जारी है द्वन्द्व की राजनीति का काला युग : कुमार सच्चिदानन्द

आज जो देश में अनिश्चितता देखी जा रही है उसका मूल कारण व्यापक राजनैतिक द्वन्द्व और राजनैतिक अन्तर्संघर्ष है । यह सच है कि समय बदला, राजनैतिक परिस्थितियाँ बदलीं और इसके साथ–साथ जनाकांक्षाएँ भी बदलीं । लेकिन जनता के मनोभावों में जिस तरह का बदलाव घटित हुआ उसके अनुसार राजनैतिक दल अपना परिसंस्कार नहीं कर पाए ।madhes-aandolan-aayog-hlec

वैचारिक द्वन्द्व राजनीति का चरित्र है । लेकिन जब यही द्वन्द्व राजनीति का धर्म हो जाए तो देश की अवस्था की परिकल्पना ही हम कर सकते हैं । नेपाल के प्रजातान्त्रिक इतिहास का विगत बीस वर्ष राजनैतिक द्वन्द्व के चरमोत्कर्ष का काल रहा है । वि.सं.२०५२ से २०६२ तक के काल को हम सशस्त्र द्वन्द्व का काल कहते हैं । जबकि २०७३ से अब तक के काल को हम राजनीति के अन्धद्वन्द्व का काल कह सकते हैं । सशस्त्र संघर्ष का यह परिणाम आया कि देश में व्यवस्था बदली । राजनीति के नए एक युग की शुरुआत हुई । आवरण में ढके प्रजातन्त्र ने अपना केंचुल फेरा और देश गणतन्त्र के युग में प्रवेश किया तथा शांति, सुव्यवस्था व विकास का सपना देखा । लेकिन इसके बाद अन्धी राजनीति का जो दौर चला वह अब भी जारी है और इसके साथ ही आम लोगों के सपनों के जलने की प्रक्रिया भी जारी है । कहने के लिए विधायिका के प्रतिनिधि उनके हैं, शासन उनका है और सपने भी उनके हैं । मगर राजनीति का द्वन्द्व इतना गहरा है कि इससे उठी गर्द के गुबार में सब धुँधला नजर आता है और कहीं से कोई रोशनी की रेखा नहीं दिखलाई पड़ती । हाँ, राजनीति के घमासान की आवाजें जरूर सुनाई देती हैं । यही कारण है कि अन्तिम दस वर्षों में देश ने कई आन्दोलन देखे, अभाव का चरमोत्कर्ष देखा, व्यापक हत्याएँ देखीं, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना अवमूल्यन देखा । लेकिन इन समस्याओं के समाधान की दिशा में अब तक कोई ठोस और निष्कर्षात्मक कदम नहीं उठाए जा सके हैं और देश अभी भी अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रहा है ।
आज जो चरम द्वन्द्व की स्थिति देश में देखी जा रही है उसका कारण यह है कि देश के कल्याण की भावना से अधिक यहाँ के राजनैतिक दल दलगत कल्याण की भावना से परिचालित हैं । जो सत्ता में हैं उनकी कुछ शक्तियाँ हैं और कुछ सीमाएँ भी । इसलिए परिवर्तन के वाहक बनकर वे कुछ बेहतर करने का नजरिया रखते हैं मगर जो सत्ता के बाहर हैं वे सकारात्मकता का कोई भी श्रेय सत्ताधारियों को जाने देना नहीं चाहते और पूरी तरह चुनावी राजनीति की मनःस्थिति में रहकर सरकार के काम–काज को पूरी तरह विफल सिद्ध करना चाहते हैं । वस्तुपरकता यह है कि आगामी दिनों में तीन–तीन चुनावों से देश को रू–ब–रू होना है । उनका साध्य यह है कि विगत एक वर्ष में राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की जो परिभाषा उन्होंने खड़ी की है, उसने देश के आम लोगों के राजनैतिक चिन्तन को प्रभावित किया है । पूरा देश वैचारिक रूप से दो भागों में विभाजित है । एक वर्ग ऐसा निश्चित रूप से तैयार हो गया है जो संविधान