टिकापुर घटना का शल्यक्रिया कब ? कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी, २१ अगस्त |

श्रावण २९ का वो अत्याचारी दिन । भाद्र ५ का टिकापुर के आमसभा में मधेशी मोर्चा का वह अनियन्त्रित भडकिले भाषण । पीडित मधेशी थारुओं में नेपाली राज्य के विरुद्ध खडे होने की बाध्यता । काँग्रेस के नेपाल सरकार और एमाले वामदेव गौतम के गृह मन्त्रालय का मधेश विरोधी प्रपञ्च और निर्देशन । नेपाली गुण्डों के साथ प्रशासन का वो खुनी षड्यन्त्र और भाद्र ७ गते का त्रासदीपूर्ण मनहूस दो प्रहर के वह दिन ।

Tikapur-ghatana
मधेश आन्दोलन वैसे भाद्र १ गते से मधेशी मोर्चा ने घोषणा की थी । लेकिन पीडित थारुओं ने मुतिm का आन्दोलन श्रावण २२ से ही शुरु कर दी थी । आन्दोलन बिल्कुल शौम्य और शान्तिपूर्ण था । आन्दोलन के क्रम में शान्तिपूर्ण मोटरसाइकल र्याली निकालने के उद्देश्य से कैलाली के पथरैया, दुर्गौली, नारायणपुर, धासिंगपुर, मोतीपुर, जोशीपुर, मुनुवा तथा टिकापुर के इर्दगिर्द से सैकडों मोटरसाइकल के साथ मधेशी थारु यूवा टिकापुर में जमा हुए थे । उनके दिमाग में शंका की कोई संकेत भी नहीं थी कि प्रशासन के संरक्षण में ही नेपाली गुण्डे लोग उनपर या उनके साधनों पर आक्रमण करेंगे । लेकिन हुआ वही जो उनके कल्पना से कोशों दुर थी । राज्य, नेपाली प्रशासन और नेपाली गुण्डों के योजना में थारु यूवाओं के पचास से अधिक मोटरसाइकलों को तोडफोड कर जलाया गया । थारु लोग देखते ही रह गये बिना कोई प्रतिकार किए । मगर मधेशियों को उस अत्यारपूर्ण घटना ने बुडी तरह से हिला दिया था । धिरे धिरे थारु लोग सशतm आन्दोल की तैयारी करने लगे और भाद्र ६ गते के दिन टिकापुर में श्रावण २९ गते के दिन उनके सवारी साधनों में लगाये गए आग का भण्डाफोर कार्यक्रम रखने को ठान ली । भाद्र ६ गते मुनुवा, जोशीपुर, नारायणपुर, पथरैया आदि जगहों से जुलुस सहित टिकापुर आ रहे थारुओं को नेपाली सुरक्षाकर्मियों ने रास्ते में ही रोक दी जिससे मधेशी थारुओं में सशतm एकता बन गयी और भाद्र ७ गते के दिन प्रशासनद्वारा लगाए गए सारे कफ्र्यू और बन्देजों को तोडते हुए टिकापुर आ पहुँचे जिसे राज्य और प्रशासन दोनों ने अपना प्रतिष्ठा का विषय बना लिया ।
थारुओं के उस विशाल भीड से बदला लेने के लिए प्रशासन ने षड्यन्त्र रचा । षड्यन्त्र के सिलसिले में पुलिसद्वारा उस भीड में घुसपैठ का काम किया गया । हजारों के संख्या में रहे भीड के बगल में ही एक हवल्दार ने अपनी बर्दी उतारकर सादे पोशाक के गंजी और हाफ प्याण्ट में उस भीड में घुस गया जिसे उसके बगल ही में सब कुछ देख रहे कुछ दर्शक व्यतियों ने न शंका कर पाया और न किसी से बता पाया । और कुछ देर बाद जो घटना घटी, वे सारे घटनाओं के उद्गम बिन्दु वही हवल्दार बना जिसने प्रशासन के योजना मुताविक अपने प्रहरी साथियों के ओर पत्थरबाजी कर दी और उस शान्तिपूर्ण आन्दोलन को हिंसक बनना पडा । प्रहरीयों ने लाठी चार्ज कर दी, अश्रु ग्यास तथा गोलियाँ चला दी और बने बनाये योजनाओं के शिकार निर्दोष उन थारुओं को बना दी गयी जो सदियों से अपनी भूमि खोता रहा, मेहनत मजदुरी करता रहा, कमलरी और कमैया का जीवन जीता रहा । कुछ ही दिन पूर्व उनके ही जमीन पर आलिशान महल बनाकर उनके ही उपर शासन करने बाले पहाडियों का दास बनता रहा ।
