टकराव की ओर बढता राष्ट्र

कुमार सच्चिदानन्द:दैलेख के पत्रकार डेकेन्द्रराज थापा की द्वन्द्वकाल में हर्ुइ हत्या और उससे जुड मुद्दे के अनुसंधान के प्रारम्भ के बाद स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर जो घटनाएँ हर्ुइं और जो हो रही हैं, वह टकराव की राजनीति से गुजर रहे राष्ट्र के लिए अपना भविष्य समझने का महत्वपर्ूण्ा संकेत है। जिस दिन विपक्षियों ने प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टर्राई का जिलाप्ा्रवेशनिषेध की रणनीति बनाई, उसी दिन टकराव की स्थिति तो बन ही गई थी। वस्तुतः संविधानसभा के विघटन के बाद सहमति के अभाव में देश में जो संवैधानिक शून्यता की स्थिति पैदा हर्ुइ है, उसका फिलहाल कोई समाधान नजर नहीं आता। सत्तापक्ष किसी भी हालत में सरकार की बागडÞोर छोडÞना नहीं चाहता और विपक्ष हरहाल में उसे सत्ताच्युत करना चाहता है। इसके लिए उनका अपना अभ्यास तो चल ही रहा है, वे राष्ट्रपति तक को उकसा रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति भी इस समस्या का समीचीन समाधान ढूँढने में अर्समर्थ रहे हैं और एक बार फिर पासा राजनैतिक दलों के हाथ में है।

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टकराव की ओर बढता राष्ट्र

पूरे दैलेख प्रकरण में एक महत्त्वपर्ूण्ा बात यह उभरी कि राष्ट्रपतिभवन और बालुवाटार के बीच शीत सम्बन्ध तो पहले से ही वर्त्तमान था, अब सरकार और न्यायपालिका भी आमने-सामने हैं। व्यवस्थापिका संसद अस्तित्व में है नहीं। सम्यक् नियम-कानून के अभाव में द्वन्द्वकालीन मुद्दों का समाधान वर्त्तमान कायदे-कानून के आधार पर किया जा रहा है। सरकार की समस्या है कि वह द्वन्द्व के यथार्थ को झेलकर और कदाचित इसी से मिली ऊर्जा के आधार पर सरकार में आई है। इसलिए जब प्रधानमंत्री के दैलेख प्रवेश पर रोक लगाई गई तो उसे भी अपने वजूद पर संकट गहराता दिखलाई दिया। विपक्षियों का यह ध्रुवीकरण किसी न किसी रूप में माओवादियों को भी आक्रामक बनने के लिए प्रेरित किया जिसके परिणामस्वरूप वहाँ हिंसा और रक्तपात की जमीन तैयार हर्ुइ। स्थिति का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जब देश के कार्यकारी प्रमुख के कार्यक्रम को असफल करने की नीति हम बनाते हैं तो इसके परिणामों की भी कल्पना हम कर ही सकते हैं और इस तरह एक अराजक स्थिति उत्पन्न करने का जिम्मेवार बन जाते हैं। राजनैतिक असहमति का समाधान सडÞक से करना चाहते हैं तो सडÞक के अपने यथार्थ होते हैं और एक तरह से यह विधि व्यवस्था की खिल्ली उडÞाती ही है।
राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन कर संकट का समाधान खोजने के उद्देश्य से राष्ट्रपति रामवरण यादव द्वारा किया गया आह्वान दलों के असहयोग के कारण असफल हो चुका। अन्तरिम संविधान की धारा ३८-१) के अनुसार प्रधानमंत्री चयन के लिए मंसीर ८ से प्रारम्भ किया गया अभियान २ माघ को समाप्त हुआ। जिन-जिन दलों और नेताओं ने सहमतीय सरकार का आह्वान करने की सलाह उन्हें दी, उन्हीं में से किसी ने इसे बन्द करने की सलाह भी दी। इसलिए देश मौजूदा परिस्थिति में सहमति की सरकार के गठन की ओर नहीं, सरकार और विपक्ष दोनों का आन्दोलन देखने की अवस्था में पहुँच चुका