जीवन में सफलता के सूत्र

रवीन्द्र झा ‘शंकर’ /हिमालिनी 
१. जीवन का उद्देश्य निर्धारित करें ः उद्देश्य के बिना व्यक्ति का जीवन कोई महत्व नहीं रखता और वह ऐसे ही है जैसे बिना पतवार के नाव । मनुष्य का जीवन यूँ ही जीने के लिए नहीं हुआ है । यह तो कुछ करने के लिए हुआ है । जिससे उसका स्मरण करने के बाद भी लोग कर सकें । जीवन का उद्देश्य निश्चित करके उसकी पूर्तिहेतु सावधानीपूर्वक कार्य करना जरुरी है ।
२. अपने काम कों श्रेष्ठ मानें– अक्सर ऐसा होता है कि जो जिस काम में है, वह उस काम में खुश नहीं होता । नौकरीवालों को व्यवसाय में तथा व्यवसायवालों को नौकरी में अधिक लाभ दिखाई देता है । नौकरीवाले को जीवन पराधीन लगता है । व्यापारी को जीवन में घाटे की चिन्ता रहती है और दुकान में फायदे के लिए समय भी अधिक देना पड़ता है । किसान को लगता है कि खेती से आय कम होती है तथा मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है । इस तरह सभी को अपने–अपने कार्य में असन्तोष महसूस होता है । किंतु यदि आप पूरे जीवन में खुशी चाहते हैं तो अपने काम से प्यार करें, अपने कार्य को ही श्रेष्ठ माने क्योंकि कार्य ही पूजा है ।
३. समय का सदुपयोग करें– समय का सदुपयोग प्रत्येक कार्य को समय पर पूर्ण करके किया जा सकता है । जिस कार्य को करें, पहले उसे पूरा करके दूसरा कार्य प्रारम्भ करें, कार्यालय में समारोह में ओर यात्रा आदि के लिए निश्चित समय पर पहुँचकर समय की पाबन्दी का ध्यान रखना ही सफलता की निशानी है । आलस्य या व्यर्थ की बातों में समय का दुरुपयोग होता है । कहावत है कि बीता हुआ समय निकला हुआ जवानी वापस नहीं आता है ।
४. अपने कार्य में व्यस्त रहे– एकांकीपन को दूर करने का सर्वोत्तम तरीका है– कार्यव्यस्तता । सदा कार्य में व्यस्त रहने से खुशी मिलती है । अपने कार्यों को सकारात्मक ढंग से पूरा करके आप अधिक सक्षम हो सकते हैं । प्रति दिन एक घण्टा कम सोने से आप अपने जीवन में कार्य के लिए पाँच साल बढ़ा सकते हंै । जितने भी महापुरुष हुए है, वे सदैव अपने लक्ष्य के प्रति सचेत एवं सतर्क रहे है । उनकी कार्य के प्रति समर्पित भावना से ही उन्हें कठिन कार्यों में भी सफलता प्राप्त हो सकी ।
५. आध्यात्मिक बनिए– विलासिता सत्य की प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है । विलासिता का परित्याग कर व्यक्ति अध्यात्म की ओर बढ़ सकता है एवं दृढ़ विश्वास की उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है । इन्द्रियों की आशक्ति से ऊपर उठिए । तभी जीवन में आगे बढ़ सकेंगे । भौतिक पदार्थ क्षणभंगुर हैं, हम उन्हें वस्तुतः अपना नहीं कह सकते, वह तो केवल अल्प समय के लिए हमारे पास रहते हैं, किंतु आध्यात्मिक उपलब्धियाँ स्थायी होती है ।
