जिस ओली को खून की नदी नहीं दिखी उस पर रिले अनशन का क्या असर ! श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , ७ जून |

नेपाल की जनता सपने और तमाशा देखने का आदी हो चुकी है । तमाशा खत्म कब होगा या सपने कब पूरे होंगे यह नहीं पता पर जनता खामोशी के साथ तमाशा का आनन्द ले रही है । चाशनी में घोलकर जो बजट पेश हुआ है उसका असर दिखने लगा है । जनता भले ही बेहाल हो पर सांसद के तो पौबारह हैं । खैर, इसी महत्त्वाकांक्षी बजट के साथ एक और इंतजार जनता कर रही थी । बजट पेश होने के साथ ही यह कयास लग रहे थे कि सत्ता का परिवत्र्तन बहुत जल्द होने वाला है । किन्तु भद्र बातचीत के बाद यह समझ आ रहा है कि प्रचण्ड अपने ही बनाए जाल में फँस चुके हैं । फिलहाल ओली जी ने उन्हें बाहर का रासता दिखा दिया है यह कह कर कि सरकार चुनाव के बाद ही हटेगी । जो जितेगा वो सत्ता में रहेगा या फिर राष्ट्रीय सरकार का गठन हो । यह दोनों ही बातें वत्र्तमान में असम्भव लग रही हैं । चुनाव सहज नहीं है और राष्ट्रीय सरकार के सवाल पर काँग्रेस की खामोशी बता रही है कि वो फिलहाल इस बात के लिए तैयार नहीं है ।

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मधेशी पार्टियाँ अगर सरकार में शामिल होती हैं तो यह उनके लिए खुदकुशी के समान होगी । वैसे भी मधेशी पार्टी आन्दोलन के जिस राह पर चल रही है वह समय पास ही कर रही है । जिस सरकार को खून की नदी नहीं दिखी उस पर इनके रिले अनशन का भला क्या असर पड़ने वाला है । कहा गया था कि मधेश आन्दोलन की ओर से सरकार को अंतिम धक्के की जरुरत है परन्तु अब तो यह इतनी लाचार अवस्था में दिख रही है कि धक्के की आवश्यकता इन्हें ही हो गई है आगे बढ़ने के लिए । मधेशी मोर्चा वर्तमान में सिर्फ अपनी स्थिति मजबूत करने में लगे हुए दिख रहे हैं । रोज उनकी पार्टियों में कितने लोग शामिल हो रहे हैं इस संख्या को गिनने में मशगूल हैं । उनकी नजर भी आगामी चुनाव पड़ ही है । क्योंकि चुनाव आज ना कल तो होना ही हे । आन्दोलन की जो गति है और सरकार की जो उपेक्षा है उससे तो किसी परिणाम की आशा ही बेकार है । आन्दोलन कर्ता सड़क नाप रहे हैं और सरकार वार्ता का झूठा राग आलाप रही है और परिणाम ढाक के तीन पात ।

ओली सरकार की सत्ता अभी हिलने वाली नहीं है क्योंकि उसकी सबसे बड़ी चाल जो भारत विरोधी हवा फैलानी है, वही ओली सरकार के लिए आक्सीजन का काम कर रहा है और इसमें भारत के मोदी विरोधी पार्टियाँ भीतर से ओली को साथ दे रहे हैं । यानि एक तरह से हम यह कह सकते हैं कि ओली सरकार भी भारत के सहारे ही चल रही है भले ही यह पक्ष की ओर से हो या विपक्ष की ओर से । दूसरी जो ओली सरकार की नीति है, वह है हर उस काम को जनता के सामने लाना जो चीन के मदद से हो रहा है और हर उस काम के विरोध में भ्रामक प्रचार खड़ा करना या अड़ंगा लगाना जो भारतीय मदद से होने वाला है । इससे भारत के प्रति आम जनता की सोच में भारत विरोधी बातें जड़ पकड़ रही हैं और इसका फायदा चीन और ओली दोनों को मिल रहा है । पोखरा विमान स्थल के लिए तुरन्त २द्द अरब का आना और कई योजनाओं पर काम की जल्दबाजी दिखाना इसी बात का उदाहरण है । ओली यह दिखाना चाहते हैं कि नेपाल के विकास में चीन ज्यादा मददगार सिद्ध हो रहा है भारत के बनिस्पत । इसलिए भारत के हाथ में जो योजनाएँ थीं उन्हें जानबूझ कर खींचा जा रहा है । अभी हाल में ही उन्होंने अपने भाषण में कहा कि अमेरिका और भारत उनकी सरकार को गिराना चाहता है फिर जब अमेरिका ने इसपर स्पष्टीकरण माँगा तो अपनी ही बात से मुकर गए । यही तो इनकी खूबी है । जो आज तक कई मौके पर देखने को मिली है । चीन बड़ी खामोशी के साथ अपनी जमी तैयार कर रहा है नेपाल में । जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर पड़ेगा । ऐसे में भारत को मधेश की ओर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है । क्योंकि मधेश ही भारत की सुरक्षा का कवच है ।

इधर इस सत्ता के खेल में जो सपना सँजोकर प्रचण्ड बैठे थे वो फिलहाल पूरा होने वाला नहीं है क्योंकि उन्होंने जिस तरह काँगै्रस अध्यक्ष देउवा को ऐन मौके पर धोखा दिया या यूँ कहिए कि पलटी मारी उसके बाद अब उस खेमे में जाने की वो सोच भी नहीं सकते और देउवा अभी देखने और इंतजार करने की मनःस्थिति में हैं । मधेशी पार्टियाँ अस्तित्वविहीन नजर आ रही हैं । उनकी स्थिति साँप छुछुन्दर की बनी हुई है और इस सबका प्रत्यक्ष फायदा ओली सरकार को मिल रहा है । ओली सरकार चीन की सहायता से जल्दी से जल्दी योनाओं को रूप देना चाह रही है ताकि उनकी सरकार को जनता का समर्थन मिल जाय और आगामी चुनाव में हवा उनकी पक्ष में हो । फिलहाल वो हीरो बने हुए हैं और नेपाल का एक समुदाय उनके राष्ट्रवाद की हवा में साँस ले रहा है और भारत विरोधी बातें करने से जरा भी नहीं हिचक रहा ।

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