जीवित देवी कुमारी की कथा गाजलु का फीका प्रदर्शन

विजेता चौधरी, काठमाण्डू, अषाढ ५

हेमराज बीसी निर्देशित फिल्म गाजलु ने बहुत ही कमजोर प्रदर्शन किया है । बहरहाल लीक से हटकर अलग कन्टेन्ट के उपर फिल्म बनाने की चुनौती प्रशंसनीय है ।

जीवित देवी कुमारी की कथा पर आधारित फिल्म गाजलु में ऐसा प्रतीत होता है जैसे विषयवस्तु की गहनता का अध्ययन ही नही किया गया है । हल्काफुलका व बिकाउ शैली प्रस्तुत पिक्चर में कुमारी के संघर्ष की कथा न तो खुल के सामने आती है न दर्शकों में संवेदना की सृजना होती है ।

gajlu

कुमारी की जीवनशैली, मनोविज्ञान व उस के अनुभव को खुल कर प्रस्तुत नही कर पाए हैं निर्दैशक बीसी ने । मैं आम युवती की ही तरह जीना चाहती हूँ बस इस बात का रटान रटाया गया है । दृश्य के माध्यम से उसे और जीवन्त व कलात्मक बनाया जा सकता था दर्शकों का कहना है ।

निर्देशक के पात्र चयन भी कथा के हिसाब से सही नही है । कुमारी की भूमिका में रही मुख्य नायिका पूर्व कुमारी सुजाता शाक्य (सृष्टि श्रेष्ठ) तथा नायक आरभ (अनमोल केसी) की जोडी फिट नही है । आरम्भ सुजाता से छोटा दिखता है । दूसरी बात पिक्चर में पटकथा से अधिक स्टार को ज्यादा महत्व दिया गया प्रतीत होता है । ये निर्देशक की महान कमजोरी भी सावित हुई है ।

कथा के विषयवस्तु के मुताविक कुमारी सुजाता सामान्य जीवनयापन करना चाहती है । पर परिवार व समाज में कुमारी के विवाह करने से अशुभ होने का भय विद्यमान है । दूसरी तरफ देवी होने के कारण उस के पिता ने बाहर नौकरी करने पर पावंद लगा रखा है । ऐसीे अवस्था से गुजर रही सुजाता की मुलाकात डकुमेन्ट्री बनाने बाले आरभ से होता है । दोनो का सम्बन्ध प्रेम में परिणत होता है ।

अगर पिक्चर का क्लाइमेक्स देखा जाए तो इन दोनों के प्रेम सफल हो पाएगा, इसी के इर्दगिर्द घुमता है । सुजाता–आरभ का भेंट, परिवार का व्यवहार, उनलोगों के मित्र मण्डली की प्रदर्शन इन सब में भी दर्शकों को नयापन नही मिलेगा । कुछ अनावश्यक पात्र भी हैं जैसे ऋतिक, सलोन आदी । मेनुका प्रधान व गौरब का रोल महत्वपूर्ण है ।

तिमि आयौ… बोल के गीत फिल्म के भार को थामे हुए है । फिल्म के सीन खीचने बाले हैं । नेपाली सीने जगत के ख्यात नाम शेलेन्द्र डी कार्की का काम भी इस पिक्चर मे कुछ खास जमा नही है ।

देवी के रुप मे दिखी पूर्व मिस नेपाल सृष्टि में कामुकता का लेश मात्र न होना अपने चरित्र के साथ न्याय किया है । सृष्टि का सौम्य व गम्भीर स्वभाव ने चरित्र को जीवन्त बनाए रखा है । वहीं निर्देशक की लापरवाही से महत्वपूर्ण व ऐतिकासिक होने बाली पिक्चर गाजलु अन्ततः कमजोर रहीं ।

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