६. आत्मयिन्त्रण करिए– आत्मनियन्त्रण द्वारा मनुष्य उचाईयों की शिखर तक पहुँच सकता है । प्रत्येक व्यक्ति में बहुत कुछ कर सकने की क्षमता होती है । उसकी उन्नति का सबसे बड़ा रहस्य है, आत्मनियन्त्रण । यही मनुष्य के आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है । इसलिए जिस व्यक्ति ने आत्मनियन्त्रण कर लिया, उसे अवश्य सफलता मिलती है । जो व्यक्ति आत्मनियन्त्रण कर लेता है, वही क्रोध पर नियन्त्रण कर सकता है ।
७. आत्मनिरीक्षण करिए– आत्मनिरीक्षण एवं आत्मसुधार करके अपनी छोटी–छोटी गलतियों को पहचान कर उन्हें दुबारा नहीं दोहरायें, तभी जीवन में उन्नति कर सकते हंै । आप हर सप्ताह अपनी प्रगति मूल्यांकन करें तथा यह मालूम करें कि आपने कब कौन सी गलती की और भविष्य में उसे न करने का संकल्प करे ।
८. आवश्यकताएँ कम करिए– दूसरो की देखा–देखी अपनी आवश्यकताएँ बढ़ा कर आपसे अधिक खर्च बढ़ाना क्या उचित है ? अपनी आय से अधिक खर्च नहीं करे । हमे ध्यान रखना चाहिए कि जितनी हमारी आवश्यकता कम होगी, उतनी चिन्ता भी कम होगी और सन्तोष अधिक होगा । सिर्फ आवश्यक वस्तुओं को ही खरीदारी करे, घर को म्युजिम न बनाए ।
९. आदर्श मित्र चुने– मित्र क्या है ? वह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसके साथ आज स्वयं निडर हो जाते है । मित्र वह है, जिसके सामने कोई अपने दिल की सब बातें प्रकट कर सकते है । एक मित्र–विहीन व्यक्ति ऐसा है, जिसका बायाँ हाथ है, लेकिन दाँया नहीं । कोई भी व्यक्ति बिना मित्र के बेकार है । आदर्श मित्र वही है, जो अपने मित्रों के प्रति वफादार रहे । मित्र ज्यादा न हो तो केवल दो–चार विश्वसनीय मित्र ही रखे । मित्र ऐसा हो, जो सबके प्रति सद्भावना एवं ‘सर्वे भवन्तु सुखिन’ की कामना रखे । सुख की अपेक्षा दुःख में मित्र का अधिक साथ दे ।
१०. मुस्कुराने की आदत डाले– आपकी मुस्कुराहट आपकी सद्भावना का सन्देश है । आगन्तुक का मुस्कुराते हुए स्वागत करें । मुस्कराते रहेंगे तो तनाव एवं चिन्ताग्रस्त नहीं होंगे । गुलाब के पुष्प की भाँति चेहरे पर सदा मुसकान रखे । सदा–हँसते–मुस्कराते रहेंगे तो सभी आपको पसन्द करेंगे ।
११. उत्साहवर्धन करें– दूसरों को प्रोत्साहित कीजिए ताकि उनका उत्साहवर्धन हो सराहना और प्रोत्साहन के द्वारा लोगों से कठिन कार्य भी कराया जा सकता है । दिल खोलकर तारीफ करना तथा मुक्तकण्ठ से प्रशंसा, सराहना करना उत्साहवर्धन में सहायक होता है । सच्ची प्रशंसा करने की आदत डाले, दूसरो की गलतियाँ सबके सामने न बताए । किसी की आलोचना करने से पहले अपनी गलतियों पर ध्यान दे, अच्छे कार्य करनेवालों के छोटे से छोटे कार्यकी भी प्रशंसा करें ।
१२. सन्तोषी बनें– कहावत है– सन्तोषी सदा सुखी । धनोपार्जन के लिए गलत तरीके एवं भागदडसे आप तनावग्रस्त हो सकते है । क्योंकि जरुरतें खत्म हो सकती पर लालच नहीं । जो थोडेÞ से सन्तुष्ट है, उसके पास सब कुछ है । जीवन जीना एक ऐसी कला है, जिस में कम साधनों से जीवन को आनन्दमय बनाया जा सकता है ।

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