जड़ी बूटी से, टैम्प्रोररी टैटू का सफर ।।

जड़ी बूटी से, टैम्प्रोररी टैटू का सफर ।।

मालिनी मिश्र, काठमाण्डू ।tetu

जड़ी बूटी से हिना फिर मेहंदी और अब टैम्प्रोरी टैट,ू आज कल हमारे जीवन का अहं हिस्सा बन गया है व फैशन के सफर में निरन्तर लोकप्रिय होता जा रहा है । वैसे तो सदाबहार मेहंदी के लिए किसी समय विशेष को सीमांकित नहीं किया जा सकता है पर सावन के महीने में मेहंदी का विशेष महत्व है वैसे तो मेहंदी कभी भी लगायी जा सकती है । यह देश विदेश सभी जगहों पर किसी न किसी रुप में प्रयोग की जाती है । कहीं परम्परा के रुप में तो कहीं फैशन के रुप में । नेपाल , भारत, पाकिस्तान, बांगलादेश आदि सहित कुछ देशा में इसे हिना, मेहंदी के नाम से व संस्कृत भाषा में मेहंदिका के नाम से जाना जाता है वहीं इसके अलावा अन्य देशों में इसे टैम्प्रोरेरी टैटू के नाम से भी जाना जाता है । इतिहास पर नजर डालें तो मेहंदी की शुरुआत कब कहाँ से हुई हसके प्रमाण तो उपलब्ध नहीं हैं, पर हम धार्मिक पुस्तकों व वैदिक प्राचीन इतिहास में झांके तो महिलाओं के द्वारा इसके प्रयोग की कथाएं व चर्चाएं जो कि महिलाएं अपने श्रृंगार के लिए व औषधियों के रुप में प्रयोग करती थीं, पढने को मिल जाती हैं । विद्वानों के अनुसार, भारत में मेहंदी का प्रचार व प्रसार १२ वीं शताब्दी के दौरान, मुगलों के कारण और ज्यादा विस्तृत रुप से बढ गया । वहीं कुछ मानते हैं कि यह पूर्व मध्य व उत्तरी अफ्रीका की ५००० वर्ष पहले की देन है ।कुछ का मानना है कि इसका इतिहास ६,००० वर्ष प्राचीन है जो कि इजिप्ट की देन है । जहाँ मृत्यु से पूर्व व पश्चात भी शरीर पर हिना का लेप लगाया जाता था । इजिप्टवासियों की इससे कई धारणाएं जुडी थी । उन लोगों के बाल व हाथ पैर हमेशा भूरे रंग के होने का कारण यह हिना ही है ।

१७ वीं शताब्दी में मेहंदी एक विशेष वर्ग की स्त्रियों को ही लगाया जा सकता था, जो कुलीन परिवारों से संबंधित थीं । हिना को लगाने के लिए “नाई जाति” की परिवार की महिलाओं को ही बुलाया जाता था व विशेष रुप से इनकी नियुक्ति की जाती थी । ये लोग साज श्रृंगार के लिए हिना का प्रयोग करते थे और यही परम्परा आज तक कायम है, अन्तर सिर्फ इतना है कि आज यह कोई भी लगा सकता है किसी प्रकार की जाति प्रथा का बंधन नही है ।

आज के समय में अद्यतन फैशन के अनुसार मेहंदी का प्रयोग होता है । विभिन्न अवसरों जैसे शादी विवाह, त्योहारों उत्सवों आदि में हम मेहंदी लगाते हैं । लोगों की रुचि व मेहंदी के महत्व को देखते हुए एक रस्म ही रख दी गयी है जो कि शादी से एक दिन पहले रखी जाती है । मेहंदी की शीतलता के कारण व औषधीय गुणों, टेंशन दूर थकावट हटाना व राहत देने वाला लेप होने के कारण इसे विवाह जैसे उत्सव के समय लगाया जाता है जिससे कन्या को राहत मिल सके । यह श्रृंगार के लिए भी होता है, बिना मेहंदी के १६ श्रृंगार अधूरा माना जाता है । लोग ठण्डक के लिए इसे बालों में लगाने के लिए भी प्रयोग करते हैं । पहले लोग मेहंदी के पत्तों को पीसते थे , एक प्रकार से जडी बूटी का काम करती थी पर अब तो हिना के प्रचलित रुप को देखते हुए यह विभिन्न डिजाइनों में व रेडीमेड पैकेट में आसानी से पाया जाता है । विदेशों में लोग इसे शौखिया लगाते हैं व टैम्प्रोरी टैटू कहते हैं । आज बहुत सी एसी परम्पराएं हैं जो फैशन का रुप ले रहीं हैं जिसमें हिना का प्रयोग भी एक है जो अब परम्परा से ज्यादा फैशन के रुप में हर जगह अपनायी जा रही है ।

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