जुरशितल में फुलनें बालें सलहेश की प्रेमगाथा जानकार आप हो जायेंगें हैरान

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हिमालिनी डेस्क
काठमांडू, १३ अप्रील ।
तराई मधेश के एक एैसी गाँव है जहा के बारे में आप सुन कर हैरान रह जाएगें । सोच्ने पर मजबुर हो जाएगें । कहेगें की एैसा भी होता हैं । जी हा ये बातें शत प्रतिशत सत्य हैं । सुन्दरता का प्रतिक मानने बालें फुलको भला कौन है जो नहीं चाहेंगें । उस मे भी एक वर्ष मे एकबार फुल्ने बाले फुलों को हर कोइ श्रद्धा और भक्ति के साथ देख्ने के लिए आतुर होते हैं ।

साल में एकबार फुल्ने बाला उस फुलको देख्ने के लिए बेसब्री से लोग आते हैं, नेपाल से ही नहीं बल्की पडोसी देश भारत से भी लोग देख्ने के लिए लाखों के संख्या मे उपस्थित होते है ।

इस फुल के फुल्ने के इतिहास बडी ही पुरानी हैं । इसा के छठ्वे शताब्दी से फुल्ते आ रहें ये चमत्कारी फुल बैसाख १ गते को सुबह फुल्ते हैं और शाम को सुख कर चले जातें हैं । दलितों में से अति पिछडा हुआ जात दुसाद के कुलदेवता तथा अन्र्तराष्ट्रियस्तर मे पूजने के योग्य रहा वीरगाथा के वीर पुरुष सलहेश के जीवन गाथा से जोडा वो फूल फुल्ने बाला पेड किस चिज का है जो हजारों वर्षो से अभी भी जिन्दा हैं । ऐसी प्रश्न वनस्पतिविदों के लिए अध्ययन और अनुसन्धान के विषय बना हैं ।

प्रदेश नं २ अन्तर्गत के पूर्व–पश्चिम राजमार्ग के लहानबजार से पश्चिम और मत्स्यपालन केन्द्र से दक्षिण मे रहा प्रसिद्ध धार्मिक एवम् ऐतिहासिक सलहेश फूलबारी में प्रत्येक वर्ष के पहला दिन उस दुर्लभ फूल फुला करते है । हारम जात के विशाल पेड मे इस तरहा अचानक फूल फुल्न और वैशाख १ गते शाम को अपने आप सुख कर चलेजानें बाले घटना वास्तव मे अविश्वसनीय और जिज्ञासा का विषय बना हुआ है ।
सलहेश कौन था ? सलहेश के जीवन गाथा से फूलाें का क्या सम्बन्ध हैं ? इस बात के जान्ने के लिए पौराणिककाल मे पुन वापसी करने के आवश्यता हैं ।
नेपाल की तराई में एक गांव है महिसौथा जहां दुसाध् जाति के एक महात्मा थे । उनका नाम था वाक मुनि । वे १२ वर्ष की कठोर तपस्या में लीन थे । इसी दौरान इन्द्र लोक से मायावती नाम की एक अप्सरा फूल लोढ़ने के लिए यहां आयी । फूल चुनने के क्रम में उनकी नजर साधना में लीन वाक मुनि पर पड़ी । मुनि के सुन्दर रूप को देख कर वह मोहित हो गयी । अपने हाव–भाव से मायावती ने मुनि का ध्यान भंग कर दिया । इस पर मुनि ने मायावती को श्राप दिया कि जिस प्रकार तूने मेरी तपस्या भंग किया है उसी तरह तुझे अब इन्द्रपुरी में स्थान नहीं मिलेगा । तुझे अब मृत्युलोक में भटकना पड़ेगा । यह सुनते ही मायावती अंतर्नाद करते हुए मुनि से क्षमा याचना करने लगी । इस पर मुनि ने कहा कि मैंने जो श्राप दिया है वह तो वापस नहीं हो सकता लेकिन मृत्यु लोक में तुम दिव्यशतिm संपन्न तीन पुत्रा और एक पुत्री की माता बनकर गौरव प्राप्त करोगी । तुम्हारा मत्र्यलोक में मंदोदरी नाम होगा । पहला बच्चा तुम्हे महिसौथा के कमलदल तालाब में पुरईन के पत्ते पर मिलेगा । तुम उसका नाम सलहेस रखना । बड़ा होकर वह दैवी शक्ति से संपन्न राजा बनेगा । उसका बड़ा नाम होगा । कलियुग में भी लोग उसकी पूजा करेंगे । इसके बाद दो पुत्रो और एक पुत्री पैदा होगी । मझले का नाम मोती राम और छोटे पुत्र का नाम बुधेसर रखना । बेटी का नाम बनस्पती रखना । ये सभी सलहेस का अनुगामी होकर दुनिया में बड़ा नाम करेंगे । इतना कह कर मुनि अन्तध्र्यान हो गये ।