में किसी भी तरह के परिवर्तन को स्वीकार नहीं करना चाहता । एक तरह से वे विपक्षी गठबन्धन के प्रति समर्पित हैं । उनका मानना है कि परिवर्तनवादी दलों में विकल्पों की प्रचुरता होने से परिवर्तनकामी और इसके समर्थक जनमत में विभाजन संभव है । लेकिन इसके विरोधियों में सशक्त दलों का अभाव होने के कारण इसी यथास्थितिवाद में अगर चुनाव हो जाता है तो उनकी स्थिति विजय तक पहुँच सकती है या वे अधिकतम लाभ बटोर सकते हैं । यही कारण है कि वे अपनी जिद पर कायम हैं ।
आज जो देश में अनिश्चितता देखी जा रही है उसका मूल कारण व्यापक राजनैतिक द्वन्द्व और राजनैतिक अन्तर्संघर्ष है । यह सच है कि समय बदला, राजनैतिक परिस्थितियाँ बदलीं और इसके साथ–साथ जनाकांक्षाएँ भी बदलीं । लेकिन जनता के मनोभावों में जिस तरह का बदलाव घटित हुआ उसके अनुसार राजनैतिक दल अपना परिसंस्कार नहीं कर पाए । वे यह नहीं समझ पाए कि जनतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और उसकी भावनाओं को वहन करना राजनैतिक दलों का धर्म होता है । वे यह भी नहीं समझ पाए कि व्यवस्था परिवर्तन के बाद ऐसी राजनैतिक सोच की आवश्यकता देश को होती है जो बहुजन की भावनाओं को समेट कर ले जा सके । वे यह भी नहीं समझ पाए कि देश की विधायी आवश्यकता को पूरा करने के लिए दलगत विचारों से ऊपर उठकर समग्रता में जनकल्याण की बात सोचना उनका कत्र्तव्य होना चाहिए । लेकिन सबसे बढ़कर वे यह भी समझ नहीं पाए कि भेदभाव और शोषण पर आधारित समाज में शांति नहीं होती और जहाँ शांति नहीं होती वहाँ सुव्यवस्था की कल्पना भी गुनाह है । यही कारण है कि हमारे देश के राजनैतिक दलों ने दलगत राजनीति के साए में शब्दों का कसीदा पढ़ना सीख लिया । वे इस बात से सर्वथा अनजान रहे कि शब्दों की बाजीगरी से आज के युग में जनता को दिग्भ्रमित कर नहीं रखा जा सकता । यही कारण है कि हमारे देश में राजनीति तो होती है और खूब होती है । लेकिन अनिश्चितताओं के बादल दस वर्षों से लगातार बरकरार हैं । जबकि इतना समय किसी भी देश के विकास को दिशा देने के लिए पर्याप्त होता है । लेकिन हम लगातार तकरार की राह पर चल रहे हैं जिससे अतीत की सारी उपलब्धियाँ खाक होने के कगार पर है ।
एक बात तो निश्चित है कि नेपाल की जनता, चाहे वह पहाड़ की हो या तराई की–उसे क्रंतिबोध हो चुका है । इसका मनोविज्ञान यह होता है कि जब तक उसकी भावनाएँ पूरी तरह व्यवस्था द्वारा संबोधित नहीं कर दी जाती, किसी भी समय यह जंगल की आग की तरह फैल सकती है और अपनी व्याप्ति में पूरे देश को समेट सकती है । आज जो स्थिति है कि संशोधन प्रस्ताव संविधान सभा में विचाराधीन है और इसके पारित होने के लिए जिस संख्याबल की जरूरत है वह फिलहाल सरकार के पास नहीं है । इसके लिए उसे विपक्षी का मुँह जोहना पड़ रहा है । विपक्षी बालहठ के मनोविज्ञान से ग्रस्त है । जबकि यथार्थ यह है कि इस संविधान संशोधन के पारित हो जाने के बाद भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इससे असंतुष्ट पक्ष की सारी माँगें पूरी हो जाएँगी । वस्तुतः इसे एक ‘सेफ्टी–वॉल्व’ के रूप में देखा जाना चाहिए