जाम बहादुर नेपाली
मुकुन्द आचार्य

जाम बहादुर नेपाली ! यह भी कोई नाम हुआ ! मैं भी आप से सोलहों आने सहमत हूँ । मगर यह साली जिन्दगी भी अजीब अजीब तमाशे दिखाती है । मैंने कब सोचा था की इस अजीब नामधारी जीव के भी मुझे दर्शन होंगे !
तर्राई में मैंने पचासों वर्षधूल फाँकी है । मैं उसी धूल का मुरझाया हुआ फूल हूँ । जब से यहाँ काठमांडू में बस रहा हूँ, मुझे अक्सर भोजपुरिया संस्कृति के दौर पडते रहते हैं । इस दौरे के दौरान घरवाली से लडÞ झगड कर घर में कढी बारी, पकौडी बनावाता हूँ, प्रेम से पाता हूँ, और एक दो बीडÞा पान दाबकर दिन भर चुभलाता रहता हूँ । तब जाकर कहीं भोजपूरिया संस्कृति का दौरा फुस कम होता है । कुछ देर के लिए लगता है, मैं तर्राई में तैर रहा हूँ ।
हाल में मुझे एक ऐसा ही दौरा पडा । एक पान की दुकान में मैं जमकर बैठ गया । हजरते दाग जहाँ बैठ गए बैठ गए । पान की जुगाली करते हुए मैं- कबीरा खडा बाजार में कर्ेर्डन में व्यस्त सडÞक का नजारा ले रहा था । एक दम मुफ्त में !
इतने में एक युवा ट्राफिक हवल्दार साहब सिगरेट खरीदने आए । कुछ भी खरीदने पर उसे पैसे देने की आदत न थी । हवल्दार जो ठहरा ! उसमें भी ट्राफिक हवल्दार ! नीम के पेडÞ में करेला चढा हुआ । जाम सडÞक का बेताज बादशाह ! किसी बहाने वह हमको घंटों रोककर परेशान कर सकता है, वह भी बीच सडÞक में !
दूकानदार ने डरते हुए कहा, “साहब ! पैसा … ! हाँक सुनकर हवल्दार लौटा और लगा दूकानदार को घूरने । घूरते हुए उसने पाँच रूपये की जगह दो रूपये फेंक दिए और धूआ छोडÞते हुए चल दिया । अब दुकानदार उसको घूर रहा था ।
दुकान वाला कुछ लम्बा ही फेंकता था । हवल्दार के जाते ही वह चालू हो गया, भाई साहब ! दीख रहे हैं न, इस ट्राफिक हवल्दार को ! इसका नाम और काम दोनों अजीब है ।
वो कैसे – -मुझे भी टाइम पास करना था ।
“साहब ! इसका नाम है जाम बहादुर नेपाली ! शहर में जहाँ जहाँ ट्राफिक जाम का ‘पिरेब्लम’ होता है, हाकिम लोग वहा पर इसी को भेजते हैं । जाम हटावे, घटावे आ फटावे में इ ससुरा बडÞा तेज है । ऐसा ऐसा हनर है इसके पास, सबकी खोपडिÞया घूमा देते हैं । लगता है कौवनो जिन्न साला इसके हाथ में सोंटा के बदले चिराग थमा दिया है । चुटकी में जाम का कम तमाम ! सरवा कौना जादू जानता है वा मालूम नहीं !
मेरी उत्सुकता भी परवान पर थी । मैंने फिर पूछा, वो कैसे –
दुकानदार ने सडÞक पर एक लीटर पान की पीक फेंकते हुए कहा, साहब -आँख न देखी बात नहीं है, मगर कानो सुनी जरुर है । हाय वो के लोग कहते हैं, अठारह-बीस बरस पहले यहाँ कवनो जाम में घिर जाने पर, अस्पताल पहुँचने से पहले ही इसकी महतारी ने कवनों गाडÞी में इसे भक से फेंक दिया था । ताहि से इसका नाम पडगवा- जाम बहादुर नेपाली !
“फिर ….. -” मैंने पान की जुगाली करते हुए पूछा ।
“थोडÞा बहुत पढÞ लिखकर यह जाम बहादुर पुलिस में घुस गया और लगा जाम फाडÞने । जाम फाडÞने में यह एक नम्बर का उस्ताद है ।”
मैंने आसन बदलते हुए पूछा, “काठमांडू में इतना जाम क्यों होता है –
दुकानदार ने पान की पीक के साथ कुछ यथार्थ भी थूका- यहाँ  सडÞक  साली बडÞी दुबली पतली है और इनसे इशक फरमाने वालें बडेÞ बडÞे गडिÞयन ढेर के ढेर हैं । गाडÞी जो हाँकत हैं, ओ सब टिराफिक नियम को खूब लतियाते हैं । सिरिफ बतिया बडी बडी बितियाते हैं । तभी तो साब यहाँ जाम का मौसम सदा बहार रहत है ।
“जाम से अउरी बहुते फायदा होत है । स्कूल-कालिज के छोकरे छोकरी दिन भर इधर-उधर मूँह मारत हैं, अउरी रात को घर लेट से पहुँचते हैं । दोष लगाइ देव हैं  जाम को सरकारी करमचारी जाम के बहाने अफिस मे लेट जात हैं । झूठ बोलन वालों को जाम का बहाना बढिÞया रहत है । साहब ….! यहाँ सिरफ सडक जाम नहीं न है, इहवों तो एघरि दे सबे जाम है । विकास का काम बिल्कुल जाम है ! नेता लोग देश को घिसिया रहा है । जाम से टिराफिक पुलिस का सेहत भी ठीक रहत है ।
मैंने कहा, तब तो जाम बहादुर की बहुत जरुरत है, देश में दुकानदार ने काली दन्तपंक्ति दिखाते हुए कहा, सब लोग जाम बहादुर नहीं न हो सकता है साहब ! भगवान सबको चलाक नहीं बनावत है ।

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