जश्न–संस्कृति का गणित,तीन महीने का उत्सव

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

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कुछ बातें स्वयंसिद्ध होती हैं, उन्हें प्रमाणित नहीं करना पड़ता । ऐसी ही बातों में एक बात यह है कि हम नेपाली मुलतः उत्सवधर्मी हैं । यों तो जीवन को ही हम एक उत्सव मानते हैं, फिर भी हम मौके खोजते रहते हैं उत्सव मनाने के लिए । व्यक्तिगत जीवन में यह बात भले ही पूरी तरह लागू न होती हो, पर सार्वजनिक जीवन में ऐसा होना कतई अपवाद नहीं है । बारिश के कारण हुई स्कूल की छुट्टी से लेकर प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के तीन महीने पूरे होना हमारे लिए उत्सव हो जाता है ।
बच्चों बड़ों की सालगिरह मनाना तो एक मान्य परम्परा बन चुकी है, पर किसी प्रधानमन्त्री को तीन महीने पूरे होने पर जश्न मनाना कुछ ऐसा आभास देता है, जैसे शुक्र है तीन महीने तो पूरे हो गये !
जश्न मनाने के अलग–अलग तरीके हैं । जैसे, देशवासियों के नाम पर सम्बोधन कर, पत्रकार सम्मेलन कर, अपने कार्यकर्ताओं के द्वारा विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटनेवाले बड़े–बड़े विज्ञापन देकर आदि ।
बरना बताइये, क्या तुक है इस बात की कि नौ महीने के लिए बनी सरकार अपने कार्यकाल के तीन महीने पूरे होने पर जश्न मनाये ।
बच्चा जब चलना शुरु करता है तो उसके हर लड़खड़ाते कदम पर मां–बाप ताली बजाते हैं । फिर बच्चा भी अपने पांव बढ़ाने की अहमियत समझ जाता है, सो खुद भी पांव बढ़ा कर ताली बजाने लगता है । ऐसा ही कुछ हमारे वक्त की सरकारें कर रही हैं ।
नेपाल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में प्रवेश पश्चात् किसी भी पार्टी ने बहुमत की सरकार नहीं बना पाई है । और न ही उन सरकारों की अवधि पाँच या तीन साल तक रही है । न्यूनतम नौ महीने और अधिकतम ग्यारह महीने तक देखा गया है । वैसे देखा जाये तो किसी भी ग्यारह महीने सरकार के लिए छह महीने की अवधि पूरी होना, लगभग आधी अवधि पूरी होना, आधी अवधि पूरी होना होता है । वर्तमान सरकार के सौ दिन पूरे हुए है । इस अवधि की सामाप्ति पर सरकार अपनी सफलताओं का आकलन करे तो एक दृष्टि से बात समझ में आनेवाली है– वह यह कि सरकार देखे, उसने सरकार बनाते समय किये गये वादों को कितना पूरा किया है और यह भी देखे कि जिन क्षेत्रों में उसे सफलताएं नहीं मिली, उसके कारण क्या थे । और फिर यह संकल्प करे कि उन कारणों का निवारण करके अपने शासन की बाँकी बची अवधि में उन लक्ष्यों को भी पूरा करेगी । पर जश्न मनानेवाली इस नयी परम्परा में आत्मलोचन और आत्मविश्वलेषण की यह बात कहीं दिखाई नहीं दी । देर सारी उपलब्धियाँ गिनायी गई हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश गिनाने लायक नहीं है । अपनी सफलताओं और तथाकथित सफलताओं के ढोल पीटना अस्वाभाविक नहीं है, पर अपने ही ढोलों की आवाज के शोर में विवक की किसी आवाज को न सुन पाने की विफलता से उबरना तो व्यक्ति के अपनी हाथ में तो होता ही है । और विवेक की आवाज यह है कि सफलताओं पर इतराने की बजाय असफलताओं का आकलन हो, ताकि नयी सफलताओं की जरुरत भरपूर हो सके ।
साल २०७२ सावन १९ गते पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ के नेतृत्व में बनी यह सरकार खुर्दबीन लेकर हर जिला का दौरा कर रही है । पता नहीं, हमारी सरकारें यह क्यों नहीं समझतीं कि बुहत सारी बातों को खुर्दबीन से देखने की जरुरत नहीं होती । देखना चाहें तो वे तन्त्री आँखों से भी देख जाती हैं, जैसे बढ़ती महगाई । सौ दिन में महंगाई कम करने का दावा किया गया था । लेकिन महंगाई में कोई कभी नहीं आयी । आम आदमी तो सिर्फ यह जानता है कि बढ़ती महंगाई के कारण पेट भरने की अपनी सारी कोशिशें नाकाम सिद्ध हो रही हैं । उसके हाथ में जो रुपया आता है, उसकी कीमत घटती जा रही है और बाजार से जो चीज वह खरीदना चाहता है, उसकी कीमत लगातार बढ़ती जा रही है । इस प्रक्रिया को अर्थशास्त्रीय सिद्धान्तों से समझने या समझाने की किसी भी कोशिश का कोई मतलव नहीं है । मतलव तो सिर्फ इस बात का कि रोटी, कपड़ा और मकान आम जनता को सुलभ क्यों नहीं है ? मतलव है तो सिर्फ इस बात का कि आर्थिक असुरक्षा के भय से जनता को मुक्त करने की कोई असरदार कोशिश क्यों नहीं हुई, देश के नौजवानों की आँखों में छायी निराशा क्यों नहीं मिट रही है ? बेरोजगारी क्यों बढ़ रही है ? प्रचण्डजी सरकार में आने के बाद इन समस्याओं का समाधान हेतु संकल्प लिये थे और वादे भी किये थे । लेकिन सारे संकल्प और वादें नाकाम सिद्ध हो रहे हैं । इसीलिए ऐसे संकल्प और वादे हर सुबह लिया जाये और हर शाम इसका आकलन हो, कि संकल्प और वादें पूर्ति की दिशा में हम कितना आगे बढ़े हैं । तब प्रचण्डजी को अपने अस्तित्व के सौ दिन पूरे होने पर जश्न मनाने–मनवाने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी । तब हर दिन किसी सफलता का जश्न मनाने का दिन होगा । तब हर दिन प्रचण्ड का कद बढेÞगा । तब अपना ढोल खुद ही नहीं बजाना पड़ेगा ।
पर वो दिन कब आयेगा ?

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