जादू हिन्दी का : रामाशीष

भारत “चीन-युद्ध” तो हार गया लेकिन  अरुणाचल का हृदय जीत लिया

बोमडीलाः लेखक और इतिहासकार बताते हैं कि भारत, १९६२ में चीन की आक्रमणकारी जनमुक्ति सेना के साथ ‘नार्थर् इस्ट प्र+mटियर एजेन्सी -नेफा)’ में युद्ध हार गया लेकिन बहुत लोग यह नहीं जानते कि हार के बावजूद भारतीय राष्ट्रवाद ‘हिन्दी के रूप में’ राज्य में भाषा की लम्बी लडर्ई जीत चुका है। तत्कालीन ‘नेफा’ अब अरुणाचल प्रदेश बन चुका है और वहां के विधान-सभा में बहस की भाषा हिन्दी बन चुकी है।
बोमडीला स्थित अरुणाचल प्रदेश पर्यटन संचालक एसोसिएशन के सलाहकार ४७ वषर्ीय शेरिंग वांगे बताते हैं हम चीन के हाथ लडर्Þाई तो हार गए थे लेकिन हिन्दुस्तान के लिए जंग जीते थे। युद्ध के दौरान बोमडीला, कामेंग सेक्टर का सैन्य मुख्यालय था।
१९६२ के युद्ध के बाद जन्मे वांगे, जो अब बिजली उद्यमी हैं, बताते हैं, सच्ची बात तो यह है कि वह युद्ध तो अनेक अरुणाचली जनजातियों के लिए वरदान साबित हुआ जो १९६२ के पहले तक मुश्किल से एक दूसरे को समझ पाते थे।
लगभग ८३,७८३ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल एवं १३.८२ लाख की आबादीवाले अरुणाचल प्रदेश में २६ प्रमुख जनजाति तथा १०० से अधिक अन्य जनजातियां निवास करती हैं।
उक्त युद्ध ने तो भारतीय इतिहास को ही बदल दिया तथा अरुणाचल प्रदेश का जन्म हुआ। और, आज की बात करें तो उपद्रवग्रस्त पूरे उत्तर-पर्ूव भारत में अरुणाचल प्रदेश ही एक मात्र ऐसा राज्य है जहां के निवासियों में भारतीय राष्ट्रीयता परमान चढी हर्ुइ है।
बोमडीला में एक निजी विद्यालय ‘गुरू पद्यसंभव मेमोरियल स्कूल के संचालक ६३ वषर्ीय दोर्जे शेरिंग बताते हैं- युद्ध के पहले, अरुणाचली जनजातियां एक दूसरे से सर्म्पर्क तथा ब्रहृमपुत्र घाटी के लोगों के साथ व्यापार करने के लिए असमी भाषा सीखा करती थीं। लेकिन, जैसे ही भारतीय सेना के जत्थों को नेफा में उतारा जाना शुरू हुआ, स्थानीय निवासियोंं को भारतीय सेना के जवानों तथा सीमा सडÞक निर्माण बल ९ठत्ज्थ्० के कर्मचारियों से बातचीत करने के लिए हिन्दी भाषा सीखनी पडÞी क्योंकि उन में से अधिकांश लोग हिन्दी क्षेत्र के ही हुआ करते थे। चूंकि, युद्ध के दौरान भरतीय सेना के पास कुल्ली नहीं थे, इसलिए वे लोग भोजन सामग्री और गोली-गठ्ठा ढोने के लिए ग्रामीण जनजातियों का ही सहयोग लिया करते थे। बस क्या था, जनजातियों ने उन लोगों से जल्द से जल्द हिन्दी समझना-बोलना शुरू कर दिया। जिन प्रशासनिक अधिकारियों और शिक्षकों ने नेफा में सब से पहले प्रवेश किया, वे भी हिन्दी भाषी प्रदेशों के ही थे और इसी माहौल ने अरुणाचल प्रदेश के लोगों को हिन्दी को द्वितीय भाषा के रूप अपनाने में सहयोग किया।
हिन्दी, इस वक्त अरुणाचल प्रदेश की अनेक जनजातियों के बीच सर्म्पर्क भाषा का स्थान ले चुकी है। अरुणाचल प्रदेश विधान सभा में बहस हिन्दी में हुआ करती है। देश के हिन्दी क्षेत्रों के अलावा अरुणाचल प्रदेश ही एकमात्र ‘हिंटरलैंड है जिसकी विधान सभा में हिन्दी में कार्यवाही संचालित होती है।
