जो प्रतिबद्ध हैं मधेश के प्रति वही लथपथ हैं

FB_IMG_1455740696359बीरगंज, सीपु तिवारी, फाल्गुन ६ गते
मधेश में जहां, सोचने, देखने और सुनने तक का तरीका पहले से तय हो, वहा उस जैसा नहीं होने की बेचैनी किस हद तक आत्मघाती हो सकती है, इसका भुक्तभोगी है तमरा अभियान। मोर्चा ने तो बागियों की भी हालत ऐसी कर दी है, कि वो भी उसी मंडली का हिस्सा सा लगने लगते है, जिससे वे खुद लड़ने का दावा करते है। विपक्षी खुश भी होते है, कि देखो बागी अब बागी नहीं रहा। मोर्चा में विजेता देखने की ऐसी चाहत है, कि जो पराजित हो, या जो विजेता नहीं हुआ हो, उसे बोलने या साथ चलने का अवसर भी नहीं देना चाहता। इसीलिए पराजित को भी विजेता की तरह पेश होने को विवश होना पड़ता है।

सबने कहा कि ज़रा पूछिएगा की ०६३ से लेकर ०७२ तक में हम विजेता क्यों नहीं बन पाए ? जबकि सवाल ये भी होना चाहिए था, की हम अपनी कमियों को सुधार क्यों नहीं हो पाते ? जिसने मधेश संघर्ष के कारण सबकुछ गवाया हो, उससे ही क्यों पूछा जाता है कि आपने क्या किया ? जो चुके उनसे क्यों नहीं पूछा जाता की आपने ऐसा क्यों किया ? आप तो बस परिणाम को देखते है, अभियान के संघर्षो को नहीं देखते ? हमारी अहमियत आपके लिए क्या है ? क्या कुछ भी नहीं ? ये बेगानापन क्यों ? क्या कारण है कि मोर्चा अपने संवादों में आंदोलन की तय मान्यताओं के खिलाफ गाली देते हुए सुनाई देता है ? क्या अभियान किसी काल्पनिक आंदोलन की बात कर रहा है ? मोर्चा किसे गाली दे रहा है, किसे लात मार रहा है ? जो प्रतिबद्ध है वही लथपथ है, ऐसा क्यों है ?

received_516188171894139क्या इस पर कभी चर्चा नहीं होनी चाहिए, कि हर आंदोलन के बाद हमारी गलतिया क्यों बढ़ती जा रही हैं ? हमारा हरेक आंदोलन लावारिश क्यों होता है ? क्यों हममें बिचलन आ रहा है ? जिस शोषण के विरुद्ध हम लड़ रहे हैं, उसी के कीटाणु हमारे अंदर क्यों पनपने लगे है ? मधेश विद्रोह के समय फोरम भी दर्ता वाला दल नहीं था, फिर आज उपेंद्र यादव को इससे परहेज क्यों ? पंद्रह दिन में सफल होने वाला आंदोलन छः महीना में भी सफल क्यों नहीं हुआ ? आंदोलन घोषणा से पूर्व क्या तैयारी किए थे ? एक मधेश को क्यों छोड़ा गया ? नहीं देने वाले तो कुछ भी नहीं देना चाहते, पर हम अपनी मांग से पीछे क्यों हटे ? जिस संविधान को ही नहीं मानते उसके मुखिया को चुनने क्यों गए ? जिस संसद में हमारी नहीं सुनी गई, जिसने हमारे अपनों की बेरहम हत्याएँ कराई, वहाँ कूल्हे टिकाकर क्यों है ?

किसने नकली इस्तीफा का खेल खेला ? आंदोलन के बीच सदस्यता बाटने की क्या जरूरत थी ? जिनके जिम्मे जो नाका बंद नहीं हुआ, उन्हें क्या दंड मिला ? खुद को एक लाठी लगने पर हेलीकॉप्टर आता है, बाक़ी के जान की कीमत कुछ भी नहीं ? शहीद को पचास लाख देने वाले अब कहा हैं ? मोर्चा के नेताओ पर ही तस्करी कराने, फैक्ट्री चलवाने और प्रशासन से मिलीभगत का आरोप लगा, इसकी छानबीन क्यों नहीं हुइ ? मोर्चा के दो शीर्ष नेता आपस में लड़ते रहे और महंथ ठाकुर धृतराष्ट्र क्यों बने रहे ? क्या ये आरोप सही नहीं है कि मोर्चा अब सत्ता के खेल में लगी है, इसीलिए संसदवादी दल को साथ लेकर सिर्फ सांकेतिक आंदोलन किया जा रहा है।

हमारी प्रेरणा क्या है ? हमारे रूपक में, क्रांति की नाकामी है या संघर्ष की दुविधा ? हाथ की खादी बनाने का जमाना लद गया है, आज तो हाईटेक का जमाना है, हमें भी खुद को परिष्कृत करना होगा। अगर हम खुद को लगातार खोजते नहीं रहेंगे तो एक जगह जाकर रुक जाएंगे। उसके बाद रास्ता रुक जाता है। जहां आंदोलन रुक गया है। इसलिये नाकामी की समीक्षा होनी चाहिए, आत्ममंथन होना चाहिए, दोषारोपण नहीं।

चौरी चौरा की घटना से महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गये सविनय अवज्ञा आंदोलन को आघात पहुँचा, जिसके कारण उन्होने आंदोलन को स्थागित कर दिया, पर उसके बाद सुधार और शक्ति संचय कर फिर आंदोलन किया, ऐसा हम क्यों नहीं कर सकते ? मोर्चा हमसे आगे जरूर है, पर हमें सबके साथ की जरूरत है। मोर्चा में जो कमजोरिया है, उसे देख हम, किसी को तरसाना नहीं चाहते बल्कि खुद को तराशना चाहते है । इनकी नाकामियां हमारे सपनों को पंख देती है। शुक्रगुज़ार हैं कि मोर्चा के पीछे चलते चलते, हम कितनों से आगे निकल गए। हमें मोर्चा से कोई जलन नहीं है, ये तो अभियान के अंदर की आग है जिसे मोर्चा जलाए रखता है।
जय मधेश।।

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