जिनपर हमें भरोसा था, उसी ने कौडी के भाव बेच दिया : बिनोद पासवान


सबको पता है कि कैसे सुनियोजित एवं नाटकीय रूपसे जो बिधेयक मधेशी, दलित, जनजाति, अल्पसंख्यक समुदाय (मुस्लिम, थारू तथा अन्य) के हित मे था, उसे संसद मे देखावटी रूप से लाकर उसे पास नहीं होने दिया गया । सरकार ने एक तरफ आंदोलनरत पक्ष से समझौते की कि वे बिधेयक संसद मे लाएंगे, दूसरी तरफ प्रतिपक्ष एमाले लगायत से भी अंदर ही अंदर पास न होने देने के लिए प्रतिबद्धता जनाई। इस तरह सत्ता पक्ष ने दोनो को खुस कर लिया । अंतत: नाटकीय ढंगसे बिधेयक फेल हुआ और जो संसोधन-संसोधन चिल्ला रहे थे, उन्हें सत्ता पक्ष ने ठेंगा दिखा दिया । अब ऐसे करो या मरो की बाध्यात्मक स्थितिमे राजपा सहित असंतुस्ट दल को भी चुनाव की मेले में ठेला लगाने आना पड़ा। इसतरह, जिनपर हमें भरोसा था, उसी ने हमारे भरोसे को कौडी के भाव में बेच दिया।
अब फिर हमारे लिए फिर संघर्ष के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचा, और फिर से मधेश मुद्दा को पुन: जीवित करने के लिए आसन्न हर चुनाव का सक्रिय बहिस्कार या निष्क्रिय बहिस्कार ही एक मात्र जरुरी बिकल्प रहा गया ।
यह सत्ता के खिलाफ भद्र अवज्ञा का ही एक रूप है । जबतक मधेश को अपने आतंरिक मामले के लिए आत्मनिर्णय का अधिकार हासिल नहीं हो जाता । तबतक यह असहयोग आंदोलन निरंतर किसी न किसी रूप मे चलता रहेगा ।

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