जहाँ मौत नाचती है
उदय चन्द्र दास

जिन्दगी का दूसरा नाम ही मौत है। यह शाश्वत एवं क्रूर सत्य है कि जिन्दगी अपने साथ ही मौत लेकर आती है। परन्तु, कब, कैसे और कहाँ ! यह अज्ञात होने के कारण ही मानव अपने जीवन में भौतिक भोग की लिप्सा के कारण र्सकर्म-अकर्म कार्य करने में मस्त रहता है। यह जानते हुए भी कि न जाने कहां जिन्दगी की शाम हो जाए।
सरहद के सिपाही जैसी शूरता, जहाँ शरीर के शोणित की अन्तिम बूँद में भी विजय की सनक सवार रहती है, ऐसी ही ललक लिए मानव, मृत्यु के साथ सतत संर्घष्ारत रहता है। जहाँ जिन्दगी की हार निश्चित है। मौत ऐसी बला है, जो कभी चुपके से आती है तो कभी आहट या दस्तक देते हुए या फिर डंके की चोट पर। ऐसा लगता है, जैसे जिन्दगी के साथ मौत, चूहे-बिल्ली के खेल का मजा ले रही हो। बेचारी जिन्दगी मौत के पंजे से फिसल कर अपने को आजाद होने का अनुभव कर आनन्द मनाती है। परन्तु वास्तविकता यह है कि मौत का वह क्रूर पंजा जिन्दगी को धीरे-धीरे घायल कर अपने आगोश में समेट लेता है।
अस्पताल एक ऐसी जगह है, जहाँ मौत घूम-घूमकर सैकडÞो-हजारों लोगों के बीच नाचती रहती है। मौत के इस ताण्डव नृत्य का नजारा बडÞा विचित्र, विस्मयकारी एवं डरावना होता है। टूटी-फूटी, अपंग, कहीं वैशाखी पर झूलती, अपनी ही साँसों से उधार लेती साँसे, कहीं मौत से गुहारती तो कहीं मौत को पुकारती, जिन्दगी और मौत के इस जद्दो-जहद का दृश्य जीने की ललक को पूरी तरह परिभाषित करता है। मृत्यु-शैया पर शिथिल पडÞा र्सर्वेन्द्रिय सुप्त शरीर अपनी अधखुली आँखों की भाषा से अपने स्वजन या संसार को न जाने क्या संदेश देकर सदा के लिए आँखें मूँद लेना चाहता है। बहते अश्रु-धार में घुलकर बहती आन्तरिक पीडÞा, पश्चात्ताप, क्षोभ, क्षमायाचना या और कुछ कौन जाने ! र्सकस या योगाभ्यास की तरह कलाबाजियाँ करते दिखता शैया पर पडÞा शरीर। कहीं दोनों पाँव लोहे के डंडे के सहारे ऊपर की ओर तो कहीं आधा तन अधर में लटककर झूलता रहता। कहीं व्याधि-पीडÞा से सिसकने की तो कही से कराहने की मर्माहत करती आवाजें। बोतल में बन्द रक्ताभ और गंगाजल जैसे पारदर्शी द्रव बूँद-बूँद कर टपकते हुए संजीवनी की तरह शरीर में प्रवेश कर मौत को मात देने का भरपूर प्रयत्न करते। श्वेत वस्त्रधारी महिला-पुरुष हाथों में जीवन-मापक यंत्र-मंत्र लिए मौत के इस नाच-घर में जीवन और मृत्यु से संर्घष्ा करते इन प्रतियोगियों को आश्वासन और नैराश्य के घूँट पिलाते रहते। जीवन मृत्यु का यह बाजार चौबीसों घण्टे खुला रहता। जिन्दगी का, मुद्रा के द्वारा मौत से मोल-भाव किया जाता। पर मौत को मुद्रा से भला क्या लेना-देना ! लिहाजा, बिचौलिए बीच में ही मुद्रा हडÞप लेते और बेचारी जिन्दगी मौत के हवाले हो जाती।
संसार में आनेवाले नवजात शिशु की आँखें खुलने से पहले ही सदा के लिए मुँद जातीं। ऐसा लगता, जैसे वह शिशु भी मृत्यु के इस भयानक खेल को न देखने की इच्छा के कारण ही संसार से विदा हो गया हो। नौ महीने से पल रही मातृत्व की पर्ूण्ाता एवं ममता विलखती रह जाती। किसी की डोली सजने के बजाए अर्थी में परिणत हो जाती। कोई अपने माता-पिता का सहारा खोकर अनाथ बनने को बाध्य होता तो किसी के बुढÞापे की वैशाखी टूट जाती। दीये की लौ को जिस प्रकार हवा हिलाती-डुलाती, कभी पुचकारती एवं दुत्कारती हर्ुइ अन्त में बुझा देती है, कुछ ऐसा ही नजारा मौत अपने नाच-घर में इन बेवश जिन्दगियों के साथ पेश करती है। धरती के प्रणियों के लिए भगवान समान डाँक्टर भी मौत के खूनी पंजे के आगे अपनी दवा को बेअसर होते देख ऊपरवाले भगवान से दया और दुआ की गुहार करते हैं।
करीने से कतार में सजीं चारपाईयों पर सिमटी-सिकुडÞी जिन्दगियां, स्वजनों एवं शुभेच्छुओं के घेरे में इस तरह आरक्षित प्रतीत होतीं, जैसे वहाँ मौत का प्रवेश वर्जित हो। उन लोगों के आश्वासन एवं स्नेहसिक्त शब्दों को सुन क्षण भर के लिए इन जिन्दगियों के मुख पर आए रुग्ण मुस्कान को देखकर ऐसा लगता, जैसे दीपक की लौ बुझने से पहले अकस्मात् प्रज्ज्वलित हो अधिक रोशनी बिखेर देती है। इस तरह के गमगीन वातावरण में अचानक घर के एक कोने से सामूहिक स्वर में उठे आर्त्तनाद के कारण पल भर पहले के वातावरण की भाव-भंगिमा भंग होकर भयभीत हो जाती है। लोग दौडÞते हैं, जहाँ मौत ने एक जिन्दगी निगल ली। शोकाकुल स्वजनों से सांत्वना के कुछ शब्द निकल ही रहे थे कि घर के मध्य से पुनः वक्षस्थल को चीरकर चीत्कार के साथ जमीन पर किसी को लोटते देख सांत्वना देनेवाले स्वर स्वतः संतप्त हो जाते हैं। रुग्णालय के प्रत्येक रुग्ण त्रास से कम्पित हो जाते हैं कि मृत्यु के इस नृत्य का अगला शिकार कहीं वही तो नहीं !
इतने त्रासदी भरे वातावरण के बीच मृत्यु के नाच घर में र्सवधर्म एवं र्सव-समुदाय का अनूठा समभाव देखने को मिलता है। सब एक-दूसरे को इन विषाद भरे समय में शारीरिक एवं मानसिक सहयोग करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। यदा-कदा अर्थाभाव में भी यथायोग्य अंश देकर आत्म संतुष्टि का अनुभव करते हैर्।र् इश्वर से पर््रार्थना है, अस्पताल में आने से सब को बचाएँ। अस्तु !

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