इसके बाद मायावती को महिसौथा के कमलदल तालाब में पुरईन के पत्ते पर एक बच्चा मिला । यही बच्चा सलहेस हुए और अप्सरा मायावती मंदोदरी कहलायी । काल–क्रम से मंदोदरी ने दो लड़का और एक लड़की को जन्म दिया । मुनि के कथनानुसार मंझले का नाम मोती राम, छोटे का बुधेसर और लड़की का नाम बनस्पती हुआ । इस तरह तीनों भाई ने मिलकर महिसौथागढ़ में अपना राज्य स्थापित कर लिया । बनस्पती जादुगरनी बन गयी । कहा जाता है कि छः महीना आगे–पीछे वह जानती थी । बनस्पती का प्रेम विवाह सतखोलिया के राजा शैनी से हुआ । इससे उसे एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम करिकन्हा रखा गया । वह स्वभाव से बड़ा ही उदंड था । उध्र १२ वर्ष उम्र होने के बाद सलहेस की माता मंदोदरी को सलहेस के विवाह की चिंता होने लगी । इस बीच सलहेस ने महिसौथा में अपना विशाल राज्य स्थापित कर लिया । चौदह कोस में उसके राज्य का विस्तार हो गया ।

सलहेस के विवाह के लिए योग्य लड़की की तलाश होने लगी । पंडित और नाई अनेक राज्यों में घूम–घूम कर योग्य कन्या की तलाश करने लगे लेकिन सलहेस के योग्य कोई लड़की नहीं मिली । आखिर अंत में मंदोदरी ने पंडित और नाई को बुला कर कहा कि बराटपुर के राजा बराट की एक पुत्री है । बड़ी ही सुशील और संस्कारवाली । उसका नाम है सामरवती । जन्म लेते ही उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि वह यदि विवाह करेगी तो महिसौथा गढ़ के राजा सलहेस से नहीं तो आजन्म कुंवारी ही रहेगी । इसलिए राजा बराट को सलहेस के सामरमती से विवाह का संदेश दे दीजिए । राजा बराट को लिखा विवाह के इस प्रस्ताव का पत्रा लेकर चन्देसर नाम का नाई महिसौथा से बराटपुर के लिए प्रस्थान किया । राजा बराट जाति से क्षत्रिय थे और स्वभाव से अत्यंत कठोर । नाई से विवाह संबंधी प्रस्ताव का पत्रा पढ़ते ही वह आग–बबुला हो गया और उसे जेल में डलवा दिया । इधर महिसौथा राज में चन्देसर हजाम के वापस नहीं आने से लोगों की चिंता बढ़ गयी ।

मोतीराम ने माता दुर्गा को स्मरण किया और सारी बातें उन्हें विस्तार से बता दिया । दुर्गा ने तुरंत प्रकट होकर मोती राम को बता दिया कि राजा बराट ने चन्देसर हजाम को कैद कर लिया है तथा यह भी कहा कि सलहेस का विवाह राजा बराट की पुत्री सामरवती से ही लिखा है । यह होकर रहेगा । इतना सुनते ही मोती राम का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया । उसने अपने भांजा करिकन्हा को बुलवाया और बराटपुर के लिये प्रस्थान किया । रास्ते में एक साथ सात सौ घसवाहिनियां मिलीं । ये सब के सब जादुगरनी थी । सबों ने मोतीराम को अपने जादू के बस से परेशान कर दिया । बाद में मोतीराम से उन्हें परास्त होना पड़ा । इस तरह मोतीराम अपने भांजे के साथ बराटपुर पहुंचे । राजा बराट उनकी शकित के सामने अपने को कमजोर समझ कर हथियार डाल दिये । चन्देसर नाई को रिहा कर दिया ।

