जातीय मनोविज्ञान घातक:सुरेन्द्र पाण्डे

सुरेन्द्र पाण्डे
सभासद, नेकपा एमाले

संघीयता के सम्बन्ध में राज्य पुनर्संरचना समिति ने शुरु में ही कार्यदल बनाकर एक अध्ययन किया था। जिस से दो प्रकार का नक्शा सामने आया। एक में ७ और दूसरे में १४ प्रदेश दिखाया गया। ७ प्रदेश बनाने पर तर्राई में दो प्रदेश और १४ प्रदेश बनाने पर तर्राई में ४ प्रदेश प्रस्तावित थे। उस समय एमाले के अन्दर भी १४ प्रदेश में जाने की चर्चा थी। मगर १४ प्रदेश बनाने पर तर्राई में ४ प्रदेश बनता, जिसे मधेशी दलों ने स्वीकार नहीं किया। इसलिए जडान और शर्ेपा राज्य जोड दिए गए। आवश्यक गृहकार्य और तथ्य प्रमाण के आधार पर उस समय १४ राज्य का प्रस्ताव नहीं आया था। पहचान और सामर्थ्य को आधार मानते हुए संघीयता में जाने की बात हम लोग स्वीकार करते हैं। उदाहरण के लिए १४ प्रदेश में १० को जातीय अथवा सांस्कृतिक आधार माना गया। मगर बाँकी ४ प्रदेश को निश्चित जाति की बहुलता के आधार पर नक्साकाट हुआ है। मगर जातीय नाम नहीं देकर तटस्थ नाम रखा गया। जैसे सुनकोसी में क्षत्रीयों की बाहुल्यता है। मगर नाम है, सुनकोसी। नारायणी में ब्राम्हणों की बाहुल्यता है, मगर नाम रखा गया है, नारायणी। इसी तरह कर्ण्ााली और खप्तड में क्षत्रीय बहुसंख्यक है, मगर नाम दूसरा ही है। इस तरह देखने पर किसी को जातीय पहचान आवश्यक और किसी को अनावश्यक दिखाया गया है। जब किसी जात के पहचान को आवश्यकता नहीं है तो फिर दूसरी जाती को पहचान की क्या जरुरत है –
सिर्फमनोविज्ञान और राजनीतिक कारण से संघीयता में जाने का प्रयास दिखाइ देता है। पृथ्वी नारायण शाह ने जब नेपाल का एकीकरण किया तो उस समय कुछ जाती पीछे रह गई। उन को न्याय मिलना चाहिए। सिर्फयही मनोविज्ञान दिखता है। इस दृटिकोण से देखने पर राज्य पुनर्संरचना में पहचान की व्याख्या होनी चाहिए। पहचान का अर्थ सिर्फजाति है या और कुछ भी है – कल तक जातीयता का मनोविज्ञान ही काम कर रहा था। इसके चलते समस्या खडÞी हो गई है। पहचान कहने पर जाति के अलावा और बहुत कुछ होता है। इन सब बातों को ध्यान में रखना जरुरी है।
दूसरे देशों मे संघीयता का अभ्यास कैसे हो रहा है, इसे अध्ययन करने के लिए मैं भी विदेश गया हूँ। संसार में कही भी प्रायः जातीय राज्य नहीं है। नेपाल के सर्न्दर्भ में १४ प्रदेश में जाने पर किसी प्रदेश में भी किसी जाति का बहुमत स्पष्ट नहीं दिखाइ देता। किसी जगह में कोई खास जाति ५० प्रतिशत से ज्यादा हो तो उस प्रदेश को उस जाति के नाम पर रखा जा सकता था। किसी जात का नाम जुटते हीं उस जात का भला होगा, ऐसा मनोविज्ञान है लेकिन ऐसा होगा हीं यह कोई नहीं कह सकता। अभी तो हम लोग कितने प्रदेश बनेंगे, इसी छलफल में केन्द्रीत हैं। अभी की स्थिति में सामर्थ्य और पहचान को आधार मान कर ७ अथवा ८ प्रदेश बनाना मेरे विचार में अच्छा रहेगा।
मेरी मान्यता है, सभी प्राकृतिक स्रोत साधन, सम्पर्ूण्ा राज्य के अधीन में होना चाहिए। केन्द्रिय राज्य का अधिकार होते ही वह सब का होगा। उपयोग के लिए वह सभी नागरिकों का होना चाहिए। मुझे लगता है, मेरी पार्टर्ीीो भी यही धारणा अख्तियार करना चाहिए। क्योंकि आज के समय में जो, सम्पत्ति हम नहीं बना सकते, उस का बटँवारा हमे नहीं करना चाहिए। आदमी द्वारा निर्मित वस्तु को बाँटा जा सकता है, मगर प्राकृतिक स्रोत साधन को बाँटते समय सब कोई उसे उपभोग कर सकें, कानून द्वारा ऐसी व्यवस्था स्पष्ट रुप में होनी चाहिए।
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