जवानी जिसके-जिसके पास जवाना उसके उसके साथ
गणेश नेपाली

यों तो जीवन ही बहुत छोटा है, जो देखते-देखते बीत जाता है। उसमें भी जवानी तो वायु बेग का एक झोंका मात्र है। अधिक से अधिक बादल की एक छाया, जो आई और गई। परन्तु यह एक ऐसा अवसर है जो प्रकृति से वरदान स्वरुप मिला है। इस में है उमंग, उत्साह, जोश और कुछ कर गुजरने की तमन्ना। यह उमर यथास्थिति को कतई नहीं स्वीकारती। यह उमर नई दुनियाँ बनाने का सामर्थ रखती है। यह उमर अन्याय अत्याचार, शोषण, दमन और पक्षपात नहीं स्वीकारती। दृढÞ संकल्प शक्ति और अतुल शक्ति का स्रोत है जवानी। यही उमर रामकृष्ण, बुद्ध और गान्धी को पैदा करती है। और पैदा करती है सीता, राधा, दर्ुगा काली, सरस्वती तथा गार्गी को भी।
इसी उमर की देन हैं वीर विश्वेश्वर, लौह पुरुष गणेशमान, पुष्पलाल तथा मनमोहन अधिकारी भी। इसी उमर की देन हैं, अमर शहीद दशरथ चन्द, धर्मभक्त, शुक्रराज तथा गंगालाल। और इसी उमर की देन हैं प्रथम गणतान्त्रिक शहीद दर्ुगानन्द झा तथा रमेश महतो। जिनके सहादत के बलपर हम नव नेपाल के निर्माण हेतु विभिन्न बाधाओं को पार करते हुए आगे बढÞ रहे हैं। उन्ही शहीदों ने हमे जीना सिखाया, मरना सिखाया। ऐसा जीना ऐसा मरना, जो अपने लिए नहीं वरन देश और समाज के लिए हो। वे संदेश देते गए कि भले ही थोडेÞ दिन जीओ, मगर सर उठाकर जीओ।
स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन, स्वस्थ विचार और स्वस्थ दृष्टिकोण युवाओं की पहचान है। जो हार की कल्पना भी नहीं कर सकता। ऐसे तो हमारे यहाँ १६से ४० तक की उमर को युवावस्था माना गया है। परन्तु हमने इसी उमर के बृद्ध भी देखे हैं और देखे है ७० वर्षके जवान भी। आप ताज्जुब ना करे। आपने भी जवानी के खेल में वृद्ध अवश्य देखे होंगे। वह जो शरीर से युवा दिखता है, पर विचार से निराश-हतास, और नकारात्मक सोच रखता है। जिसकी बोली और दैनिकी में आशा, भरोसा और उत्साह नहीं, जो जीवन संग्राम के मैदान छोडÞ कर एक किनारे दुबका बैठा हो, वह बीमार वृद्ध नहीं तो और क्या है – और जो शरीर से वृद्ध दिखे, अवश्य पर जो यथास्थिति से पंगा ले रहा हो और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए संर्घष्ारत हो, वह स्वप्न-द्रष्टा, जिसकी एक आवाज पर युवा हर कर्ुवानी देने को तत्पर हों, वह युवा है। वीर विश्वेश्वर और लौहपुरुष गणेशमान सिंह इसके उदाहरण हैं।
विगत ७०-८० वर्षों से हम नेपाली नया नेपाल की लडर्Þाई लडÞते आ रहे हैं। इसके दरमियान स्वतन्त्र, सम्पन्नता तथा समानता के लक्ष्य प्राप्तिहेतु युवा निरन्तर संर्घष्ारत हैं। इस बीच हमारे देश के युवा वीरगति को प्राप्त हुए। कितनों ने तो अपनी समस्त आकांक्षाओं को तिलाञ्जलि देकर जेल में ही प्राण त्याग दिए। जेल, नेल, सेल और प्रवास का दौर जारी रहा। क्रूर राणा शासन से देश को मुक्ति मिली। तानाशाही राजतन्त्र का सफाया हुआ। परन्तु परिवर्तन रुप पक्ष मात्र हुआ, सार पक्ष वैसा ही रह गया। हम निरन्तर शहीदों को श्रद्धाञ्जलि देते आ रहे हैं। उनके सपनों को साकार करने की प्रतिज्ञा लेते आ रहे हैं। परन्तु व्यवहार में ऐसा कुछ हो नहीं रहा। आज से लगभग ४०-५० वर्षपहले हमारे सहयात्री मुल्क भारत, चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, मलेशिया सब आगे निकल चुके हैं। वे सभी मुल्क या तो विकसित हो चुके या फिर विकासशील मुल्कों की श्रेणी में हैं। पर हमारी हालत निरन्तर बद से बदतर होती जा रही है। नेपाल में आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जडÞ जमाए हुए हैं। दैनिक हजारों युवा विदेश पलायन करने के लिए बाध्य हैं।