राजा बराट ने विवाह की सहमति दे दी । बारात सजा कर लाने के लिए मोतीराम अपने भांजे के साथ वापस महिसौथा आ गये । बीच का एक और घटनाक्रम इस लोकगाथा को विस्तार देता है । राजा हिनपति मोरंग के राजा थे । उनकी स्त्री थी दुखी मालिन । इस मालिन की कोख से रेशमा, कुसुमा, दौना, तरगेना और फूलवंती पांच बेटियां पैदा हुई थी । सबसे बड़ी फूलवंती थी । जन्म के साथ ही फूलवंती ने सलहेस से विवाह करने का संकल्प लिया हुआ था । अब तक उसकी मुलाकात सलहेस से नहीं हुई थी । दुर्गा की अराधना कर पांचो बहन सलहेस की तलाश में निकल पड़ी । वे सब भी जादू जानती थी । सलहेस की तलाश करते हुए वे सभी महुरावन में आ गयी जहां से मोती राम अपने भाई सलहेस की बारात सजा कर बराटपुर के लिए प्रस्थान करने वाला था । मोती राम ने सलहेस को भौरानंद हाथी पर सवार करा दिया और बारातियों को चेतावनी दे दी कि मोरंग की पांचों बहन मलिनिया भईया पर आंख लगाये हुए है इसलिए सावधन रहना । दिन रहते बारात बराटपुर पहुंच गई । दरवाजा लगाने के लिए उचित समय आने के इंतजार में सभी बाराती आराम करने लगे । सलहेस अपने भौरानंद हाथी पर सवार थे ।
उधर महुरावन में पांचों मलिनिया सो रही थी कि देवी दुर्गा ने उसे सपने में बता दिया कि जिस सलहेस से विवाह के निमित्त तुम प्रतिज्ञा किये हुए हो उसे मोतीराम राजा बराट की पुत्री से विवाह कराने के लिये ले जा रहा है । जैसे ही बराट की पुत्री से सलहेस का विवाह हुआ, तुम्हारी मनोकामना धरी रह जाएगी । अभी सभी बाराती बराटपुर के मैदान में आराम कर रहे हैं । यह सुनते ही पांचों बहन बराटपुर पहुंच गयी । मोतीराम, करिकन्हा समेत सभी बाराती नींद में थे । पांचों बहन ने जादू के बल पर सलहेस को सुग्गा बना दिया और पिंजड़ा में लेकर भाग चली । इस बीच बारातियों की जब नींद खुली तो भौरानंद हाथी पर सलहेस को न पाकर तरह–तरह की चर्चा होने लगी । मोतीराम ने इस घटना को दुर्गा की करतूत मानते हुए घोड़े पर सवार होकर उनका पीछा करना शुरू कर दिया । उसने जब दुर्गा को स्मरण करते हुए अपने भाई के बारे में पूछा तो दुर्गा ने उसे बताया कि पांचों मलिनिया सलहेस को लेकर ठेंगटी गांव में पहुंच गयी है ।

मोरंग की पांचो बहनें राजा सलहेस के दर्शन के लिए महिसौथा गढ़ आकर दुर्गा से आग्रह करती है कि वे उनका दर्शन किसी तरह करा दें । रेशमा, कुसमा, दौना, तरेगना और फूलवंती पांचों बहनें यह संकल्प लेती है कि यदि उन्हें सलहेस के दर्शन नहीं हुए तो वे एक साथ विष खाकर जान दे देंगी। इस पर दुर्गा उन्हें मानिकदह पोखर पर आकर इंतजार करने को कह कर सलहेस को भी उस पोखर पर आने के लिए प्रेरित करती है । सुग्गा हिरामन यहां भी यह कहते हुए सलहेस को सावधन करता है कि वहां जाने पर जादुगरनी मालिनें आपको फिर सुग्गा बनाकर पिंजड़ा में कैद कर लेगी ।
राजा सलहेस प्रतिदिन मानिकदह में स्नान कर वहां से फूल लाकर अपने इष्ट देवता की पूजा करते थे । सो इसमें किसी तरह का व्यतिक्र म करना वह नहीं चाहते थे । इसलिए हिरामन की सलाह पर वे पंडित का भेष धरण कर मानिकदह पहुंच गये। वहां वे देखते हैं कि स्नान करने वाले सभी पांचो धर को पहले से मालिन युवतियां छेके हुए है । वे उनसे एक धर खाली कर देने का अनुरोध करते हैं । इस पर पंडित भेषधरी सलहेस से वे कहती हैं कि हम लोग सलहेस से मिलने की प्रतीक्षा में यहां बैठी हैं। इस पर सलहेस कहते हैं कि हम तो ब्राह्राण हैं। स्नान करके पूजा करने जाना है । इसलिए एक धर छोड़ दो । तुम्हारा सलहेस तो महिसौथा में बैठा हुआ है। एक बार फिर पांचों बहन मालिन ठगी जाती है । दुर्गा को भला–बुरा कहने लगती है । इस पर दुर्गा भेद खोलते हुए कहती है कि वह जो पंडित था वही तुम्हारा सलहेस था । इसके बाद चन्द्र ग्रहण के अवसर पर जब सलहेस मानिकदह में स्नान करने आते हैं तो वहां पहले से डेरा जमाये हुए पांचो बहनें गहरी नींद में सो रही थीं । दुर्गा ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि चन्द्र ग्रहण के अवसर पर तुम्हें निश्चित रूप से सलहेस से भेंट होगी । दुर्गा की कृपा से उन सबों की नींद टूटती है और उन्हें सलहेस के दर्शन हो जाते हैं ।

