टीवी के हनुमान का महाप्रयाण

जिंदगी और मौत से कई दिनों तक जूझने के बाद आखिरकार दारा सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ‘टीवी के हनुमान’ दारा सिंह ने आखिरी सांस ली। डक्टरों ने हाथ खड

Dara-Singh as Hanuman

कर दिए थे और चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दारा सिंह के फैमिली डक्टर आर के अग्रवाल ने बताया कि काडिर्Þयो रेस्पिटरी अरेस्ट के चलते दारा सिंह का निधन हुआ, लेकिन वह अंतिम समय तक दारा सिंह की ही तरह रहे। दारा सिंह का जन्म १९ नवंबर १९२८ को अमृतसर के गाँव धरमूचक में हुआ था। दारा सिंह की मां का नाम बलवन्त कौर और पिता का नाम सूरत सिंह रंधावा था। दारा सिंह की कम उम्र में ही शादी हो गई थी और १७ साल की उम्र में एक बच्चे के बाप भी बन गए। बाद में उन्होंने दूसरी शादी की। दारा सिंह के परिवार में आज तीन बेटियां और तीन बेटे हैं। अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध प|mीस्टाइल पहलवान रहे दारा सिंह ने सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। कुश्ती का मैदान हो या फिर बाँलीवुडÞ की दुनिया, दारा सिंह का जलवा दोनों जगह बरकरार रहा।
दारा सिंह ने १९५९ में कुश्ती की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी। १९६० के आसपास पूरे भारत में उनकी कुश्ती का दबदबा रहा। १९४७ में दारा सिंह ने सिंगापुर में मलेशियाई चैम्पियन तरलोक सिंह को पराजित कर मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीता। यहां से शुरू हुआ जीत का सफर कई वषर्ाें तक जारी रहा। कई सालों तक विदेशों में कुश्ती लडÞने के बाद वह १९५२ में अपने वतन लौट गए। १९५४ में वे भारतीय कुश्ती के विजेता बने। इसके बाद दारा सिंह ने काँमनवेल्थ देशों की ओर अपने कदम बढÞÞाए और दुनिया के महान कुश्ती पहलवान किंगकांग को पटखनी दी। लेकिन अमेरिका का वह दिन दारा सिंह कभी नहीं भूले, जब उन्होंने अमेरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को हराकर प|mीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गए। यह २९ मई १९६८ की बात है। लेकिन १९८३ आते-आते उन्होंने कुश्ती को अलविदा कह दिया।
कुश्ती के बाद दारा सिंह ने मुर्ंबई का रूख किया। इसमें इनका साथ दिया मशहूर अदाकारा मुमताज ने। वर्ष१९६६ में दारा सिंह पहली बार बडÞे परदे पर नजर आए। फिल्म का नाम था नौजवान। वह हिंदी फिल्मों में स्टंट करते करते लाखों लोगों के दिलों पर राज करने लगे। उन्होंने सिर्फअदाकार के तौर पर ही अपना हाथ नहीं अजमाया बल्कि निर्देशक एवं निर्माता भी रहे। साठ और सत्तर के दशक में वो बाँलीवुडÞ के एक्शन किंग बने रहे। मुमताज के साथ उनकी बहुत अच्छी केमिस्ट्री थी। दारा सिंह की १६ फिल्मों में मुमताज ही हीरोइन रहीं। बाँलीवुडÞ की फिल्म ‘जब वी मेट’ -२००७) में वह आखिरी बार सिनेमा के रुपहले पर्दे पर दिखाई दिए। इस फिल्म में उन्होंने करीना कपूर के दादा का किरदार निभाया था।
दारा सिंह ८० और ९० के दशक में टीवी पर छाए रहे। १९८० में उन्होंने छोटे परदे की ओर रूख किया था। टीवी सीरियल ‘रामायण’ में जब दारा सिंह हनुमान बने तो देशभर में उनकी पूजा हनुमान के तौर पर होने लगी। रामायण के अलावा भी उन्होंने कई टीवी सीरियल में अभिनय किया। इसमें जीटीवी पर प्रसारित ‘हद कर दी’ भी शामिल है। बीजेपी ने ‘हनुमान कार्डÞ’ को भुनाने के लिए दारा सिंह को २००३ में राज्य सभा भेजा। वह २००९ तक राज्यसभा सदस्य रहे।
इंडिया के आयरन मैन
गौरतलब है कि कई दिनों तक अभिनेता महाबली दारा सिंह जिंदगी और मौत से लडÞने के बाद १२ जुलाई सुबह ७.३० बजे दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुर्ंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पडÞा था। डÞाक्टरों ने बताया की उनके खून में आँक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए जडÞी बूटी लाने वाले दारा सिंह अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लडÞ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हर्ुइ थी उसे क्राँनिक इन्फ्लेमेटरी डÞेमीलीटेटिंग पाँलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह ने १९६२ में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
दारा का प्रेम
जब दारा सिंह ने पहलवानी के क्षेत्र में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर ली तभी उन्हें अपनी पसंद की लडÞकी सुरजीत कौर मिल गई। आज दारा सिंह के भरे-पूरे परिवार में तीन बेटियां और दो बेटे हैं। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिंदी की स्टंट फिल्मों में प्रवेश किया और कई फिल्मों में अभिनेता बने। यही नहीं कई फिल्मों में वह निर्देशक व निर्माता भी बने।
हनुमान बन बटोरी लोकप्रियता
उन्हें टीवी धारावाहिक रामायण में हनुमानजी के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली जिसके परिणाम स्वरूप भाजपा ने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भी प्रदान की। उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए थे। वर्ष२००७ में आई जब वी मेट उनकी आखिरी फिल्म थी। वर्ष२००२ में शरारत, २००१ में र्फज, २००० में दुल्हन हम ले जाएंगे, कल हो ना हो, १९९९ में जुल्मी, १९९९ में दिल्लगी और इस तरह से अन्य कई फिल्में। लेकिन वर्ष१९७६ में आई रामायण में जय बजरंग बली, हनुमानजी का किरदार निभाकर लाखों दिलों को जीत लिया था।

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