टूटता भ्रम

विजय वर्मा:दिमाग का ताप बढता ही जा रहा था, रामेश भैया के चुनाव जितने से सुलेमान भाई को ऐसा क्यो न हो, जो उनकी पार्टर्ीीा चुनाव निशान ही मसाल था। उनकी पार्टी नाव में सहभागी हर्ुइ थी- विभेद को हटाने के लिए, सत्ता में आमूल परिवर्तन लाने के लिए, सभी ऊँचनीच को बराबर का दर्जा दिलाने के लिए। इसीलिए सुलेमान भाई चुनाव भर दिन और रात पूरे तन-मन से प्रचार-प्रसार में लगे हुए थे। उन की मेहनत आज सफल हो चुकी थी। निर्वाचन आयोग परिणाम घोषणा कर रहा था, इधर रामेश भैया अपने घर में सभी उपस्थित पार्टी र्यकर्ताओ को सीने से लगा कर खुशियाली बाँट रहे थे। अपने कार्यकर्ताओं से कह रहे थे- अब हमारी लडर्Þाई और आगे बढÞेगी, संसद और सरकार में हमारी भागेदारी बराबर की होगी। सभी को रोजी रोटी की व्यवस्था की जाएगी, गाँवों की सडÞक हिरोइन की गाल की तहर चमका दूंगा।
इस शहर में हम लोगों की हैसियत सब से बराबर की होगी, पहिले की तरह अगर कोई किसी को आँख दिखायगा तो उस का जीना दूभर हो जाएगा।
दिन और रात लगाके वोट गिना गया था, जीत का समाचार देश भर में रामेश भैया की ही पहली बार के लिष्ट में घोषित हुआ था। लेकिन सूरज ढल जाने से कार्यकर्ताओं की भीडÞ नहीं रह गई थी। दूसरे दिन जुलूस निकालने की जिम्मेवारी लेकर सुलेमान भाई अपने गाँव की तरफ साइकिल लेकर दौडÞ पडेÞ। उसी समय एक दरोगा के कमाण्ड में सुरक्षा दस्ता रामेश भैया के घर को घेर चुका था।
सुलेमान भाई रात भर करवट बदलते रहे, जीत की खुशी में नींद नहीं आ रही थी। काठमांडू में अब हमारी पहुँच हो जाएगी, सत्ता के गलियारे में अब हमारी भी बाँसुरी बजेगी, ऐसा सोचते-सोचते कब नींद पडÞी, उन्हें पत्ाा ही नहीं चला।
गाँव की प्रधानी कई सालो से हुकूम सिंह चला रहे थे। उनकी पार्टर्ीीुरानी ही थी। उनका उम्मेदवार इस चुनाव में हार गया था। उनके दरवाजे पर बैठे कुछ लोग अपनी पार्टर्ीीी कमी कमजोरी की समीक्षा कर रहे थे। नयी पार्टर्ीीे उम्मेदवार की जीत उसके बडे कार्यकर्ता सुलेमान भाई, जो अपने अधिकार को पाने के लिए कुछ दिन पहले ही सशस्त्र राजनीति को त्याग करके इस नयी पार्टर्ीीें आकर कार्यकर्ता बन गए थे।
सुलेमान सुबह से ही घर-घर में जाकर खुशी बाँटते हुए सभी को जुलूस में चलने का न्यौता दे रहे थे। प्रधान के दरवाजे पर बैठे रघ्घू, घूरहे मोल्हे, गोबरे और वरसाती सभी को बाजार पहुँचने के लिए कहा।
प्रधान जी लपक के सुलेमान से हात मिलाते हुए कहा- अरे भाई तुम्हारी मेहनत ने रङ्ग ला दिया। अब क्या कहना चले, हम लोगों के लिए भी कुछ जगह बनाये रखना।
बाबू गाँव बाजार से नजदीक ही था, रास्ते में ही सुलेमान का खेत पडÞता था। उस खेत में हरी-हरी लौकी, करैला, मूली और टमाटर लगा हुआ था। रामेश भैया की मैडम जी कभी-कभी खेत की सब्जी लाने के लिए सुलेमान से कहा करती थीं। मन ही मन सुलेमान ने सोचा, आज दिन अच्छा है, कार्यकर्ता भी कुछ ज्यादा आयेंगे, चलो कुछ सब्जी लेते ही चलते हैं।
सब्जी की गठरी बाँधे जैसे दरवाजे पर पहुँचे सुलेमान को सबसे पहले पुलिस की जाँच-पडÞताल से गुजर ने के बाद ही रामेश भैया के घर में दाखिल हो पाये। इससे पहले कभी ऐसा अनुभव उन्हें नहीं हुथा था। पर उन्हें आजीव लगा था, विजली के तरह सलेमान दौडते हुए मेडम के पास जा पहुँचे।
