जातीय संघीयता किसी भी देशप्रेमी को स्वीकार्य नहीं होना चाहिए

० सब से पहले तो आप को ँपृथ्वी प्रज्ञा पुरस्कार’ की प्राप्ति के लिए हिमालिनी की ओर से हार्दिक बधाई !  किस आधार पर यह अति महत्त्वपर्ूण्ा पुरस्कार प्रदान किया गया है – जरा इस पर प्रकाश डालें।

Modnath-Prashit

मोदनाथ प्रश्रति
वरिष्ठ नेता नेकपा एमाले, तथा साहित्यकार

– नेपाल के सम्पर्ूण्ा वाङमय के वरिष्ठतम तथा तथा प्रख्यात साधक को उसकी साधना और योगदान राष्ट्र और समाज के लिए उपयोगी हो तो तथा ऐसे साधकों में साधक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित हो तो यह पृथ्वी प्रज्ञा पुरस्कार उसे दिया जाता है।
० प्रज्ञा तो युगों तक राजावादी संस्कृति का पृष्ठपोषक रहता आया है, और आप ठहरे प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक, फिर यह कैसे सम्भव हुआ –
– लगता है, प्रज्ञा प्रतिष्ठान की सोच में समयानुकूल परिवर्तन आया है। गणतन्त्र की हवा प्रज्ञा के प्रकोष्ठों में घुस चुकी है, ऐसा आभास मिल रहा है। खैर, इस बदलाव को शुभसूचक ही माना जाना चाहिए। देर आए दुरुस्त आए !
० वर्तमान नेपाली साहितय की अवस्था कैसी है – कौन सी विधा कमजोर लगती है –
– नेपाली साहित्य में वैसा तो हर विधा में कलम चल रही है। मगर मुझे लगता है, इधर कुछ वर्षों से गीति रचनाओं में आर्श्चर्यजनक उछाल आया है। मगर अन्य किसी भी विधा में कोई ठोस काम नहीं हो पा रहा है।
० नेपाली साहित्य में विगत कुछ वर्षों से डा. गोविन्दराज भट्टर्राई के नेतृत्व में उत्तर आधुनिकवाद का हो-हल्ला मचा हुआ है। तामझाम के साथ साहित्यिक गाष्ठियों में इस पर चर्चे होते रहते हैं। इस बारे में आपकी राय – समालोचना के मानदण्ड में कुछ परिवर्तन हुआ है –
– हाँ, डा. भट्टर्राई की इस सम्बन्ध में कुछ कृतियां, जैसे ‘उत्तर आधुनिक ऐना -२०६३)’ और ‘उत्तर आधुनिक विमर्श -२०६४)’ प्रकाश में आई हैं। डा. अभि सुवेदी और डा. ध्रुवचन्द्र गौतम जैसे विशिष्ट विद्वान लेखकों ने भी उन कृतियों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। लेकिन यह उत्तर आधुनिकवाद पश्चिमी देशों में भी अब आउटडेटड हो चुका है, जहां से नेपाली साहित्यकारों ने इसे लिया है। वैसे तो किसी भी नई वस्तु के प्रति लोगों की उत्सुकता होती ही है। यह तो मानव मनोविज्ञान की एक सामान्य प्रक्रिया है। पुरानी शराब को नई बोतल में पेश की जा रही है।
० आपने बहुत कुछ लिखा और बहुत कुछ पढÞा है। आपने अब तक जो कुछ पढÞा है, उस में स्मरणीय, उल्लेखनीय –
– लालित्य और विचार के दृष्टिकोण से शेखर गौतम की पुस्तक भरत खण्ड और पंडित राहुल सांकृत्यान की कालजयी कृति मानव समाज हैं, इन्हें मैं भूल नहीं सकता। वैसे नेपाली साहित्य में भी कुछ स्मरणीय कृतियाँ जरूर हैं। पढÞने की रुचि भी तो भिन्न-भिन्न होती है। कविता का बाना पहन कर सत्य और भी चमक उठता है, किसी विद्वान का ऐसा भी कहना है।
० नेपाली साहित्य को विश्वसाहित्य के स्तर में पहुंचाने के लिए क्या करना होगा –
