Thu. Sep 20th, 2018

जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन

रवीन्द्र झा ‘शंकर’
छन्दोग्योपनिषद् में कहा गया है– आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण शुद्ध होता है । अन्तस्करण शुद्ध हो जाने से परमात्मा में दृढ़ स्मृति हो जाती है और परमात्माविषयक दृढ़ स्मृति की स्थिरता से हृदय की समस्त अविद्याजनित गांठे खुल जाती है । ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन’ वाली उक्ति अक्षरशः सत्य है । तामसिक और राजसिक भोजन करने से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की जड़ खोखली होती है, अपितु उनका प्रभाव मानसिक स्तर पर भी पड़ता है । आहार के अनरुप ही मानसिक स्थिति में तमोगुण छाया रहता है । कुविचार उठते हंै । उत्तेजनाएं छायी रहती हैं । चिन्ता, उद्विग्नता और आवेश का दौर चढ़ा रहता है । ऐसी स्थिति में न तो एकाग्रता सधती है और न ध्यान धारण बन पड़ती है । मन की चंचलता ही इन्द्रियों को चंचल बनाये रखती है । हमारा शरीर भी उसके इशारे पर चलता है । उस विध्न को जड़ से काटने के लिए अध्यात्म पथ के पथिक सबसे पहले आहार की सात्विकता पर ध्यान देते हैं । प्रत्यक्ष जीवन का आधार आहार को ही माना गया है । इसके आधार पर ही शरीर बनता और बढ़ता है । इसकी शुद्धता क्यों जरुरी है ?
इस सम्बन्ध में शास्त्रकार कहते हैं– ‘अन्नमयः हि सोम्य मन’ अर्थात् हे सोम्य । वह मन अन्नमय है । इसे अधिक स्पष्ट करते हुए छान्दोऽयोपनिषद के ही छठ अध्याय के पाँचवे खण्ड में उछालके ऋषि ने श्वेतकेतु से कहा है– ‘जो अन्न खाया जाता है, वह तीन भागों में विभक्त हो जाता है । स्थलू अंश मल, मध्यम अंश रस, रक्त मांस तथा सूक्ष्म अंश मन बन जाता है ।’ फिर आगे कहा है– हे सोम्य । मन्थन करने से जिस प्रकार दही का सुक्ष्म भाग इकठ्ठा होकर ऊपर को चला जाता है और घी बनता है, ठीक इसी प्रकार निश्चित रूप से भक्षण किये हुए अन्न का जो सूक्ष्म भाग है, ऊपर जाकर मन बनता है । इसी तरह पीये हुए जल का सूक्ष्म भाग ऊपर जाकर वाणी बनता है, इसी से सिद्ध होता है कि अन्न ही मन है ।’
अतः जीवन का व्यक्तित्व स्तर निर्धारित करने के लिए सर्वप्रथम अन्न के स्वरूप को संभालना पड़ता है, क्योंकि वही शरीर को अच्छी तरह से बनाता है ओर उसी के अनुरुप मन की प्रवृत्ति बनती है । इस प्रधान आधार की शुद्धता पर ध्यान न दिया जाय तो न शरीर की स्थिति ठीक रहेगी और न मन की दिशा धारा में औचित्य बना रह सकेगा । अन्न को ब्रह्म कहा गया है । काया का समूचा ढ़ाँचा आहार के आधार पर बनता है । अध्यात्म विज्ञान में आहार की उत्कृष्टता को अन्तस्करण विचारतन्त्र की पवित्रता, प्रखरता का सर्वोपरि माध्यम मना गया है । अहार की शुद्धता पर ही मन का स्तर एवं उसकी शुद्धता निर्भर है । खान–पान जितना सात्विक होगा । मन उसी अनुमान से निर्मल बनता चला जाएगा ।
मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है । वह भी शरीर का ही एक भाग है । अन्त से रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से अस्थि और मंज्जा, भेद, वीर्य आदि बनते–बनते अन्त में मन बनता है, इसलिए स्वभाविक है कि जैसा स्तर आहार का होगा, वैसा ही मन बनेगा । शरीरशास्त्र और मनोवैज्ञानिक भी इस संबंध में प्रायः एक मत है कि आहार से मन का स्तर बनता है । प्रकृति की कैसी विचित्रता है कि जहां मन की प्रेरणा से शरीर को चित्र–विचित्र काम करने पड़ते है, वहाँ यह भी एक रहस्य है कि मन के स्तर से शरीर पूरा बनता है । जिसके आधार पर वह बनता है, बढ़ता है, परिपृष्ट होता है और उसी का पाचन समाप्त होने पर अथवा उसमें विष का पुट रहने पर वह मर भी जाता है । शरीर जहां मन का दास है, वहां उसकी स्थिति को बनाने में प्रमुख भूमिका भी निभाता है । शरीर तथा मन दोनों की सृष्टि अन्न से है । इसलिए शरीर और मन दोनों का सूत्र संचालक अन्न को कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति न होगी ।
हमारे ऋषियों ने साधक को इसलिए सतोगुणी अहार ही अपनाने पर जोर दिया है । उनका भोजन स्वयं परम सात्विक होता था । महर्षि काण्ड अन्न के दाने बीनकर गुजारा करते थे, महर्षि पिप्पलाद का आहार था, पिपल वृक्ष के फल । वैसी स्थिति यद्यपि आज कहीं नहीं पायी जाती, पर जितना कुछ सम्भव है, आहार की सात्विकता और पवित्रता पर अधिकाधिक अंकुश रखना साधना की सफलता के लिए नितान्त जरुरी है ।
बाल्मीकि रामायण में अन्तस्करण को देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है और कहा गया है ‘अदन्त पुरुषो भवति तदन्नस्तस्य देवता’ अर्था्त मनुष्य जैसा अन्न खाता है, वैसा ही उसके देवता खाते है । कुधान्य खाने से शरीरस्थ देवता भी भ्रष्ट हो जाते है । कारण, देवताओं को सबसे निकटवर्ती निवासस्थान अपना देह है । इस मानव शरीर में सभी देवता निवास करते है । विभिन्न अंग–प्रत्यंगों में विभिन्न देव शक्तियों का निवास है । जैसा कुछ हम खाते पीते है । उसके अनुरूप उनको पोषण मिलता है और वे सशक्त अथवा दुर्बल बनते हंै । सात्विक खान–पान देवताओं को पुष्ट करता है और आसुरी तमोगुणी आहार से मध्यं–मांस सेवन करने से वे दुर्बल हो जाते है ।
अतः आहार की शुद्धता अभीष्ट सिद्धि के लिए नितान्त आवश्यक है ।

 

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