जश्न-ए-जिन्दगी

mukunda acharyaमुकुन्द आचार्य:जिन्दगी एक जश्न है । जिन्दगी को एक जश्न के रूप में देखना चाहिए- ऐसा किसी नेपाली टीवी चैनल ने कहा था । कुकुरमुत्ते -छत्रक) की तरह उग आए अनेक चैनलों में से किसी ने यह बकबास की होगी, अभी नाम याद नहीं आ रहा । आपने भी सुना होगा, ‘जिन्दगी एक उत्सव है ।’
अरे वाह ! बात तो सुनने में शानदार लगती है । पर झटपट यकीन नहीं होता । सोचा किसी तजर्ुर्बेकार से ही पूछ लेते हैं । पलक झपकते ही एक बुजर्ुग मिल गए । बुजर्ुग भी मस्ती में थे । ‘हर फिक्र को धुएँ में उडÞाता चला गया’ की तर्ज पर सिगरेट प+mूके जा रहे थे । क्या वाकई जिन्दगी एक जश्न है – है तो कैसे – जब कि चारों ओर इन्सानियत का खुलेआम कत्ल होते सब देख रहे हैं । आदमी दिन-ब-दिन जानवर होता जा रहा है । हम किस मुंह से जश्न मनाएँ ।
मेरा सवाल सुन कर बुजर्ुग कुछ देर के लिए तो सन्नाटे में आ गए । फिर कुछ खाँस कर सांस को काबू में करते हुए बोले- वैसे तो बात अपने-अपने नजरिए की है । लेकिन जिसने भी यह जश्न-ए-जिन्दगी के नारे बुलंद किए हैं, वे झूठ तो नहीं कह रहे – नारे में दम तो है ।
वो कैसे – देश की सूरतेहालत जश्न-ए-जिन्दगी से मेल नहीं खाती । कैसे यकीन करे – -मेरा सवाल बेअदबी से मेरे दिमाग मे कुण्डली मार कर बैठा था ।
बुजर्ुग ने बुजर्गियत झाडÞी- देश में चारों ओर बाढÞ ने तबाही मचा रखी है । पहाडÞ-चट्टान बाढÞ के साथ-साथ सितम पर सितम ढÞाए जा रहे हैं । बस्तियाँ उजडÞ रही हैं । सैकडÞों अपनी जान गवां बैठे हैं । लोग दाने-दाने को मोहताज हैं । न सर के ऊपर छत, न पेट में अन्न के दाने । राहत के बारे में सिर्फसुना है, देखा नहीं । फिर भी आप बचे हुए हैं । आप का कुछ भी नुकसान नहीं हुआ । आपका बाल भी बांका नहीं हुआ । आप इसका जश्न नहीं मनाओगे – बडÞे कंजूस हो यार ।
सडÞक हादसे आए दिन लोगों की जान ले रहे हैं । हादसे की वजह चाहे जो हो, फिर भी आप सही सलामत हो । दोनों हाथ पैर साबूत बचे हैं । क्या यह दिल खुश करने के लिए काफी नहीं है – मना लो जश्न । कुछ तो दरियादिली दिखाओ प्यारे !
हर रोज रिश्वतखोर, अपराधी, भ्रष्टाचारी अख्तियार के चंगुल में फंस रहे हैं । अख्तियार की बुरी नजर अभी तक आप पर नहीं पडÞी । एक जश्न तो बनता ही है न – देख क्या रहे हो आप – जश्न-ए-जिन्दगी के नाम कर लो रंगीन अपनी शाम र्।र्
इबोला के भाइरस दुनिया में तहलका मचाए हुए हैं । वे भी आप का कुछ नहीं बिगाडÞ सके । वैसे हमारी सरकार्रर् इबोला का शानदार स्वागत करने के लिए बिल्कुल तैयार बैठी है । फिर भी आप-हम अभी तक बचे हुए हैं । बनता है एक जश्न तो । कहा भी गया है- पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए । मैंने तो पहले भी कहा न, आप किस नजरिए से जिन्दगी को देखते हो । आपने कैसा चश्मा पहन रखा है, दुनिया को देखने के लिए – सारा दारोमदार इसी बात पर है ।
मैं भी अपनी जिद पर अडÞा हुआ था, मार दिया सवाल का नहला- फिर आए दिन लोग खुदकुशी क्यों करते हैं – क्या जश्न-ए-जिन्दगी उन्हें रास नहीं आ रहा –
बुजर्ुर्गियत छलक पडÞी- बेबकूफों की कमी नहीं गालिब, एक ढंूढो, हजार मिलते हैं । खुदकुशी करने वाले अहमक तो होते ही हैं । गम गलत करने के लिए इस दुनिया में ढÞेर सारी चीजें हैं । खुदकुशी करना तो अहमकाना अन्दाज है, यार ! बिल्कुल बचकानी बात है ।
एक पार्क के आसपास हम लोग बातचीत कर रहे थे । इतने में पार्क में पिकनिक के बहाने मौज-मस्ती करने कुछ गाडिÞयों में लदफदे ढेर सारे मनचलों की टोली वहाँ पहुँचती है । अर्धनग्न युवा-युवती, किशोर-किशोरी सभी चहक रहे थे । अजब उल्लासमय वातावरण था । कुछ गर्लप|mेण्ड-ब्यायप|mेण्ड तो पार्क से बाहर ही चिपकना शुरु हो चुके थे ।
जनाव बुजर्ुग ने आँखों से इशारा किया । मैं भी खुद देख रहा था । किसी के चेहरे में गम की छाया भी दूर-दूर तक नजर नहीं आती थी । आजाद परिन्दे की तरह सभी उमंग-उत्साह के आसमान में उडÞान भर रहे थे । मैं उन्हें देखने में खो-सा गया ।
बुजर्ुग ने अपनी कोहनी से मुझे टहोका मारा और फरमाया- जनाब ! ये है जश्न-ए-जिन्दगी । दुनिया के गम देश की तबाही सब जाए भाडÞ में । दुनिया भर के गम लिए आप क्यों फिर रहे हैं – आप भी जिन्दगी का जश्न मनाईए । जाईए मौज कीजिए – ऐश कीजिए । पल-पल जिन्दगी मुठ्ठी की रेत की तरह फिसल रही है । शायद टीवी चैनल वालों ने ठीक ही कहा है- जिन्दगी एक जश्न है ।
मगर किस के लिए – -यह सोच-सोच कर मैं बेबकूफ फिर से सीरियस हो लिया । मरहूम शायर फिराक गोरखपुरी की याद आ गई-
मौत का भी इलाज हो शायद,
जिन्दगी का कोई इलाज नहीं ।

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