आज तो चाय बनाते-बनाते मैं थक गई, ये सब्जी पकाना हमसे नहीं होगा। जाओं तुम और तुम्हारे नेताजी कोई खाना बनानेवाली को ढूढÞ कर लाओं, कहते हुए मैडम ने सुलेमान पर अपना गुस्सा उतार दिया।
जेठ महीने की दुपहरी में नेता जी के जुलूस ने बाजार परिक्रमा किया, रामेश भैया को फूल की मालाओं से लाद दिया गया था। लग रहा था- आज ही उनकी शादी हर्ुइ है। सडक कार्यकर्ताओं से भरी हर्ुइ थी। अबीर-गुलाल इतना उडाया गया था कि सुलेमान की जघियाँ में उतर गया था। अबीर में रङ्ग मिले होने से पसीने से सराबोर होकर दोनों पुठ्ठे लाल-लाल चमक रहे थे। मैडम आज गुस्से में होने की वजह से उन्होंने सुलेमान को चाय तक नहीं दी। भूखे पेट वो नारा लगाते रहे- मधेशी जात को जो दवाएगा, वो चूर-चूर हो जाएगा। हमारी संख्या आधी, हमारा हक सब पे आधा।
नेता जी उसी दिन प्लेन से काठमांडू चले गए। दो-चार दिन वाद सुलेमान भाई ने फोन पर रामेश भैया का हाल खबर लिया। रामेश भैया ने बताया, इधर सब ठीक है, अब हम लोग सरकार में जाएंगे जो ऐतिहासिक कदम होगा। आप लोगों के ऊपर हो रहे र्ढाई सौ वर्षके शोषण एवं उत्पीडन से मुक्ति दिलाउँगा, कुछ चिन्ता नहीं करना है, वस सरकार बनने दो। नेता जी की बातों से सुलेमान खुशी से झूम उठे।
काठमांडू में सब अपनी व्यवस्था मिलाकर एक महीना वाद नेता जी वापस लौटे। जिला समिति की बैठक बुलाई गई। उस में उन्होंेने बताया- ‘इस पार्टर्ीीे संसदीय दल में दो ही लोग उच्च जाति के हैं, बाँकी सब पिछडी समाज और जाति के हैं। बात मिल नहीं रही है, पिछडी जात वाले सब पद और अधिकार ले रखे हैं, मुझे तो कुछ दूसरे ढङ्ग से ही पेश होना पडेÞगा।’
सुलेमान का माथा ठनका, अभी तक तो हम लोग एक ही जात समझते थे- मधेशी। अब यह ऊची और नीची जात क्या होती है, बहुत से कार्यकर्ताओं के दिमाग में नहीं घुसा।
जिले के कई गाँवों में नेता जी का दौरा हुआ, बहुत से नये-नये लोग पार्टर्ीीें प्रवेश किए। बाबु गाँव के प्रधान हुकूम सिंह भी पार्टर्ीीें आ गए। अब जिला समिति में सुलेमान और हुकूम सिंह का दर्जा बराबर का हो गया था।
नेता जी जिले का चक्कर लगा कर पूरे परिवार सहित काठमांडू पधार गए थे। इस बीच में सरकार गिरी और नेताजी की पार्टर्ीीूट गई। रामेश भैया नई पार्टर्ीीें नेता भी बने और मन्त्री पद  हथिया लिया।
आषाढ महीने की पहली बारिस सब खेत-खलिहान, ताल-तलैया पानी से लबालव हो गए थे। कई सालों से गाँवों की सडकों पर मिट्टी पटान नहीं हुआ था। वरसात के पानी से सडकों में गड्ढÞे पडÞ गए थे। पर्ूव के कुछ गाँवो में नदी में बाढÞ आने से कुछ घर भी डूब गए थे। सुलेमान भाई साइकिल से सडक पर जा रहे थे, पानी भरी सडÞक पर गठ्ठो का अन्दाज नहीं लगा पाए और साइकिल सहित एक जगह पर डूबकी लगा गए।
वहीं नजदीक में घुरै नाम का एक किसान घाँस काँट रहा था। सुलेमान को देख कर कहा- अरे भाई आप जिले के बडे नेता है, सडÞकों की सुध कौन लेगा –