है। आगामी वैशाख में चुनाव की संभावना समाप्त हो चुकी है और अगर तत्काल सहमति नहीं हर्ुइ तो जेठ में भी इसकी संभावना नहीं है। इस तरह देश में राजनैतिक मुठभेडÞ का खतरा है और इसे टालने के लिए सक्रिय भूमिका खेलने में राष्ट्रपति भी थके से नजर आते हैं। नेपाली नेताओं से व्यापक परामर्श और भारत भ्रमण से लौटने के बाद वे किसी भी राजनैतिक और संवैधानिक विवाद उत्पन्न करने वाला कदम नहीं बढÞाना चाहते। इस तरह अब गेंद यहाँ सक्रिय राजनैतिक दलों के हाथ में है।
म्ाौजूदा राजनैतिक समस्या के समाधान के लिए नेपाली काँग्रेस दोहरी भूमिका में है। एक ओर तो वह राष्ट्रपति पर समाधान ढूँढने के लिए यह कहकर दबाब दे रही है कि अन्तरिम संविधान को बचाने का दायित्व राष्ट्रपति का है, इसलिए उन्हें अपनी भूमिका निर्वहन करनी ही चाहिए। दूसरी ओर वह इस सरकार पर दबाब बढÞाने के लिए भविष्य में आन्दोलन के अस्त्र का भी उपयोग करना चाहती है। नेकपा एमाले भी कमोवेश इसी मानसिकता में है। चूँकि राष्ट्रपति लाचार हैं इसलिए उनके सामने आन्दोलन के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता और अगर आन्दोलन की जमीन पर वे आते हैं तो निश्चित है कि सत्ता पक्ष भी चुप नहीं बैठेगा, दूसरे सरकार के पास राज्य के संयन्त्र भी हैं। इसलिए टकराव भी निश्चित है और इसमें जो खून बहेंगे, वह होगा निर्दोष नागरिकों का जो दलों के बहकावे में सडÞक पर उतरेंगे।
यह सच है कि नेपाल का महत्वपर्ूण्ा राजनैतिक दल होते हुए भी आज अस्तित्व का सबसे गहरा संकट नेपाली काँग्रेस झेल रही है। चाहे राजनैतिक-कूटनैतिक जो भी कारण रहा हो लेकिन यह सच है कि आम सहमति की सरकार के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पार्टर्ीीारा घोषित होने के बावजूद इसके अध्यक्ष नेपाली राजनीति में एक हास्य के पात्र बन कर रह गए हैं। इसलिए सरकार बदलने की कोई भी बात उनकी सत्ता-लिप्सा को ही उजागर करती है, उसके बाद ही इसका कोई और अर्थ है। संविधान निर्माण के प्रति उदासीनता का आरोप वैसे तो सभी दलों पर है लेकिन काँग्रेस-एमाले जैसी पार्टियों पर कुछ ज्यादा हीं है। इसलिए आम आदमी उनके आह्वान पर बहुलता से आन्दोलन में अपनी सहभागिता देंगे, इस बात की आशा कम है और एक बात यह भी सच है कि आन्दोलन को भी जब तक आन्तरिक और वाह्य र्समर्थन नहीं मिलता, व्यवस्था परिवर्तन के लिए वह पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कहीं न कहीं नेपाली काँग्रेस जैसी जिम्मेवार पार्टर्ीीे अतीत में रणनीति के स्तर पर चूक हर्ुइ है और इसका खामियाजा उसे भुगतना पडÞ रहा है।
नेपाली काँग्रेस की सबसे बडÞी समस्या यह है कि तर्राई उसके जनाधार का प्रमुख केन्द्र रहा है मगर तर्राई आन्दोलन के बाद तस्वीर बदल गई है। उसके र्समर्थकों में मधेशी दलों ने सेंध लगा दी है और जो पार्टर्ीीवगत चुनाव से पर्ूव तक सबसे बडी पार्टर्ीीुआ करती थी, उसे एक तरह से पिछले पायदान पर धकेल दिया है। आज नेपाली काँग्रेस अपनी संघीयता विरोधी और मधेश विरोधी छवि को समाप्त करने के लिए अपने भ्रातृ संगठनों को सक्रिय किया है। लेकिन नेपाल की जनता अब इतना सचेत तो हो ही चुकी है वह अब अपने र्समर्थक और विरोधी तत्वों की पहचान कर सके। इसलिए इन सब प्रयासों से इन्हें तर्राई या पहाडÞ में लाभ होनेवाला नहीं। हाँ, एक बात तो सच है कि दलों में विभाजन हुआ है और वे एक से दो और तीन से तेरह तक हुए हैं। इसलिए आगामी चुनावों में मतविभाजन का लाभ उन्हें मिल सकता है।
