जिउतिया व्रत की एक पौराणिक कथा :

जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की मंगल कामन के लिए किया जाता हैं | यह व्रत मातायें रखती हैं | जीवित्पुत्रिका व्रत निर्जला किया जाता हैं जिसमे पूरा दिन एवम रात पानी नही लिया जाता | हिन्दू पंचाग के अनुसार यह व्रत आश्विन माह कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक मनाया जाता हैं | इस निर्जला व्रत को विवाहित मातायें अपनी संतान की सुरक्षा के लिए करती हैं |maxresdefault

प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक का एक राजा था । बह बहुत धर्मात्मा, परोपकारी, दयालु, न्यायप्रिय तथा प्रजा को पुत्र की भाँति प्यार करने वाला था। एक बार शिकार करने के लिए मलयगिरि पर्वत पर गए। वहाँ उनकी भेंट मलयगिरि की राजकुमारी मलयवती के हो गई,जो कि वहाँ पर पूजा करने के लिए सखियों के साथ आई थी। दोनों एक दूसरे को पसंद आ गए। वहीं पर मलयवती का भाई भी आया हुआ था। मलयवती का पिता बहुत दिनों से जीमूतवाहन से अपनी बेटी का विवाह करने का चिन्ता में था। अतः जब मलयवती के भाई को पता चला कि जीमूतवाहन और मलयवती एक दूसरे को चाहते हैं तो वह बहुत खुश हुआ, और अपने पिता को यह शुभ समाचार देने के लिए चला गया।
इधर मलयगिरि की चोटियों पर घूमते हुए राजा जीमूतवाहन ने दूर से किसी औरत के रोने की आवाज सुनी। उनका दयालु हृदय विह्वल हो उठा। वह उस औरत के समीप पहुँचे। उससे सानुरोध पूछने पर पता चला कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके एकलौते पुत्र शंखचूर्ण को आज गरुड़ के आहार के लिए जाना पड़ेगा। नागों के साथ गरुड़ का जो समझौता हुआ था उसके अनुसार मलयगिरि के शिखर पर रोज एक नाग उनके आहार के लिए पहुँच जाया करता था। शंखचूर्ण की माता की यह विपत्ति सुनकर जीमूतवाहन का हृदय सहानुभूति और करुणा से भर गया, क्योंकि शंखचूर्ण ही उसके बुढ़ापे का एक मात्र सहारा था।
जीमूतवाहन ने शंखचूर्ण का माता को आश्वासन दिया कि- माता आप चिंता न करें मैं स्वयं आपके बेटे के स्थान पर गरुड़ का आहार बनने को तैयार हूँ।
जीमूतवाहन ने यह कहकर शंखचूर्ण के हाथ से उस अवसर के लिए निर्दिष्ट लाल वस्त्र को लेकर पहन लिया और उसकी माता को प्रणाम कर विदाई की आज्ञा माँगी। नाग माता आश्चर्य में डूब गई। उसका हृदय करुणा से और भी बोझिल हो उठा उसने जीमूतवाहन को बहुत कुछ रोकने की कोशिश की, किन्तु वह कहाँ रुक सकता था। उसने तुरंत गरुड़ के आहार के लिए नियत पर्वत शिखर का मार्ग पकड़ा और माँ-बेटे आश्चर्य से उसे जाते हुए देखते रह गए।
उधर समय पर गरुड़ जब अपने भोजन-शिखर पर आया और बड़ी प्रसन्नता से इधर-उधर देखते हुए अपने भोजन पर चोंच लगाई तो उसकी प्रतिध्वनि से संपूर्ण शिखर गूँज उठा। जीमूतवाहन के दृढ़ अंगों पर पड़कर उसकी चोंच को भी बड़ा धक्का लगा। यह भीषण स्वर उसी धक्के से उत्पन्न हुआ था। गरुड़ का सिर चकराने लगा। थोड़ी देर बाद जब गरुड़ को थोड़ा होश आया तब उसने पूछा- आप कौन हैं। मैं आपका परिचय पाने के लिए बेचैन हो रहा हूँ।
जीमूतवाहन अपने वस्त्रों में उसी प्रकार लिपटे हुए बोले , पक्षिराज मैं राजा जीमूतवाहन हूँ, नाग की माता का दुख मुझसे देखा नहीं गया इसलिए मैं उसकी जगह आपका भोजन बनने के लिए आ गया हूँ, आप निःसंकोच मुझे खाइए।
पक्षिराज जीमूतवाहन के यश और शौर्य के बारे में जानता था,उसने राजा को बड़े सत्कार से उठाया और उनसे अपने अपराधों की क्षमा-याचना करते हुए कोई वरदान माँगने का अनुरोध किया।
गरुड़ की बात सुनकर प्रसन्नत्ता और कृतज्ञता की वाणी में राजा ने कहा- मेरी इच्छा है कि आपने आज तक जितने नागों का भक्षण किया है, उन सबको अपनी संजीवनी विद्या के प्रभाव से जीवित कर दें, जिससे शंखचूर्ण का माता के समान किसी की माता को दुःख का अवसर न मिले।
राजा जीमुतवाहन की इस परोपकारिणी वाणी मे इतनी व्यथा भरी थी कि पक्षिराज गरुड़ विचलित हो गए। उन्होंने गदगद कंठ से राजा को वचन पूरा होने का वरदान दिया और अपनी अमोघ संजीवनी विद्या के प्रभाव से समस्त नागों को जीवित कर दिया।
इसी अवसर पर राजकुमारी मलयवती के पिता तथा भाई भी जीमूतवाहन को ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गए थे । उन लोगों ने बड़ी धूमधाम से मलयवती के साथ जीमूतवाहन का विवाह भी कर दिया।
यह घटना आश्विन महीने के कृष्ण अष्टमी के दिन ही घटित हुई थी, तभी से समस्त स्त्री जाति में इस त्यौहार की महिमा व्याप्त हो गई। तब से लेकर आज तक अपने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना करते हुए स्त्रियाँ बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से इस व्रत को पूरा करती हैँ।

 

 

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