टिकापुर की घटना मानव को सिर्फ शर्मसार करने बाली ही घटना नहीं, अपितु उस हिंसक घटना से राज्य, सरकार, शासन, समाज और प्रशासन समेत को शिक्षा लेनी चाहिए । उस घटना का निष्पक्ष कोई भी शल्यक्रिया आज तक नहीं हो पाना थारु समुदाय लगायत राज्य के द्वारा उत्पिडित की गयी सम्पूर्ण मानव समुदाय के लिए अभिशाप है । जिस अमरेश कमार सिंह और मधेशी मोर्चा के भरोसों पर टिकापुर के मधेशी थारु समुदाय ने शान्तिपूर्ण आन्दोलन का जग डाला था, वे लोग और उनकी संस्था आजतक भी वहाँ नहीं पहुँच पाना आश्चर्य की बात है ।
नेपाली राज्य, उसके प्रशासन, उसके संचार क्षेत्र और संचारकर्मी, अनुसंधान विभाग और सम्पूर्ण नेपाली जनमानस ने अपने ढंग से अपने पक्ष में उस घटना का समीक्षा कर चुका है । मधेशी थारुओं को दोषी बना चुका हैं । २२ लोगों की गिरफ्तारी सहित ११४ लोगों के उपर मुद्दा चलाया जा चुका है । राज्य ने अन्यायपूर्ण बदला ले चुका हैं और आज पर्यन्त बदला इस सोंच से लिया जा रहा है कि थारुओं ने थरुहट क्यूँ माँगी ?, मधेशी नेताओं के बातों को क्यूँ मानी ? सवाल यह है कि मधेशी मोर्चा तथा उसके सन्यन्त्र बाले टिकापुर घटना का शल्यक्रिया कब करेगा ?
नेपाली राज्य, उसके प्रशासन और उसके सारे के सारे मीडिया बाले टिकापुर घटना के दोषी वहाँ के मधेशी थारुओं को बना चुके हैं । और नेपाली मीडिया के समाचार तथा विश्लेषणों को ध्यान से अगर देखें और सुने तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके सारे के सारे अनुसंधान और विश्लेषण एकतर्फी है, नश्लवाद से अभिपे्ररित है और मधेश आनदोलन को अन्तरर्राष्ट्रिय जगत में बद्नाम करने के उद्देश्य से ओतप्रोत हैं । जैसे, टिकापुर घटना को छानबिन करनेबाले प्रहरी वरिष्ट अधिकारी दिनेश अमात्य को काठमाण्डौ से टिकापुर पहुँचने में हेलिकप्टर से तीन घण्टा लगना, न्यज२४ के हतकडी कार्यक्रम के संचालक विकास थपलिया ने घटना में सहभागी कहे जाने बाले नाबालक करण चौधरी को पुलिस द्वारा पूछताछ के क्रम में वह रेशम चौधरी को अपने हीे एफ.एम को जलाते हुए देखने की बात, घटना के योजना बारे रेशम चौधरी और लक्ष्मण थारु द्वारा उस नाबालक को अवगत कराने की बात, एक कोई प्रहरी हवल्दार किसी घर से पानी पीकर निकलते देख प्रहरी के अनुसार ही घरेलु हाथ हथियार से सुसज्जित थारुओं ने उनपर गोली चलाकर उस घर के दुधे बालक को मारने की बात, पुलिस के सवालों पर करण चौधरी द्वारा कुछ भी नहीं व्यतm होने के पश्चात् करण को नक्कली हवल्दार बनाकर घटना के योजना के बारे उस से सत्य तथ्य जानने का दावा करना, अपराध को न्यौता देने बाले राज्य और प्रशासन अपना अपराधिक चरित्र को छुपाने की कोशिश कर मधेशियों को बदनाम करने का संजाल निर्माण करता हुआ स्पष्ट है ।