इन पांच बहनों का सलहेस से चिर प्रतिक्षित मिलन इस लोक गाथा का सर्वाधिक कारूणिक पक्ष माना जाता है । मिलन के बाद जब पांचो बहनें यह कहती हंै कि आपसे विवाह की प्रतीक्षा में मैंने मां–बाप को छोड़ दिया । मोरंग में विवाह के लिए बने मंडप को ठुकराया, सखी–सहेलियों की बातें नहीं मानी और अपने पिता के घर को लात मार कर चली आयी । अब मेरा वैंस भी बीत चुका है । बाल पक गये । दांत टूट चुके हैं । अब मेरी जिंदगी का क्या होगा? हमारा नाम कैसे चलेगा, अरे निर्मोही । मेरी आश तो पूरी कर दो । उनके इस कथन पर दिव्यशकित संपन्न सलहेस ने कहा–’यह सतयुग है । इसके बाद कलियुग आयेगा । हमारे साथ तुम्हारी भी पूजा घर–घर में होगी । मेरे दाहिने भाग में भाई मोतीराम और साथ में बुधेसर रहेगा । तुम हमारे बायें भाग में रहोगी और इसी रूप में लोग हमारी पूजा करेंगे । गहबर में हाथी पर सवार राजा सलहेस की प्रतिमा के दोनों ओर फूलों से भरी डाली हाथ में लिए जो मालिन खड़ी दिखाई देती है वह वही मालिन है ।

महिसौथा गढ़ से ६–७ मील दूर आज भी राजा सलहेस की फुलवाड़ी का अवशेष कायम है जहां जूर–शीतल के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है । कुल मिला कर राजा सलहेस की कहानी अपने मान–सम्मान और अधिकार के लिए संघर्षरत समाज के अंतिम जन की कहानी है । यही कारण है कि अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरूद्ध आजीवन संघर्षरत, दैवी शकित संपन्न सलहेस की आज भी पूरी निष्ठा के साथ पूजा की जाती है ।
सलहेश एक लोक देवता हैं । जिसे लोग राजा सलहेस कहतें है । इन्हें लोग आदर से राजा जी भी पुकारते थें । दुसाध् जाति के होने के कारण मुख्य रूप से इन्हें दुसाधें का कुल देवता माना जाता है लेकिन मनौती पूरा होने पर अन्य जाति के लोग भी बड़ी निष्ठा और श्रद्धा के साथ सलहेस की पूजा करते हैं ।

इस लोक देवता के जीवन से जुड़ी लोक गाथा आज भी जन–जन में प्रचलित है । सलहेस लोकगाथा को लोक महाकाव्य और लोक महागाथा के रूप में जन–जन में मान्यता प्राप्त है ।

ऐसी मान्यता है कि राजा सलहेस दैवी गुणों से संपन्न एक अलौकिक पुरुष थे । इन्हें जनमानस में जाग्रत देवता का दर्जा प्राप्त है । लोगों का ऐसा विश्वास है कि इनकी पूजा अथवा सुमिरन करने से तत्काल अभीष्ट की प्रापित होती है । मिथिलाञ्चल और वहा के आस–पास के स्थान में जहां भी दस–पन्द्रह घर दुसाध् जाति के होते हैं वहां राजा सलहेस का गहबर निश्चित रूप से पाया जाता है । अधिकांश जगहों पर यह स्थान बरगद अथवा पीपल के पेड़ के नीचे मिटटी और पफूस का बना होता है । गहबर में मिटटी की बनी कुछ प्रतिमायें होती हैं, जिसमें राजा सलहेस हाथी पर बैठे होते हैं । इस हाथी को भौरानंद हाथी कहा जाता है । हाथी के कंधे पर मंगला नामक महावत बैठा होता है ।

