जलप्रबन्धन सही हाे ताे नेपाल अाैर भारत के लिए वरदान बन जाएगी बाढ

डॉ. गौरीशंकर राजहंस

२१ अगस्त

भारत का कहना था कि उसने भूटान की नदियों को भी बांधा है, वहां बराज बनाए हैं और बड़े बड़े बिजली घर बनाए हैं। वहां बहुत अधिक बिजली का उत्पादन होता है, जिसमें से 90 प्रतिशत बिजली भारत सरकार खरीद लेती है। परन्तु उसका भुगतान भारतीय मुद्रा में किया जाता है। तत्कालीन भारत सरकार ने कहा था कि वह यही व्यवस्था नेपाल में करना चाहती है। वहां जो बिजली पैदा होगी उसका 80 प्रतिशत भाग भारत खरीद लेगा। मगर इसका भुगतान भूटान की तरह नेपाल को भारतीय मुद्रा में किया जाएगा। नेपाल की सरकार इस बात के लिए तैयार नहीं हुई। वह भुगतान ‘डॉलर’ में चाहती थी। उसका कहना था कि वह बेशुमार भारतीय मुद्रा को लेकर क्या करेगी? दोनों सरकारें अपनी जिद पर अड़ी रहीं और अंतत: इस योजना का कार्यान्वयन नहीं हो सका।

इन दिनों देश के प्राय: सभी टीवी चैनलों पर अभूतपूर्व बाढ़ के कारण बिहार की दयनीय स्थिति दिखाई जा रही है, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति सिहर जाता है। जानकारों का कहना है कि बिहार में ऐसी बाढ़ पिछले पचास वर्षों में नहीं आई थी। बिहार के 14 जिले खासकर, अरहरिया, सुपौल, किशनजंग, कटिहार, पूर्णिया, पूर्वी तथा पश्चिमी चंपारण, दरभंगा और सीतामढ़ी जिले बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उत्तर और पूर्वी बिहार के एक करोड़ लोग इस विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित हैं। बाढ़ से अब तक 100 लोगों की जान जा चुकी है। यह सच है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आग्रह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों के बचाव के लिए विशेष सुरक्षा दल बिहार को भेजा है। राहत की सामग्री भी बिहार भेजी गई है। मगर टीवी चैनलों पर रोते-बिलखते बाढ़ ग्रसित लोगों के चेहरे देखकर हृदय द्रवित हो जाता है।

आधिकारिक अनुमानों के अनुसार एक करोड़ गरीब जनता इस बाढ़ से ग्रसित हो गई है। उन्हें न तो खाने के लिए कोई पैकेट मिल रहे हैं और न पीने के लिए पानी। लोग घरों से निकलकर उंची सड़कों पर बस गए हैं और आकाश की ओर देखते हुए हेलीकॉप्टरों का इंतजार करते हैं जो या तो उन्हें बाढ़ ग्रसित क्षेत्र से बाहर निकाले या पर्याप्त भोजन सामग्री व पानी दे। पीने के पानी के अभाव में लोग तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। भोजन सामग्री के जो पैकेट हेलीकॉप्टरों से गिराए जा रहे हैं वे बाढ़ ग्रसित लोगों के पास नहीं पहुंचकर पानी में बह जाते हैं।

ट्रेनें बंद हैं। सड़कें कटी हुई हैं और 21वीं सदी में भी ऐसा लग रहा है कि लोग शायद तीन-चार सौ साल पहले की जिंदगी जी रहे हैं। 2008 में जब कोसी का ‘कुसहा’ बांध टूटा था तब लगता था कि लोगों ने भयावह बाढ़ से उत्पन्न होने वाली विपदा से सीख ले ली है। उस समय ऐसा कहा जाता था कि बिहार सरकार और केंद्र सरकार मिलकर नेपाल सरकार से आग्रह करेंगी कि उन नदियों पर बांध बनाया जाए जो नदियां नेपाल से निकलती हैं। परन्तु लाख प्रयासों के बावजूद भी ऐसा संभव नहीं हो सका। बाढ़ से बिहार को छुटकारा पाने के लिए नेपाल सरकार को यह समझाना होगा कि यह उनके हित में है कि इन नदियों के उदगम स्थान पर बांध बनाए जाएं। इससे नेपाल की आर्थिक स्थिति सुखद रूप से सुधर जाएगी। उन्हें भूटान की स्थिति के बारे में समझाया जाए। भूटान से निकलने वाली नदियों को बांधकर भारत ने बेसुमार बिजली पैदा की। इससे भूटान की आर्थिक स्थिति तो अच्छी हुई ही पश्चिम बंगाल को भी भरपूर बिजली मिली, जिससे उसके मरणासन्न उद्योग धंधे फिर से जीवित हो गए।