कि इससे आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव के सम्बन्ध में जो टकराव की स्थिति देखी जा रही है, वह समाप्त होगी और देश में चुनाव का वातावरण बनेगा । एक तरह से यह संशोधन प्रस्ताव उन कुर्बानियों का भी सम्मान है जो विगत तराई आन्दोलन के दौरान हुआ था । इसके साथ ही यह संशोधन प्रस्ताव पड़ोसी देशों के साथ उत्पन्न हुए अविश्वास के संकट को भी संबोधित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है । एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय संतुलन साधने की दिशा में यह महत्वपूर्ण तो है ही, नवनिर्मित संविधान को कार्यान्वित करने की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण कदम है । लेकिन हमारे गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण सब कुछ तहस–नहस होने की अवस्था में है ।
संशोधन प्रस्ताव संविधान सभा के पटल पर है और विपक्षी इसे पारित होने देने की बात तो दूर, इस पर बहस भी होने देना नहीं चाहते तथा एक तरह से इस सरकार के सत्ता में बने रहने की नैतिकता को ही चुनौती देना चाहते हैं । सरकार के साथ समस्या यह है कि इस संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर वह संदेश देना चाहती है कि समय के अनुरूप उसकी छवि समन्वयवादी है, इसलिए जनमत उस पर भरोसा कर सकती है । इसके साथ ही सरकार की यह भी समस्या है कि स्थानीय निकायों का चुनाव न कराने का कलंक वह अपने माथे पर लेकर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी किरकिरी नहीं कराना चाहती । इसलिए उसकी नीति होगी कि संशोधन के पक्ष में भी लॉविंग करे और चुनाव कराने की दिशा में भी आगे बढ़े । लेकिन उसकी कोई भी कार्ययोजना तब ही सफल होगी जब वह मधेशी मोर्चा की माँगें जो इस प्रस्ताव के घटित होने का प्रमुख कारक है, उसे भी विश्वास में लेकर चला जाए । अगर टकराव की स्थिति पैदा होती है तो इसका खामियाजा देश को भुगतना ही पड़ेगा । क्योंकि टकराव की अवस्था में दो बातें संभव है । प्रथम या तो चुनाव नहीं होगा या चुनाव हो भी गया तो क्षेत्रीय स्तर पर जो असंतोष जारी है वह जारी ही रहेगा । लेकिन इसका एक सकारात्मक पक्ष यह होगा कि नवनिर्मित संविधान पर कार्यान्वयन की जो तलवार लटकी है, वह खत्म हो जाएगी और देश आगे बढ़ेगा । लेकिन असंतोष की आग सुलगती ही रहेगी ।
एक बात तो निश्चित है कि देश में प्रतिगामी शक्तियाँ सिर उठाने लगी हैं । कभी पूर्व सम्राट महाराज ज्ञानेन्द्र के राजनैतिक बयान आते हैं तो कभी पश्चिमी तराई में व्यापक आन्दोलन होता है । कुल मिलाकर देखा जाए तो ये सारी शक्तियाँ संघीयता विरोधी हैं । इसलिए जब पूरब–पश्चिम की अवधारणा के साथ प्रदेशों के विभाजन की बात होती है तो अभी भी उत्तर–दक्षिण विभाजन की अवधारणा भी सामने ला दी जाती है । लेकिन सवाल उठता है कि वैचारिक रूप से पीछे की ओर जाकर क्या देश को अग्रगामी दिशा दी जा सकती है ? इसलिए जिस तरह की परिस्थिति है उसमें संघीयता विरोधी तत्वों के वैचारिक एकीकरण की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । अगर ऐसा होता है तो यह एक तरह से