वे संचार जगत मर कहाँ जाता है जब नेपालगंज में खुल्लमखुल्ला प्रहरी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पहाडी गुण्डे मधेशियों के घर और दुकानें जलायी थी ? वे संचारकर्मी कहाँ बिमार हो जाता है जब बेथरी में चार वर्ष के नाबालक तक को नेपाली पुलिस ने गोली मारकर हत्या की थी ? वो पुलिस प्रशासन साइड क्यूँ लग जाते हैं जब इटहरी में मधेशी मोर्चा के मञ्च को पहाडियों द्वारा तोडफोड होती है ? वो राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग कहाँ रहता है जब बारम्बार बुद्ध और गाँधी के राहों पर चलकर लोगों में जाने का स्वराजी काम करता है ? वह अदालत तक ने–जिसने खुद के तथा सर्वोच्च अदालत तक के फैसलों द्वारा खारेज हो चुके मद्दों पर बारम्बार मुद्दा चलाना और धरौटी क्यूँ माँगती है जहाँ से संसार न्याय पाने का विश्वास रखता है ? नेपाल के वे अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग तथा सम्पति शुद्धिकरण आयोगों के आँखों में अंधेरापन क्यूँ छा सा जाता है जब कैलाली के ही मुनुवा गाँव के सैकडों थारु परिवारों के ५०० से अधिक बिगहे जमीनों को वहीं के दुष्यंत मल्ल के स्वर्गवासी पिता टेक बहादुर मल्ल ने धोखा देकर बन्धक रखकर अरबपति बना बैठा है ? नेपाल सरकार का वह लोकतन्त्र कहाँ खिसक लेता है जब मधेशी जनता लोकतान्त्रिक पद्धतियों को ही मानते हुए जनमत संग्रह करबाने का बात करती है ? नेपालियों का वह भाइचारा सामने क्यूँ नहीं दिखता है जब मधेशी मोर्चा फूलजोर, नवलपुर, भैरहवा, महोत्तरी, बेलहिया में आन्दोलन के अपने कार्यक्रम करते हैं ? मधेश के ही कोहलपुर, अतरिया, धनगढी, दाङ्ग, बुटवल, सुनवल, बर्दघाट, चितवन, झापा, इटहरी, बर्दिबास आदि में मधेशवादी दलों का कार्यकम क्यूँ नहीं हो पाता जबकि मधेशी दल के बिना कुछ वर्षों से सरकार तक नहीं बन पाती है ?
२०७३ वैशाख १९ के दिन भारत के तिनकुनिया से टिकापुर आकर बरफ बेच रहे २७ वर्षीय नसीर अहमद (पिताः भल्लु अहमद) से बरफ लेकर खाने बाले तीन पहाडी यूवकों से पैसे माँगने पर उस बरफ बेचने बाले गरीब यूवक को इण्डियन, भारतीय, धोती, काले, भेले आदि सर्वनामों से गालियाँ देते हुए पिटते पिटते वहीं पर मार दिए । पर नेपाली प्रशासन ने उन पहाडी यूवकों को गाली तक देने की जरुरत नहीं समझी और भारतीय एस.पी तथा वहाँ के मेयर नेपाली प्रशासन के कार्यालय में ही जाकर गाली और धम्कियाँ नहीं देनेतक नेपाली प्रशासन उन हत्यारे यूवकों को न तो गिरफ्तार करती है, न श्री अहमद के परिवार को कोई क्षतिपूर्ति मुहैया कराती है । ज्ञात हो, वह नसीर अहमद चार बच्चों के पिता रहे थे ।
(यह लेख टिकापुर घटना के एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार ही लिखी गयी है जिन्होंने अपना नाम गोप्य रखने की अनुरोध की है ।)

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