एक बार कुछ वर्ष पहले जब नेपाल में मित्रवत सरकार थी तब करीब-करीब इस बात पर सहमति हो गई थी कि नेपाल से निकलने वाली नदियों पर नेपाल के क्षेत्र में ही बांध और बराज बनाए जाएंगे और उससे प्राप्त होने वाली बिजली से नेपाल व बिहार दोनों को लाभ पहुंचेगा। भारत का कहना था कि उसने भूटान की नदियों को भी बांधा है, वहां बराज बनाए हैं और बड़े बड़े बिजली घर बनाए हैं। वहां बहुत अधिक बिजली का उत्पादन होता है, जिसमें से 90 प्रतिशत बिजली भारत सरकार खरीद लेती है। परन्तु उसका भुगतान भारतीय मुद्रा में किया जाता है। तत्कालीन भारत सरकार ने कहा था कि वह यही व्यवस्था नेपाल में करना चाहती है। वहां जो बिजली पैदा होगी उसका 80 प्रतिशत भाग भारत खरीद लेगा। मगर इसका भुगतान भूटान की तरह नेपाल को भारतीय मुद्रा में किया जाएगा। नेपाल की सरकार इस बात के लिए तैयार नहीं हुई। वह भुगतान ‘डॉलर’ में चाहती थी। उसका कहना था कि वह बेशुमार भारतीय मुद्रा को लेकर क्या करेगी? दोनों सरकारें अपनी जिद पर अड़ी रहीं और अंतत: इस योजना का कार्यान्वयन नहीं हो सका।

जिन लोगों ने उत्तर बिहार की बाढ़ की विभिषिका को आंखों से नहीं देखा है वे इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि बाढ़ के आने पर लाखों लोग किस तरह देखते ही देखते संपन्नता से गिरकर दरिद्र हो जाते हैं। लोग मेहनत-मजदूरी करने के लिए दिल्ली, हरियाणा और पंजाब आते हैं। सालभर की कमाई करके घर इस उम्मीद में लौटते हैं कि वे अपनी बहन-बेटियों का विवाह करेंगे। वे शादी का सामान लेकर और मेहनत की कमाई लेकर घर लौटते हैं। अचानक ही नेपाल से आने वाली नदियों में बाढ़ आ जाती है और देखते ही देखते सब कुछ बहकर समाप्त हो जाता है। दुखी और निराश होकर ये गरीब और मध्यम वर्ग के लोग फिर से मजदूर बनकर पंजाब और हरियाणा मजदूरी करने के लिए लौट जाते हैं यह सोचते हुए कि अब उनकी बेटी बहनों का विवाह कैसे होगा? जिन लोगों ने उत्तर बिहार की बाढ़ की विभिषिका को नहीं देखा है वे इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। मैं 1984 से 1989 तक उत्तर बिहार के मधुबनी जिले के झंझारपुर क्षेत्र से सांसद था।

 

मैंने अपनी आंखों से भयावह बाढ़ की विभिषिका को देखा है। बाढ़ आने पर गांव के लोग पेड़ों पर चढ़कर कई दिनों तक भूखे प्यासे रह जाते हैं। नेपाल से आने वाले जहरीले सांप भी उन्हीं पेड़ों पर चढ़ जाते हैं। यह दृश्य अत्यन्त ही भयावह होता है। एक डाल पर बाढ़ से पीड़ित लोग चढ़े रहते हैं और जल स्तर के घटने का इंतजार करते रहते हैं। पेड़ की दूसरी डाल पर जहरीले सांप लटकते रहते हैं और जल स्तर घटने का इंतजार करते रहते हैं। कई बार तो ऐसा देखा गया है कि जो सरकारी या निजी नाव राहत सामग्री लेकर इन नदियों के किनारे जाती हैं उनमें पेड़ों के ऊपर से जहरीले सांप गिर जाते हैं जिनके काटने से कई राहतकर्मियों की मौत हो जाती है। यह दृश्य इतना दर्दनाक होता है जिनका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है। अंग्रेजी में एक कहावत है, ‘सीइंग इज बिलीविंग’ अर्थात यदि आप देखेंगे तभी आपको विश्वास होगा। आज बिहार खासकर उत्तर बिहार की एक करोड़ जनता त्राहि त्राहि कर रही है और किसी को यह समझ में नहीं आ रहा है कि उनका भविष्य क्या होगा और बाढ़ की विभिषिका से उन्हें कब राहत मिलेगी?

उचित तो यह होगा कि हर वर्ष सांसदों के एक दल को मानसून सत्र में बिहार भेजा जाए, जब उत्तर बिहार बाढ़ से ग्रसित होता है। जब वे लोगों की व्यथा को अपनी आंखों से देखेंगे तभी सरकार पर दबाव बनाएंगे कि बिहार को स्थायी रूप से बाढ़ से छुटकारा मिले। केंद्र सरकार नए सिरे से प्रयास करे और नेपाल के साथ उसी तरह का समझौता करे जैसा उसने भूटान के साथ किया है। बिहार के लोगों को मरने के लिए नहीं छोड़ सकते।

साभार दैनिक जागरण से

 

(लेखक पूर्व सांसद हैं)

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