– एक बडेÞ दुःख की बात है कि हमारे रचनाकार छोटी-छोटी समस्याओं के चक्कर में उलझ कर, रह गए। लेखन में भी विस्तृत दृष्टिकोण नहीं अपना सके। उदात्त दृष्टिकोण, विश्वबंधुत्व, पूरे विश्व को ध्यान में रख कर लिखना ये सब अपेक्षित रूप में नहीं हो सका। यौन परक साहित्य की रचना धडÞल्ले से हो रही है आजकल। लोगों की रुझान भी वैसी ही है। मनोविज्ञान के नाम पर यौन साहित्य को परोसा जा रहा है। कुछ लोग तो अपराध साहित्य में उलझे हुए हैं। इस तरह हमारी रुचि में भी विकृति आ रही है। ‘साहित्य का क्षय देश का क्षय है’ जाँन वोल्फ गैंग वान गोइथे का ऐसा कहना है।
० कुछ साहित्यकार कहते हैं, इस स्वार्थभरी दुनियां में कोई भी रचनात्मक व्यक्ति एकांतजीवी हो कर रहना चाहेगा या बाध्य होगा। यह कथन आप को कैसा लगता है – क्या आप इस कथन से सहमत हैं –
– यह कथन विलकुल सही है। जेल में बडÞे-बडेÞ ग्रन्थ लिखे गए हैं। लेखक, साहित्यकार, चित्रकार, शिल्पी, वैज्ञानिक सभी को एकान्त- साधना की आवश्यकता होती है। एकान्त सेवन तो उसकी तपस्या है। एक भारतीय विद्वान अनन्त गोपाल शेवडे का कहना है- सच्चे साहित्य का निर्माण एकान्त साधना और एकान्त चिन्तन में होता है। जेल के एकान्त में बहुतों ने अच्छी-अच्छी किताबें लिखी हैं। इतिहास इसका साक्षी है।
० आपकी प्रकाशित कृतियां कितनी हैं – उन में से आपकी पसंदीदा कौन-कौन सी हैं –
– मेरी प्रकाशित कृतियों की संख्या ५४ है। कतिपय कृतियां प्रकाशोन्मुख हैं। कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों का नाम इस प्रकार है- मानव महाकाव्य, देवासुर संग्राम-महाकाव्य, देशभक्त लक्ष्मीवाई- उपन्यास, वैचारिक विकास को सर्न्दर्भमा लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा- समालोचना, भूतप्रेतको कथा- मनोविज्ञान, जीवाणुदेखि मानवसम्म-विज्ञान, जातपात छुवाछूतको संक्षिप्त इतिहास, नेपाली इतिहासको छोटो विचेचना- इतिहास, वनौषधि चिकित्सा-चिकित्सा, नेपालको एकीकरण र पृथ्वीनारायण शाह- प्रबन्ध संग्रह, गोलघरको सन्देश -लघुकाव्य आदि। वैसे तो माता-पिता को अपनी सभी संतान प्यारी लगती हैं, उसी तरह रचनाकार के लिए उसकी सभी रचनाएं प्रिय होती हैं।
० देश की वर्तमान राजनीति को देखते हुए आप क्या कहेंगे –
– नेपाल अभी संक्रमणकालीन अवस्था से गुजर रहा है। बहुत सारे क्षेत्रों में सुव्यवस्था की जरूरत है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता के प्रति चिन्तनशील लोगों की कमी नजर आ रही है। अभी राष्ट्रवादी शक्तियों को एक होना जरूरी है। जनता और नेतर्ृवर्ग दोनों पक्ष में राष्ट्रीय भावना होनी चाहिए। नेपाल जैसे एक छोटे से राज्य में जातीय राज्य की परिकल्पना और मांग अनुचित, अव्यावहारिक और हास्यास्पद है। नेपाल के एक सुपुत्र बुद्ध ने अपने ज्ञान से विश्व को आलोकित किया। पृथ्वीनारायण शाह ने छोटे-छोटे टुकडÞो में बटे नेपाल का एकीकरण किया। भूगोल, जनसंख्या, भाषा, संस्कृति, अर्थतन्त्र और मानोविज्ञान के एकीकरण से राष्ट्र का निर्माण होता है। जब इन तत्वों में से किसी एक के साथ भी आप छेडÞ-छाडÞ करेंगे, जातीय-क्षेत्रीय संकर्ीण्ा उग्रवाद को बढÞावा देंगें तो र्सार्वभौम स्वाधीन देश के सामने गम्भीर खतरा तो नजर आएगा ही। देशभक्तों की वर्तमान आशंका विलकुल अकारण और निराधार नहीं है।