दिरांग गांव के निवासी तथा एक सीमा सडÞक ठेकेदार लाकपा शेरिंग कहते हैं- हमें इस बात गौरव है कि भारत के दक्षिण, पर्ूव और उत्तर-पर्ूव के गैर-हिन्दीभाषी राज्यों की जनता की अपेक्षा हमारे राज्य के लोग अच्छी हिन्दी बोलते हैं। इस प्रदेश के लोग जब दिल्ली, मुर्म्बई तथा अन्य उत्तर भारतीय राज्यों की यात्रा पर निकलते हैं तो वह अपने उत्तर-पर्ूव के अन्य पडÞोसी राज्यों के लोगोंं की अपेक्षा, बहुत ही अच्छी हिन्दी में एक दूसरे से बातचीत कर सकते हैं।
जनजाति समाज के ३९ वषर्ीय लाक्पा मोंग्पा बताते हैं पुरानी पीढÞी के अरुणाचल पडÞोसी १९६२ के युद्ध के पहले असमी भाषा में अच्छे-भले पारंगत थे। लेकिन, १९६२ युद्ध पश्चात् की पीढÞी असमी की अपेक्षा हिन्दी को अधिक पसन्द करती हैं। वह बताते हैं- खुद मैं जब अपने अरुणाचल के अन्य जनजाति के मित्रों से मिलता हूं तो उनसे हिन्दी में बातचीत करता हूं।
पर्ूव मंत्री तथा ‘वार आन बुद्ध, ए बुक आन चाईनीज एग्रेशन, १९६२ के लेखक डी.के. थोंग्दोक ने बताया कि युद्ध ही १९७२ में अरुणाचल प्रदेश के जन्म का कारण बना। तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और उन्होंने इसे केन्द्र शासित राज्य का दर्जा दिया जबकि इसने पर्ूण्ा राज्य का दर्जा १९८७ में पाया जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे।
‘युद्ध ने विभिन्न जनजातियों को एकजूट कर दिया और युद्ध के दौरान नागरिकों को जो कष्ट भोगना पडÞा, उसने जनता के मन में चीनियों के प्रति भारी आक्रोश पैदा कर दिया। जनजातियों के बीच भारतीय राष्ट्रवाद परमान चढÞ गया और जिसने उन्हें एकजूट कर दिया। उन्होंने भारतीय जवानों को भारी साहस के साथ लडÞते हुए देखा। फिर भी वह हार गए। ग्रामीणों ने मृत जवानों की लाशों को अंतिम संस्कार के लिए अपने कंधों पर ढÞोया- यह बताते हैं थोंग्दोक जो उस समय केवल १३ साल के थे।
थोंग्दोक के अनुसार नेपाल परराष्ट्र मंत्रालय के अर्न्तर्गत था और वह चीन और भारत के बीच लगभग एक सीमा राज्य -बफर स्टेट) की तरह था। हिमालयी पहाडÞी क्षेत्र में रहनेवाली जनजातियां मुश्किल से एक दूसरे की बोली-भाषा समझ-बूझ पाती थी। वे लोग केवल ब्रम्हपुत्र घाटी के लोगों के साथ असमी भाषा में बातचीत कर लिया करते थे।
वह बताते हैं एक दूसरे से बातचीत करने के लिए समझने-बुझनेवाली एक साझा भाषा की आवश्यकता थी तथा वह हिन्दी ही भाषा थी, जिस ने यह महत्वपर्ूण्ा स्थान पा लिया। हमलोग राज्य विधान सभा में बहस हिन्दी भाषा में करते हैं क्योंकि अंग्रेजी जाननेवाले विधायकों की संख्या बहुत ही कम है तथा वे लोग भी हिन्दी जानते हैं।
थोंग्दोक ने अपने विचारों को विराम देते हुए कहा- इस रूप में युद्ध के बाद हिन्दी ने अरुणाचल की जनजातियों का हृदय जीता और वहां की जनता के दिलोदिमाग को भारतीय राष्ट्रवाद की भावना से अभिभूत किया। हिन्दी, अरुणाचल प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के बीच ‘एकजूटता की शक्ति बन चुकी है।’ रूपा गांव के निवासी थोंग्दोक सेरतुक्पेन जनजाति के हैं। -इति)

 

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