जानलेवा वायु-प्रदूषण से कैसे बचें ? आशीष त्रिपाठी

आशीष त्रिपाठी, वीरगंज ।वायु-प्रदूषण का अर्थ है वायु में कुछ तत्वों के अधिक रूप से मिलने जुलने से वायु का प्रदूषित होना । वायु का संबंध सीधे धरती से है और इस धरती पर रहने वाले मनुष्य एवंम अन्य जीवित चीजों से भी है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से दुनिया के सामने वायु-प्रदूषण की समस्या जोड़-शोर उठ खड़ी हुई है ।
सीधे तौर पर देखा जाए तो इसका प्रकोप दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है । इसके प्रमुख कारण हैं – उद्योगों का व्यापक होना, धुआं छोड़ने वाले वाहन की संख्या में वृद्धि होना और घरेलू उपयोग के लिए ऊर्जा के परंपरागत स्त्रोतों का अधिक मात्रा में दहन होना। वायु-प्रदूषण के परिणाम जीवित चीजों एवंम मनुष्य के लिए घातक हैं, क्योंकि वायु का सीधा संबंध धरती पर जीवन से है, इसलिए यह अधिक चिंता का कारण बन रहा है ।
लोग अशुद्ध वायु में साँस लेकर अनेक प्रकार की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। शहरों में स्थिति खतरनाक सीमा को पार कर चुकी है । आज के उद्योगिक युग में संयन्त्रों, मोटर-वाहनों, रेलों तथा कारखानों की संख्या अत्यधिक बढ़ गई है । उद्योग जितने बढ़ेंगे, उतनी ही ज्यादा गर्मी फैलाएंगे । धूएँ से कार्बन मोनोक्साइड काफी मात्रा में निकलती है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है । अनुमान लगाया गया है कि ९६० किलोमीटर की यात्रा में एक मोटर-वाहन जितनी आक्सीजन का प्रयोग करता है, उतनी आक्सीजन मनुष्य को एक वर्ष के लिए चाहिए । हवाई जहाज, तेल-शोधन, चीनी-मिट्टी की मिल, चमड़ा, कागज, रबर के कारखाने आदि को ईंधन की आवश्यकता होती है । इस ईंधन के जलने से जो धूँआ उत्पन्न होता है, उससे प्रदूषण फैलता है । यह प्रदूषण एक जगह स्थिर नहीं रहता बल्कि वायु के प्रवाह से यह तीव्र गति से सारे संसार को कुप्रभावित करता है । घनी आबादी वाले क्षेत्र इससे अधिक प्रभावित होते हैं । वायु में प्रदूषण फैलता है और आक्सीजन की कमी होने लगती है ।
प्रदूषण की वृद्धि का कारण क्या है ?
टोकियो विश्व भर में सबसे अधिक प्रदूषित नगर है । यहां पुलिस के लिए जगह-जगह पर ऑक्सीजन के सिलण्डर लगे रहते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर वे उनका उपयोग कर सकें । धुएं और कुहरे की स्थिति में हवा को छानने के लिए मुँह पर पट्टी बांधनी पड़ती है । इस पर भी वहां आँख, नाक और गले के रोगों की अधिकता बनी रहती है । लन्दन में चार घण्टों तक ट्रैफिक सम्भालने वाले सिपाही के फेफड़ों में इतना विष भर जाता है मानो उसने 105 सिगरेट पिए हों ।
नियंत्रण की आवश्यकता है ?
जब तक मनुष्य प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित नहीं करता तब तक उसकी औद्योगिक प्रगति व्यर्थ है । इस प्रगति को नियन्त्रण में रखने की जरूरत है । मशीन हम पर शासन न करे बल्कि हम मशीन पर शासन करें । हम ऐसे औद्योगिक विकास से विमुख रहें, जो हमारे सहज जीवन में बाधा डाले । हम वनों, पर्वतों, जलाशयों और नदियों के लाभ से वंचित न हों । नगरों के साथ -साथ ग्राम भी सम्पन्न बने रहे क्योंकि बहुत-सी बातों में नगर ग्रामों पर निर्भर करते हैं । नगरीय संस्कृति के साथ -साथ ग्रामीण संस्कृति का भी विकास होता रहे ।
समाधान क्या है ?
वायु में गंदगी मिलाने वाले तत्वों की मात्रा को घटाकर इस समस्या से बचा जा सकता है । वन-संरक्षण और वृक्षारोपण भी इसका एक प्रभावी इलाज है । वायु-प्रदूषण को कम करने वाले उपायों पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए । प्रदूषण की समस्या से बचने के लिए यह जरूरी है कि विषैली गैस, रसायन तथा जल-मल उत्पन्न करने वाले कारखानों को आवास के स्थानों से कहीं दूर खुले स्थानों पर स्थापित किया जाए ताकि नगरवासियों को प्राकृतिक खुराक ( ऑक्सीजन, प्राणवायु) प्राप्त होती रहे । इसके साथ ही नगरों के जल-मल के बाहर निकालने वाले नालों को जमीन के नीचे दबाया जाए ताकि ये वातावरण को प्रदूषित न कर सकें । वन महौत्सव के महत्त्व को समझते हुए बाग-बगीचों का विकास किया जाए । सड़कों के किनारों पर वृक्ष लगाएं जाएं । औद्योगिक उन्नति एवं प्रगति की सार्थकता इसमें है कि मनुष्य सुखी, स्वस्थ एवं सम्पन्न बना रहे । इसके लिए यह जरूरी है कि प्रकृति को सहज रूप से अपना कार्य करने के लिए अधिक-से-अधिक अवसर दिया जाए ।

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