० आपने सक्रिय राजनीति से क्यों संन्यास लिया –
– एक ही परिवार के अन्दर अनेकों विचार वाले लोग होते हैं। कहा जाता है- मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। व्यक्तिगत रूप से हर आदमी अपना अलग मत रखने का आधिकारी हो सकता है। मगर परिवार में रहने पर पारिवारिक हित को सर्वोपरि स्थान देना होगा। उसी तरह पार्टर्ीीें भी मतमतान्तर होते हैं। मैंने बहुतसे विषयों में अपनी राय दी, अपना लिखित सुझाव पेश किया। लेकिन सब को ठंडे बस्ते में डÞाल दिया गया। किसी के पैरों में बेडÞी डÞाल दी जाय और कहा जा कि आप दौडिÞए, तो यह कैसे सम्भव होगा – अतः राजनीति के पेचीदे गलियारों में भटकने से मुझे बेहतर लगा- अपनी कलम से यथाशक्ति साहित्य सेवा करूं। इसी के माध्यम से जनजागरण भी किया जा सकता है। बुद्धिमान को इशारा काफी कहा जाता है। आप मेरी बात समझ गए होंगे। वैसे भी मैंने शुरु से ही राजनीति की अपेक्षा साहित्य को ज्यादा महत्त्व दिया है।
० संविधानसभा के लिए दूसरी बार निर्वाचन होने जा रहा है। इसको कितना महत्त्वपर्ूण्ा मानते हैं –
– संविधान सभा का निर्वाचन देश और समय की मांग है। निष्पक्ष रूप से शान्तिपर्ूण्ा चुनाव सम्पन्न हो, जनता ऐसा चाहती है। जनता का ऐसा चाहना स्वाभाविक है। लेकिन भाषणबाजी में निर्वाचन के पक्ष में बोलने वाले नेता क्या हकीकत में चुनाव का सामना करने के लिए तैयार हैं – किसी भी नेता कर्ीर् इमानदारी, कर्मठता और देशसेवा को अगर परखना हो तो उसे चुनावी मैदान में उतरना ही होगा। अपने प्रतिद्वन्द्वी से दो-दो हाथ करना ही होगा। अगर्रर् इमानदारी से मतदान हुआ हो तो कौन कितने पानी में है, नतीजे से पता चल जाएगा। जिनकी जडेÞ जनता में नहीं हैं, सिर्फवे ही नेता चुनाव से भागेंगे। इसलिए मेरे विचार में निर्वाचन का बहुत महत्त्व है। सभी कोर् इमानदारी के साथ इस में सहभागी होना चाहिए।
० कुछ लोगों का कहना है- नेपाल को अविकसित अवस्था में रखे रहने के लिए एक षड्यन्त्र के तहत जातीयता के आधार पर संघीयता की मांग की जा रही है। क्या आप इस बात को सच मानते हैं –
– यह विल्कुल सही बात है। जातीयता के आधार में संघीयता यह किसी भी देशप्रेमी को स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सम्पर्ूण्ा जनता की एकता में आधारित लोकतान्त्रिक गणतन्त्र, न्यायपर्ूण्ा समतामुखी समाज और सुदृढÞ र्सार्वभौम, अखंड नेपाल एक सच्चे देशभक्त की चाहना होनी चाहिए। विविधता के बीच समझदारी और अनेकता के बीच एकता तथा सहिष्णुता से ही अधिकांश राष्ट्र सुदृढÞ और विकसित हुए हैं। देश को अभी फूट नहीं जूट की जरूरत है। मगर देश में ऐसे खतरनाक और विघटनकारी प्रवृत्ति देखने पर भी मौनता में मस्त रहने वाले नेता लोग और रोम के नीरो में र्फक ही क्या रह गया – िि

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