देश के नवस्थापित प्रजातंत्र के मर्म पर भी यह आघात होगा । यह सब लोकतांत्रिक रूप में संभव भी नहीं । पुनः व्यवस्था परिवर्तन द्वारा ही इन लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है । यह व्यवस्था किस रूप में होगी इसका अनुमान किया जा सकता हैै । संभव है कि घोर वाममार्गी और घोर दक्षिणमार्गी विचारों का एकीकरण हो और किसी अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति को विश्वास में लेकर देश की शक्तियों को परिचालित कर एक नया शासन देश और जनता के माथे पर थोप दिया जाए । इसलिए अगर ऐसा होता है तो देश में एक नए अन्धयुग की शुरूआत फिर होगी और सारी कुर्बानियों तथा बलिदानों का अर्थ नगण्य हो जाएगा ।
आज नेपाल की राजनीति ऐसी गड्डमड्ड अवस्था में है कि इसकी सूरत को समझना मुश्किल है । जिस दल ने सघीयता, धर्मनिरपेक्षता आदि जैसे मुद्दे को साल भर पहले न केवल कबूल किया वरन संविधान की धाराओं के रूप में उसे अंगीकार किया, आज उसके ही नेता कहीं संघीयता के विरोध में प्रलाप कर रहे हैं, तो कही धर्मनिरपेक्षता के विरोध में । अनुशासन की सीमाओं में इन्हें बाँधने की क्षमता इन दलों के नेतृत्व में नहीं । ऐसा भी कहा जा सकता है कि इन दलों के राजनैतिक चिन्तन में ही कहीं न कहीं धुँध की स्थिति है । इसी का प्रमाण है कि आज तराई की समस्या इतनी जटिल बन चुकी है । यह सच है वि.सं. २०६२ से पूर्व जिन विन्दुओं पर मधेश को तत्कालीन शासन से उपेक्षित समुदाय को शिकायत थी उसमें से अधिकांश को विभिन्न आन्दोलनों द्वारा अंतरिम संविधान में संस्थागत कर लिया गया था । लेकिन वर्तमान संविधान के मसौदे में न केवल उन परिवर्तनों को अस्वीकार किया गया वरन कई ऐसी धाराओं को समाविष्ट किया गया जिसकी कल्पना भी मधेश ने नहीं की थी । ऐसा करने में हर दल के लोग शामिल थे । यह भी साफ है आज भी समग्र रूप में वे इस मुद्दे पर एकमत नहीं हैं । न तो वे स्पष्ट रूप से बातों को सामने रख पाते हैं और न अपना स्पष्ट लक्ष्य बना पाते हैं तथा सारी कवायद सत्ता के गलियारे में आकर समाप्त हो जाती है ।
यह सच है कि राजनीति का अन्तिम यथार्थ सत्ता है मगर सत्ता तक पहुँचने के लिए जिस राह को अंगीकार किया जाए वह न्यायसंगत होना चाहिए । ऐसी राहों को अपनाकर आगे बढ़ना राजनीति का धर्म होना चाहिए । लेकिन हमारी राजनीति की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि बाहर से उसका चेहरा साफ नजर आता है लेकिन भीतर से उन्हें समझना मुश्किल होता है । यही कारण है कि विश्वास की गहरी कमी राजनीतिक दलों के बीच तो देखी ही जा सकती है और इसकी काली छाया से जन–मन भी प्रभावित होता है । आज जो राजनैतिक अतिवाद का रंग हमारे राजनैतिक दलों में देखा जा रहा है उसकी पृष्ठभूमि यही है । दल अनेक हैं । इनके बीच चरम द्वन्द्व की अवस्था है । अगर समाधान नहीं निकला तो यह द्वन्द्व चरम ध्रुवीकरण में परिणत होगा जो किसी भी रूप में देश के लिए विधायी नहीं होगा । इसलिए समाधान का मार्ग तलाश कर देश को अग्रगामी दिशा तो दी ही जानी चाहिए । व्

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