार द्वारा गम्भीरता के आधार में चार किसिम के अपाङ्गता परिचयपत्र वितरण किए जाते हैं। जिसके अनुसार पर्ूण्ा अपाङ्गता के लिए लाल रंग का ‘क’ वर्ग के परिचयपत्र, अति अशक्त अपाङ्गता के लिए नीले रंग के ‘ख’ वर्ग के, मध्यम अपाङ्गता के लिए पीले रंग के ‘ग’ वर्ग के और सामान्य अपाङ्गता के लिए सफेद रंग के ‘घ’ वर्ग के परिचयपत्र दिए जाते हंै।
लेकिन अपाङ्गता से जुडÞे बहुत से लोग कहते हंै कि परिचयपत्र वितरण प्रक्रिया वैज्ञानिक नहीं है। जानकार लोगों के अनुसार सरकारी कर्मचारी अपाङ्गता के प्रति प्रशिक्षित नहीं हैं। किस को कैसा परिचयपत्र दिया जाए, इस बारे में वे स्पष्ट नहीं हंै। कैलाली के लक्ष्मण विक के अनुसार परिचयपत्र के लिए भी यहां सोर्सफोर्स चलता है। कर्मचारी लोग भी उपरवाले के दबाब और प्रभाव मे रहते हैं। इधर अपाङ्ग व्यक्ति अपने अनुकूल का परिचयपत्र नहीं मिलने की बात बताते हैं। अगर किसी ने परिचयपत्र लिया भी हो, फिर भी उनको कानून से निर्धारित न्यूनतम सुविधा से वञ्चित रहना पडÞता है। रामेछाप की सुशीला थापा मगर कहती हैं- ‘र्सार्वजनिक सवारी साधन में हम जैसे अपाङ्ग के लिए आरक्षण सिट की व्यवस्था की गई है। लेकिन हम लोग उसका उपभोग नहीं कर पाते।’ अपने पैर के बल अच्छी तरह खडÞा होना उनके लिए मुश्किल है। सिलाई-कर्टाई का प्रशिक्षण ले रही सुशीला के लिए दैनिक र्सार्वजनिक सवारी साधन का प्रयोग अनिवार्य बाध्यता है। लेकिन सुशीला कहती हंै- ‘सवारी साधन में उनको सिट मिलना मुश्किल है। हमारे लिए सिट न देनेवालों को ‘आप लोग ही बैठिए, मैं आप से ज्यादा सक्षम हूँ’ कहते हुए मैं खडÞी-खडÞी यात्रा तय करती हूँ।’
इसी तरह लोकसेवा आयोग द्वारा सञ्चालित परीक्षा में अपाङ्गता के लिए विशेष आरक्षण की व्यवस्था है। लेकिन अपाङ्गता से जुडेÞ बहुत लोगों का कहना है कि इसका भी दुरुपयोग हो रहा है। उन लोगों का मानना है कि अपाङ्गता के कोटे में नाम निकालना सहज रहता है। इसीलिए स्वस्थ व्यक्ति भी अपाङ्गता का परिचयपत्र बनवाकर लोकसेवा की परीक्षा देते हैं। हाथ नहीं है कहकर परिचयपत्र बनवाते हैं, लेकिन खुद लिखते हंै। दृष्टिविहीन और सुस्त श्रवण कहकर परिचयपत्र बनाने वाले भी खुद परीक्षा देकर लोकसेवा उर्त्तर्ीी होते हैं। अपाङ्ग लोगों में इस तरह की बहुत सारी शिकायतें हैं। लेकिन चितवन की राधा खरेल कहती हैं- हर क्षेत्र में इस तरह की असन्तुष्टि व्यक्त करना ठीक नहीं है। उनके अनुसार हर अपाङ्ग द्वारा आत्मबल को बुलन्द करना चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए। राधा के अनुसार यदि सभी क्षेत्रों से सहयोग मिले तो हर अपाङ्ग सक्षम बन सकते हैं।
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