‘रुको आज ही मन्त्री जी से बात करता हूँ। गाँव की इन सडकों को पक्की बनवा कर रहूँगा, मै भी पहुँच रखता हूँ’, कहते हुए सुलेमान साइकिल सम्हालते बाजार की तरफ चलते बने। सुलेमान ने उसी दिन पार्टर्ीीार्यालय से मन्त्री जी को फोन लगाया। उधर से किसी दूसरे आदमी ने बताया- मन्त्री जी अभी मिटिङ में हैं, फर्ुसत नहीं है।
पार्टर्ीीार्यालय में चहल-पहल बढÞ रही थी। नये-नये लोग पार्टर्ीीें आ गए थे। सुलेमान जैसे और धर्ूत किस्म के लोगों के बीच रस्सा-कसी चलने लगी थी। कार्यकताओं का वजन देख कर मन्त्री जी फोन पर बात करने की आदत डÞाल चुके थे।
गाँव में प्रधान के घर में भी फोन था, शाम को सुलेमान ने हुकूम सिंह से ही फोन लगाने के लिए कहा। फोन पर प्रधान और मन्त्री जीका वार्तालाप हुआ। फिर सुलेमान की बारी आई। आपसे अनुरोध है, हम लोगों की सुध ली जाए। गाँव की सडÞक बहुत खराब है, कुछ बजेट की व्यवस्था कर दीजिए। मन्त्री जी की तरफ से जवाफ मिला- ‘अरे भाई ! हमें तो आप लोगों ने वर्षों वर्षके शोषण से मुक्त करवाने के लिए भेजा है, पहले तो हमे अधिकार चाहिए, संघीयता चाहिए और भी बहुत कुछ चाहिए। इन सब चीजो के लिए कानून चाहिए, इसी में लगा हूँ, अभी तो सडÞक बनाने की बात उचित नहीं है।’ और फोन कट गया।
उस दिन सुलेमान बडÞबडÞाते हुए घर पहुँचे, आँखो में नीद लाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन आँख खुली की खुली रह जाती, फिर कब नीद पडÞी उन्हे पता ही नहीं चला।
मन्त्री जी का दौरा अब जिले में कम पोखरा जैसे पर्यटकीय शहरों में ज्यादा होता था। काठमांडू में कहीं-कहीं चर्चा भी होने लगी थी- मन्त्री जी किसी महिला मित्र को घुमाने ले जाते हैं।
इस साल वषर्ात अच्छी होने से फसल अच्छी हर्ुइ थी। खेत-खलिहान सब अन्न से भरे पडÞे थे। किसान सब अन्न बटोरने में लगे थे। सडकों पर बैल गाडियां दौडÞ रही थीं। उसी समय मन्त्री जी का जिले में दौरा हुआ। आगे-पीछे पुलिस की गाडÞी थी, बीच में मन्त्री जी की। गाडियो का काफिला सीधे प्रधान जी के दरवाजे पर पहुँचा। कुछ लोग आव भगत में लग गए, कुछ किसानो ने सडÞक मरम्मत करवाने की बात उर्ठाई।
मन्त्री जी ने किसानो से कहा- अरे तुम लोग कितने वेवकूफ हो, हम तो तुम लोगों को अब्बल दर्जे का नागरिक बनाने में लगे हैं, जहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव को स्थान नहीं होगा, अभी इसकी जरूरत है, बाँकी काम बाद में होगा।
सुलेमान को किसी पहाडÞी नेता ने बताया था- मन्त्री जी के हाथ मंे कुछ राजनीतिक पदों की नियुक्तियाँ हैं, आप जैसे लोगों को मिल सकता है। अगर पा गए तो सरकार में रहने तक प्लेन से सफर होगा, काठमांडू का। यह बात सुलेमान के दिमाग में घूम रही थी- हम भी प्लेन चढने का अवसर पा सकते हैं, अगर मन्त्री जी चाहे तों।
मन्त्री जी को एक कोने में ले जाकर सुलेमान ने अपनी मन की बात खोली। उन्होंने कहा- अरे यह बात सबके सामने नहीं कल, घर में आ जाव।
मन्त्री जी के घर में बहुत से लोगोें की भीडÞ थी, कुछ लोगों से सुलेमान परिचित भी न थे। एक से पूछा- कहां हैं – पता चला वो तो अभी बाजार में लाल कोठी देखने गए है, उसे वो खरीदना चाहते हं।
सुलेमान का माथा फिर ठनका। अभी तक तो मन्त्री जी गल्लापानी बेच के खर्च चलाते थे, इतना पैसा कहाँ से बटोर लिए !
