टीकापुर जनविद्रोह,प्रहरी द्वारा मधेस आंदोलन पर कियागया का राक्षषी अत्याचार : मुकेश झा

मुकेश झा,जनकपुर,२३मई | “सौ दोषी भले ही छूटे, एक निर्दोष को सजा नही हो”, यह कथन नेपाल के न्यायालय का है। पर क्या वास्तव में यह कानून के व्यवहार में है ? सन्दर्भ मधेस आंदोलन के समय हुए टीकापुर घटना की है। नेपाल सरकार द्वारा लादा जा रहा विभेदपूर्ण सम्विधान के विरुद्ध मधेस आंदोलन के समय २०७२ भाद्र ७ गते टीकापुर में जनविद्रोह हुवा, कारण नेपाल प्रहरी द्वारा मधेस आंदोलन को दबाने का ” राक्षषी ” अत्याचार, जिसमे कइयों की हत्या कर दी गई थी। जिससे आक्रोशित हो उस जनविद्रोह में स्थानीय टीकापुर के थारुओं द्वारा कुछ प्रहरी जवान एवम् अधिकारी मारे गए, जो कि अकल्पनीय एवम् दुःखद था। परन्तु उस घटना के ठीक अगले दिन अर्थात २०७२ भाद्र ८ गते नेपाल प्रहरी ने पुरे नियोजित ढंग से टीकापुर पर जो कहर ढाया उसको देखकर रावण कंश भी शरमा जाए। नेपाल प्रहरी ने वस्तियोंको आग के हवाले कर दिया, बच्चे बूढ़े, महिला युवाओं को घर में घुस कर हत्याएं की, निरपराध युवाओं को घर से घसीट कर गिरफ्तार किया गया।
नेपाल प्रहरी से त्रसित सैकड़ों टीकापुरवासी को अपना घरबार छोड़कर पलायन होना पड़ा। नेपाल सरकार ने जब टीकापुर घटना को राजनैतिक घटना करार देते हुए उक्त घटना के पीड़ितों को १५ करोड़ क्षतिपूर्ती स्वरुप देने की घोषणा की तो नेपाल के “नागरिक अगुवा” जिन्हें थारुओं को अपने जूते के निचे रखने की आदत हो गई है परेशान हो उठे और अगले ही दिन नेपाल के राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग ने टीकापुर घटना को अपराधिक करार कर दिया। आयोग ने किस अनुसन्धान के आधार पर इस घटना को अपराधिक घटना कहा वह पता नही। मधेस आंदोलन के समय खुद मानवाधिकार आयोग की प्रवक्ता मोहना अंसारी ने मधेस भ्रमण किया और रिपोर्ट दिया कि मधेस में प्रहरी ने अत्यधिक बल प्रयोग किया है। तो क्या टीकापुर घटना उसी बल प्रयोग का प्रतिकार नही है ? क्या आयोग अपराधिक घटना का परिभाषा भूल गई ? क्या टीकापुर घटना किसी अपराधिक सङ्गठन द्वारा किया गया था ? क्या किसी अपराधिक व्यक्ति ने सोच समझ कर सुनियोजित ढंग से उस घटना को अंजाम दिया है ऐसा किसी अनुसन्धान में दिखा है ? क्या किसी अपराधिक सङ्गठन ने उस घटना की जिम्मेवारी ली थी ? यदि नही तो ऐसा पूर्वाग्रही विज्ञप्ति नेपाल मानवधिकार आयोग द्वारा निकालना दुर्भाग्यपूर्ण नही तो और क्या ? टीकापुर घटना के आरोपी बिना किसी अदालती फैसला के सिर्फ अनुसन्धान के नाम पर पिछले २ साल ९ महीने से हिरासत में बन्द हैं। अगर कल वह निर्दोष सावित होते हैं तो उसका क्षतिपूर्ती राज्य किस तरह करेगी ?
नेपाल मानवधिकार आयोग के विज्ञप्ति विरुद्ध सर्वोच्च अदालत में रिट भी दाखिला हुई लेकिन उसका क्या हुवा अभी तक कोई जानकारी नही। न ही कोई मिडिया उसे तबज्जो दे रहा है और न ही कोई पत्रकार जबकि कुछ ही दिन पहले प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की प्रकरण में दिए गए रिट में ३ दिन के अंदर फैसला भी आ गया था, परन्तु यहाँ ? क्योंकि यह जनसाधारण की जीवन से सम्बंधित रिट है तो इसे नजरअंदाज किया जा रहा है। कुल मिलाकर बात एक है, इन नश्लवादियों को मधेसी, थारु, आदिवासी, जनजाति को अपने पैरों से कुचलने, उन्हें अधिकार से बंचित रखने में अपनी जीत का अनुभव होता है और आनंद आता है, परन्तु यह नही जानते कि इसका दूरगामी प्रभाव राष्ट्र के लिए बहुत ही भयंकर और दुखदाई होने वाली है। देश में अगर मेलमिलाप बरकरार रखना है तो राष्ट्रिय आयोग, अदालत आदि को पूर्वाग्रह छोड़ कर वास्विकता पर आना होगा। उम्मीद है नेपाल सरकार और अदालत राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग के विज्ञप्ति पर नही जा कर वास्तविकता पर जाए और उस घटना के वास्तविक पक्ष को ध्यान में रखते हुए जल्द ही ठोस निर्णय ले |
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