जाको राखें साइया …

बीस रोज पहले पोखरा से जोमसेम के लिए उड अग्नि एयर का डोर्नियर विमान दर्ुघटनाग्रस्त हुआ। उस में सवार चालक सहित २१ यात्रियों में १६ की मौत हर्इ और पाँच की जान बची। उन में से परिचारिका रोशनी हैजु ने दर्घटना का विवरण ऐसे दियाः
पोखरा से जोमसोम के लिए उडान भरने पर लगभग १५ मिनट बीत रहा था। जहाज अवतरण करनेका समय नजदीक था। लेकिन जहाज ने सिधा ल्यान्डिङ नहीं किया। मुझे लगा पाइलटद्वय प्रभुशरण पाठक और सुमन डंगोल ने एयर ट्राफिक के संकेत के कारण एक चक्कर लगाकर ल्यान्डिङ करने का विचार बनाया होगा। क्योंकि जोमसोम विमानस्थल के धावनमार्ग में यदि दूसरा जहाज रहता है तो प्रायः चालक अपने जहाज को पुनः आकाश की ओर ले जाते हैं और एक चक्कर लगाते हैं। यहाँ लुक्ला की तरह अवतरण करनेवाले जहाज को आपातकालीन टेकअफ करने में कठिनाइ नहीं है। इसलिए यात्रु सहित २१ सवार वाला जहाज विमानस्थल को छोडते हुए कालिगण्डकी के ऊपर उड चला।
हमारे डार्नियर में एयरहोस्टेज, यात्री और चालक के बीच आन्तरिक संवाद करने के लिए इन्टरकम सिस्टम न होने से जहाज क्यों ल्याण्ड नहीं हुआ, यह मुझे भी पता नहीं चला। यात्री गण भी इस बारे में अनजान थे। जहाज लगभग पाँच सौ मिटर की ऊचाइँ में रहा होगा, उस समय एक विचित्र आवाज सुनाइ दी। आवाज जोडÞ की थी। दो महीने के दौरान एयरहोस्टेज के रुप में मैंने ऐसी आवाज पहले कभी नहीं सुनी।
मैं भयभीत हो गई। पसिना छुट्ने लगा। जहाज की गति सामान्य होने से सभी यात्री चुपचाप थे। मैंने आँख बन्द करते हुए सीट को कसकर पकडÞा। जहाज में कम्पन महसूस हुआ, जो मोबाइल के बाइब्रेसन के समान था। कुछ देर बाद आँख खुली। जहाज तो एक दर्रर्ेेें गिरा पडÞा था।
मेरे आगे एक नन्ही सी बच्ची रो रही थी। मेरे पीछे बैठी डेनमार्क की इमली पहाडी के ऊपर चढÞने का प्रयास कर रही थी। उसे देखकर मैने गुहार लगाई- मुझे बचाईए… ! लेकिन ‘आई एम सरी’ कहते हुए वे ऊपर की ओर बढÞने लगी। उसके बाद पिछले की सीट पर बैठे अपनी प्रेमी एन्डि्रस रसला को उन्होंने दो बार हाँक लगाई। मगर एन्डि्रस नजर नहीं आए। इमली आगे बढÞ गई। जहाज में आग नहीं लगी थी। मगर उसके चिथडे उड गए थे। मैंने चारों ओर देखा। पाइलट सहकर्मी दिखाइ नहीं दी। सीट के आगे छटपटाती हर्ुइ ६ वषर्ीया भारतीय बालिका को देखकर मुझे रोना आ गया। मैं जोरो से चिल्लाने लगी- बचाओ ! बचाओ !!
कुछ मिनट गुजर चुके थे। सुबह का समय था और नजदीक में सैनिक बैरेक होने से पहाड की चोटी पर कुछ लोग दिखाइ दिए। किसी ने हमारा रोदन सुना और कहा- एक आदमी चिल्ला रहा है। ऐसा कहते हुए वे लोग नीचे उतर आए और ‘एयरहोस्टेज जिन्दा है !!!’ कहते हुए मुझे निकाले के लिए चिल्लाने लगे। सम्भवतः वे सैनिक थे। मैंने उन लोगों से कहा- मुझे कुछ नहीं हुआ है, इस बच्ची को बचाईए।
बच्ची के पैर टुटे हुए थे। सीट में फँसी उसको बाहर निकालने में मैंने भी मदद की। उसे निकालने पर, जब मै निकलने लगी जहाज का दरवाजा मेरे पैरों पर आ गिरा। टूटे हुए बोर्ड में दूसरी घायल बालिका को भी बचाया गया। तब तक आसपास बहुत लोग जूट चुके थे। प्रायः यात्रियों की मृत्यु हो चुकी थी। उस के बाद क्या-क्या हुआ, मुझे याद नहीं, मैं बेहोस हो गई।
दस बजने से पहले वह घटना हर्ुइ। उस रोज सुबह साँढे ६ बजे मैं काठमांडू से पोखरा आई थी। जोमसोम में १० बजे के बाद हवा आँधी की तरह चलती है। जिसके चलते प्रायः उडान सम्भव नहीं होती। उस रोज मैंने उससे पहले दो बार उडान भरी थी। उसके बाद ११ बजे मेरी बारी थी। अपने ही अग्नि एयर का दूसरा जहाज जोमसोम जा रहा था। यात्रियों को लेकर जहाज उडÞने ही वाला था। हाइड्रोलिक गियर में सायद कुछ समस्या थी। क्याप्टेन एनपी प्रधान और को-पाइलट आरबी भण्डारी ने जहाज को बापस किया। उस में प्रियंका ब्रजाचार्य परिचारिका थीं। पोखरा स्टेशन में नाइन एन एआईजी -अल्फा इन्डिया गल्फ) कल साइन रहे हमारे जहाज को उडÞना था। जहाज ने टेकअफ ले लिया था। चकलेट और कपास भी वितरण हो चुका था। लेकिन वे यात्रु हमारे जहाज में आए। पोखरा स्टेशन के रोस्टर में मेरा उडÞान समय ११ बजे होते हुए भी मुझे ही उडÞने के लिए कहा गया। टेकअफ से पहले चकलेट और कपास बांटते समय यात्रिओं ने कहा था- ‘हम लोगों को चकलेट खाना नहीं है, जैसे भी जोमसोम पहुँचना है। ‘ बदले हुए यात्रियों के साथ हम लोगों का जहाज जोमसोम की ओर चला। जहाज आकाश में कुछ ऊचाइँ में पहंुचने पर ही चलना-फिरना हो सकता है। उसके अनुसार उड्डयन प्राधिकरण के नियमानुसार जहाज में यात्रा कर रहे यात्रियों का विवरण पीओबी फाइल में हस्ताक्षर कराने के लिए मैं ककपिट में घुसी। क्याप्टेन पाठक ने साइन किया। पीले रंग का पीओबी उन्होंने रखा, लाल रंग का लेकर मैं लौटी। उस समय पाठक मुस्कुराए, कोई बातचीत नहीं हर्ुइ। जहाज अन्नपर्ूण्ा और माछापुच्छ्रे श्रृखंला को बायीँ ओर करते हुए उडÞ रहा था।
करीब १५ मिनट की यात्रा अवधि में दस मिनट बीत चुके थे। मेरी सीट के पिछे बैठी इमली ने एक हिमशिखर को दिखाते हुए पूछा था- कृपया उस पहाड का नाम बताईए – मैंने कहा- यह माछापुच्छ्रे है। र्टर्भिलेन्स भी नहीं था। भारतीय यात्रियों के हाथों में कैमरे थे। मुक्तिनाथ दर्शन के लिए आए वे लोग फोटो खींचने में व्यस्त थे। ल्याण्ड करते वक्त सबों ने सिटबेल्ट बाँधा। बिलकुल सामान्य अवस्था थी। लेकिन ल्याण्डिङ करने के बदले जहाज मुक्तिनाथ की ओर रवाना हुआ। मुझे काठमांडू आने पर पता चला, जहाज में प्राविधिक समस्या दिखने पर क्याप्टेन ने पोखरा लौटने का निर्ण्र्ााकिया था।
दर्ुघटना के बाद मैं भी मर गई हूँ, यह खबर टिभी और रिडियो ने फूक दी। मिडिया के कच्चे लोगों ने ब्रेकिङ न्यूज देने की जल्दबाजी में मुझे मृत घोषित कर दिया। वैसे मुझे तो कुछ नहीं हुआ था। लेकिन भक्तपुर, लोकन्थली में मेरे मातापिता और अपनेजन को खबर सुनने पर कैसा महसूस हुआ होगा – इस प्रकार के ब्रेकिङ समाचार देने की प्रवृत्ति से मैं बहुत दुःखी हूँ। घटना के बाद मैंने घटनास्थल पानी टं्याकी से किसी की मोबाइल माँगकर फोन किया। मैंने सिर्फ’मम्मी’ कहा था। मेरी आवाज सुनते ही मम्मी और जोरो से रोने लगीं। और कोई बात नहीं हो सकी। मेरी मोबाइल, पैसा, पर्स, नाइट स्टप में बदलने वाले कपडÞे इन सभी का झोला न जाने कहा खो गया, मुझे अभीतक नहीं मिला है। मोबाइल वाले ने कहा- मिस ! अब बात में बात कीजिएगा। और मैंने उनको मोबाइल लौटा दिया।
उस रोज खास मेरी डिउटी नहीं थी। दूसरे के बदले मैं उडी थी। गौरी केसी की डिउटी थी। पोखरा में हम नौ लोग क्रयु मेम्बर थे। जिस में हम तीन एयरहोस्टेज थे। शाम को पोखरा में नाइट स्टप था। दर्ुघटना में मृत क्याप्टेन पाठक के साथ मेरी यह दूसरी उडान थी। ठीक से जान पहचान भी नहीं थी। को-पाइलट सुमन के साथ अच्छा सम्बन्ध था। उन को मैंने बहुत मिस किया।
इस समय मैं जीवित हूँ, यह जानकर मेरे संगी साथी शुभेच्छुक सभी मुझ से मिलने आ रहे है। मैं कैसे बची सब इस पर चकित है। आनेवाले लोग घटना से भी ज्यादा मैं कैसे बच गई, इस बारे में मेरी मा से कहते है- आप बहुत भाग्यशाली है। विमान दर्ुघटना में भी आपकी बेटी बच गई।
प्रायः मैं प्रत्येक दिन पत्रिका में राशिफल पढती थी, उस रोज सुबह साढे ५ बजे एयरपोर्ट जाना था, इसलिए मैं पढ नहीं पाई। लेकिन उसी रोज मेरी मा कुछ लोगों के साथ ज्योतिषी के पास गई थी। ज्योतिषी ने वह दिन मेरे लिए अशुभ कहा था। लेकिन मै बच गई। अस्पताल में आनेवालों ने पूछा था- अब क्या करोगी – मैंने कहा- मैं फिर उडान भरुंगी। मैं इसी पेशा को निरन्तरता दूंगी। मेरे इस निर्ण्र्ाामें माता-पिता और अस्ट्रेलिया में रहनेवाले बडÞे भाई सभी का र्समर्थन है।

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