नेकपा एमाले का भी मनोविज्ञान लगभग ऐसा ही है। वे नेकपा माओवादी को युद्ध के लिए सडÞक पर उतरने की चुनौती देते नजर आते हैं। विगत में दो-दो प्रधानमंत्री उनके हो चुके हैं। इसलिए सहमतीय सरकार का नेतृत्व करने की मानसिकता प्रकट रूप में उनकी नहीं देखी जा रही मगर इसके भी कुछ नेताओं में इसकी चाहत बनी हर्ुइ है मगर समय अनुकूल नहीं होने के कारण यह चाहत कुण्ठित हो गई है। इसलिए मौजूदा सरकार के विरोध में ये काँग्रेस के साथ हैं और उनके साथ ही चरणबद्ध आन्दोलन करने के पक्ष में हैं। लेकिन इस तथ्य से प्रतिपक्ष के समस्त दलों को अवगत होना ही चाहिए कि जिस लक्ष्य या लाभ के मद्देनजर ये सत्ता में सहभागी या सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं, जिसे यह अवसर प्राप्त है, उसे वह क्यों छोडÞे। यही वह बिन्दु है जो टकराव को निमंत्रण देती है।
मधेशवादी पाटिर्यों के भी अपने-अपने तेवर हैं। कुछ सत्ता में हैं और कुछ सत्ता से बाहर। यद्यपि इन सबके लिए मुद्दे समान हैं मगर वे सत्ता और विपक्ष दोनों के साथ हैं। इसलिए इनके र्समर्थन और विरोध का पैमाना भी इन्हीं दो तरह की जमीन पर है। एक बात तो तय है कि सरकार का नेतृत्व किसी भी हाल में मधेशी शक्तियों के हाथ में नहीं आ सकता। यद्यपि एक वरिष्ठ नेता का नाम उछाला भी गया लेकिन वे भी अपनी सीमाएँ जानते हैं। इसलिए उनके सरकार में रहने या न रहने से उन्हें प्राप्त होनेवाले जनर्समर्थन में कोई बदलाव आनेवाला नहीं। जिस संघीयता का नारा लेकर वे किसी दल विशेष का र्समर्थन या विरोध कर रहे हैं, वह संघीयता चाहे किसी भी पार्टर्ीीा बहुमत क्यों न हो, इसके बिना नेपाल के लोकतांत्रिक भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः इनके लिए मधेश से जुडÞे अन्य मुद्दे भी महत्त्वपर्ूण्ा हैं। मधेशी दलों पर उनके अत्यधिक विभाजन का कलंक तो है ही। अगर इसी विभाजित रूप में वे जनता के समक्ष प्रस्तुत होते हैं तो उनका राजनैतिक भविष्य बेहतर नहीं हो सकता। इसके बावजूद अगर सत्ता और विपक्ष में टकराव की जमीन तैयार होती है तो अपने अलग-अलग यथार्थ होने के कारण उन्हें भी इस संर्घष्ा में सहभागी होना ही होगा।
इस तरह देश एक राजनैतिक टकराव की ओर बढÞ रहा है और अनिश्चित भविष्य के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। एक बात जो राष्ट्र के नीति-निर्माताओं ने नहीं समझी कि लोकतांत्रिक सरकार में सहमति की कोई जमीन नहीं और संविधान सहमति के बिना जारी नहीं हो सकता। इस परस्पर विरोधी यथार्थ को समान भाव-भूमि पर समेटने का प्रयास किया गया। इसलिए जटिलताएँ बढीं हैं और टकराव का रास्ता साफ हुआ है। लेकिन टकराव भी समस्या का समाधान नहीं। सबसे महत्वपर्ूण्ा है, त्याग। अगर इस एक सकारात्मक मनोवृत्ति की साधना हमारी राजनीति कर ले तो हम सारी समस्याओं का समाधान तलाश सकते हैं और राष्ट्र को उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर कर सकते हैं।

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