सलहेस के दायें भाग में भाई मोती राम और बायें भाग में भाई बुधेसर घोड़ा पर सवार रहते हैं । सलहेस के दोनों तरफ डाली में फूल लिए मालिन खड़ी रहती हैं । अंग रक्षक बतौर केवल–किरात हाथ में तलवार लिए खड़े दिखाई देते हैं । गहबर में प्रत्येक दिन पूजा का कोई नियम नहीं है । इनकी पूजा विभिन्न अवसरोें पर की जाती है । कुछ भगत ऐसे भी पाये गये हैं जो गहबर में प्रतिदिन धूप–आरती किये बिना भोजन नहीं करते हैं । जिस किसी भी व्यक्ति की मनौती राजा सलहेस पूरा करते हैं, वह काफी धूम–धम से इनकी पूजा करते हैं । साल में एक बार दुसाध् जाति के लोग सामूहिक रूप से इनकी पूजा अवश्य करते हैं । पूजा में भगत की मुख्य भूमिका होती है जो प्रायः दुसाध् जाति का ही होता है । पूजा से पूर्व गहबर के चारो ओर काफी साफ–सफाई की जाती है ।

पूजन सामग्री के रूप में खीर, गांजा, पीनी–तम्बाकू, खैनी, पान–सुपाड़ी, अरबा चावल, अड़हुल फूल, धूप, अगरबत्ती, जनेउफ, तुलसी का पत्ता की प्रधनता रहती है । इसके अलावे पूजा स्थल के पास लाठी और बेंत भी रखा जाता है । इन्हीं सामग्रियों के साथ भगत राजाजी की पूजा शुरू करता है । पूजा के समय भगत प्रायः अर्धनग्न रहता है । वह जांघिया के उफपर लाल रंग का कछौटा पहन, कमर में घुंघरू बाँध, हाथ में बेंत लेकर मंडप में घूम–घूम कर खेलाने लगता है । इस क्रम में भगत के अन्य समाजी ढोल, झाल, मृदंग और करताल बजाते हुए संगत करते है । इस दौरान भगत के समाजी वाधयंत्राों के साथ सलहेस गाथा का गायन भी करते हैं । यह गायन पूजा के परंपरागत संस्कृत मंत्रों के विकल्प के रूप में होता है ।

मनौती पूरा होने पर सलहेस की पूजा देने का वचन भी लेता है । यही कारण है कि मनौती पूरा होने पर अन्य जाति के लोग भी राजा सलहेस की पूजा पूरी श्रद्धा और भतिm भाव से करते हैं ।

मौखिक परंपरा वाली इस लोक गाथा में तत्कालीन राजनीतिक स्थिति, दंड विधन, वर्ण व्यवस्था, अंधविश्वास, आम जनता के जीवन स्तर, महिलाओं की स्थिति आदि की झलक मिलती है ।
जुन फूल हेर्न देश–विदेशबाट लाखौँको सङ्ख्यामा दर्शनार्थी आउने गर्दछन् । यही फूल र सलहेश फूलबारीले हालसम्म राजा सलहेशको गाथालाई जीवन्तता दिँदै आएको छ । भनिन्छ सलहेश एकै दिनमा मानिक दहमा नुहाउने, फूलबारीमा फूल टिप्ने, सिलहट अखाडामा कुस्ती खेल्ने, कुलदेवीको पूजा गर्ने तथा जनताको पीरमार्का सुन्ने गर्दथे ।

मैसोथा राज्यको राजा सलहेश र उनकी प्रेयसी मालिनी बीचको प्रेमविछोडका लागि प्रसिद्ध रहेको सलहेश फूलबारीमा प्रेमविवाह गर्दा दाम्पत्य जीवन सफल हुने र सन्तान प्राप्ति हुने किंवदन्ती रहिआएकाले यस फूलबारीभित्र रहेको हारमको रूखलाई युवायुवतीले ‘लभ प्वाइन्ट’का रुपमा लिएको छ । भनिन्छ, युवायुवती बीचको प्रेमकथालाई जीवन्तता प्रदान गर्न फूलबारीमा रहेको सो रूखलाई साक्षी मानी विवाह गर्दा दाम्पत्य जीवन सफल हुने जनविश्वासअनुरुप प्रत्येक वर्ष सो फूलबारीमा विवाह गर्नेको सङ्ख्या बढदै गएको छ ।

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