ऐसा नहीं कि हमारे पास स्रोत साधन की कमी है। छोटा और सुन्दर देश नेपाल विविधताओं से भरपूर है। हमारे पास विश्वका सर्वोच्च शिखर सगरमाथा है। हिमालय की लम्बी श्रेणियाँ हैं। महाभारत की उँची-उँची चोटियाँ हैं। बचे-खुचे बन-जंगल हैं, जिनमें कीमती लकडियाँ तथा जडÞीबूटियाँ हैं। हिमालय से निकलनेवाली नदियों की बेगबती जलधारा कुछ करो, शीघ्र करो का सन्देश देती हर्ुइ हिन्द महासागर में समाती जा रही है। मगर तर्राई की उर्वराभूमि सूखी पडÞी है। पूरा देश अन्धकार में डूबा है। उर्जा की अत्यधिक किल्लत है। सैकडÞों मेगाबाट विद्युत् ऊर्जा पैदा करनेवाली नदियाँ अभिशप्त बनी हर्ुइ हैं। निर्माण कार्य ठप है। उद्योग धन्दा बन्द है। कलकारखाने या तो बन्द पडÞे हैं या फिर घाटे में चल रहे हैं। आज हमारा हाल यह है कि हर उपभोग्य वस्तु आयात करना पडÞ रहा है। चाबल, गेहू, दलहन, तेलहन, दूध, मांस, मछली, अण्डा, फल-फूल, तरकारी कपडÞा, कागज, दवा तथा निर्माण सामग्रियाँ सब आयातित है, निर्यात करने के लिए हमारे पास कुछ है तो सिर्फयुवा श्रम।
यह सब क्या है – ऐसा क्यों हो रहा है – ऐसा इसलिए हो रहा है कि हमने राणा को तो खारिज किया पर राणा प्रवृति को नहीं। राजशाही की भी समाप्ति तो कर दी परन्तु सामन्ती संस्कार तो कायम ही रहा। जाने-अनजाने हम सब उसी रास्ते पर आगे बढÞ चले, जिस रास्ते से राणा और राजा चल रहे थे। फलस्वरुप हम वहीं के वहीं है। जब तक प्रवृत्ति में बदलाव नहीं लाते, हम आगे नहीं जा सकते। जो भी पार्टर्ीीत्ता में आई, जो भी व्यक्ति उच्च पद पर आसीन हुए, उनका चिन्तन और प्रयास रहा कि ‘अब हमारी बारी है।’ इसलिए भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। नीचे से ऊपर तक संगठित भ्रष्टाचार है। केन्द्र, जिला और गाँव-गाँव में विकास के रकम का दुरुपयोग हो रहा है। नेता कर्मचारी तथा प्राविधिक सब ब्रम्हलूट में तल्लीन हैं। पूँजी का अत्यधिक दुरुपयोग होने से बजेट घाटे में जा रहा है। माहौल यह है कि भ्रष्टाचारी लोग समाज में सम्मानित जीवन जी रहे हैं। कथनी और करनी में आकाश-पाताल का अन्तर है। निरन्तर देश और मधेश की दुहाई दी जा रही है। पर काम न देश का हो रहा है और न मधेश का।
इसका प्रमुख कारण है चारित्रिक पूँजी का अभाव। पूँजी तो बहुत तरह की होती है, परन्तु सर्वोत्तम और अति आवश्यक पूजी चारित्रिक है। जिस देश और समाज के नेतृत्व पंक्तियाों में चारित्रिक पूजी का अभाव होता है, वह देश और समाज कतई आगे नहीं बढÞ सकता। सत्य प्रत्यक्ष है कि यहाँ यत्र-तत्रर्-र्सवत्र विचलन ही विचलन है। राष्ट्रियता में विचलन, लोकतन्त्र में विचलन, संगठनात्मक विचलन, वैचारिक विचलन, नीतिगत विचलन और सौद्धान्तिक विचलन। जनआन्दोलन और मधेश आन्दोलन के मर्म और भावना की धज्जियाँ उडÞाइ जा रही हैं। यहाँ तो एक मात्र राजनीतिक क्रान्ति चलती आ रही है। फलस्वरुप यहाँ जनचेना का स्तर तो ऊपर उठा है, मगर अधिकार के पक्ष में मात्र। कर्तव्य पक्ष का जनचेतना के स्तर पर कोई स्थान नहीं है।
राजनीतिक क्रान्ति के अलावे यहाँ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक नैतिक हरेक क्षेत्र में क्रान्ति की जरुरत है। ऐसा तब तक नहीं होगा, जब तब युवा आगे नहीं आयेंगे। युवा शक्ति ही देश की अमूल्य सम्पत्ति है। युवा वर्ग ही परिवर्तन के अजस्र स्रोत हैं। युवा आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रुपान्तरण के अग्रदूत तथा संवाहक शक्ति हैं। साहस, सिर्जनशीलता, सीखने की क्षमता एवं उच्च आत्मविश्वास के कारण यह वर्ग राष्ट्र के प्रमुख धरोहर के रुप में होता है। यही वर्ग राष्ट्र निर्माण का प्रमुख स्रोत भी माना गया है। नेपाल के हरेक आन्दोलन में युवा की भूमिका अग्रणी रही है। विगत के शान्तिपर्ूण्ा जनान्दोलन, दश वर्षका सशस्त्र युद्ध, मधेश आन्दोलन, थरुहट आन्दोलन सबों में युवाओं की भूमिका अग्रणी है। अतः समृद्ध, आधुनिक, न्याययुक्त नेपाल के निर्माण में युवाओं की भूमिका अपरिहार्य हो गई है। युवा वर्ग आगे बढÞें और नेपाल के नव निर्माण का बागडोर अपने हाथों में थाम लें।

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