मन्त्री जे ने मैडम के नाम से लाल कोठी खरीद लिया, उस समय उन्होंने इतना पैसा लगाया की बाजार में उतना पैसा कोई खरीददार लगा नहीं पा रहा था। मन्त्री जी और सुलेमान के बीच सलाहा हर्ुइ- काठमांडू आने पर बढिया से बढिया जगह पर पहुँचाने का वादा कर लिया।
सुलेमान के मन में बार-बार आने लगा, सरकार मंे रहने तक उडान ही उडान होगी। धान की फसल अच्छी हर्ुइ ही थी, सब बेच बाच के सात हजार की व्यवस्था की सुलेमान ने।
अपनी मेहनत की कमाई से ‘प्लेन का टिकट लेकर काठमांडू पहुँच गए सुलेमान। एयरपोर्ट पर पहले से ही मन्त्रीजी की गाडÞी खडÞी थी, सीधे मन्त्री जी के निवास पर पहुँच गए, बिना किसी कठिनाई के।
मन्त्री जी के सामने पहुँचते ही सुलेमान गले से गला मिलना चाहते थे। मन्त्री जे ने कहा- बैठो-बैठो, चाय पिलाने के बाद सुनधारा के किसी होटेल में ठहरने के लिए भेज दिए।
सुलेमान ने कुछ बदला-बदला सा महसूस किया मन्त्री जी को ! कुछ ज्यादा हमसे साफ सुथरे थे, इसीलिए गले नहीं मिले।
होटल मन्त्री जी के कार्यकर्ताओं को ठहराने का अड्डा था। वहाँ पर पहले से ही दो पर्ूवाञ्चल के नेता ठहरे हुए थे। उन लोगों से सुलेमान का परिचय हुआ। शाम हो ही चुकी थी। उन लोगों ने प्रस्ताव रखा- चलो अब काठमांडू की सैर की जाए। तीनों लोग नजदीक के किसी डान्स बार में घुस गए। ऐसा माहौल सुलेमान ने जीवन में कभी देखा नहीं था। सुलेमान के बगल में एक नर्तकी आकर बैठ चुकी थी। उसके बदन भर में सिर्फदो कपडे टगें थे। मेच पर बहुत सी चीजें आ चुकी थी बिना अर्डर किए ही।
‘अरे ये तो हराम है, बाप रे बाप’ कहते हुए सुलेमान दूर खिसकना चाहते थे। लेकिन नर्तकी ने जोर से हात पकडÞते हुए कहा- ‘राजा जवानी खलास हो जाएगी, थोडा मजा ले लो।’ तब तक पर्ूवाञ्चल के दोनों नेता गला तर करने लगे थे। एकने कहा- चिन्ता मत करों, सब नेता जी देख लेगें। उस दिन सुलेमान की जेब में बडी मुश्किल से दो सौ रपैया बचे, बाँकी उडÞ गए।
सुलेमान काठमांडू आने से मन्त्री जी उसके ऊपर पार्टर्ीीी कुछ जिम्मेवारी बढÞाना चाहते थे। और नेताओं का भी मन था, सुलेमान को उपेक्षित, उत्पीडित समुदाय को जोडÞने के लिए इस विभाग का नेतृत्व दिया जाए।
सुलेमान को भी प्लेन चढÞने का ख्याल मन ही मन आता ही रहता था। मन्त्री जी से सुलेमान ने पूछा ही लिया- जिस पद के लिए आपने कहा था- उसके लिए मनोनय कब होगा।
‘अरे चिन्ता मत करो, सब एक ही बार में थोडÞे होगा, पार्टर्ीीे सिनयरटी बनाना पडÞता है, काम करते रहो, हो जाएगा’ -मन्त्री ने कहा।
सुलेमान पर पार्टर्ीीी जिम्मेवारी बढÞ गई थी। कुछ कार्यकर्ता और खर्च के साथ संगठन विस्तार के लिए जाने के लिए प्रबन्ध कर दिया गया। उसी दिन के कैविनेट से मन्त्री जे ने अपने चचेरे भाई को नगर विकास प्राधिकरण का आयुक्त करवाया था।
मध्य तर्राई के बारा, पर्सर्ाारौहट जैसे जिला में सुलेमान अपने कार्यकर्ताओं के साथ जनता जोडÞने का अभियान बडÞी तेजी से चला रहे थे। इधर, काठमांडू में अगले कैविनेट मिटिङ से मन्त्रीजी अपने फुफेरे भाई को एक सरकारी संस्थान का अध्यक्ष बनवा रहे थे।
अपने ऊपर आयी जिम्मेवारी को बखूबी निभाने में माहिर थे, सुलेमान। अपने विभाग के संगठन को विस्तार में पूरा मन लगा के काम कर रहे थे। लेकिन उनके मन में मन्त्री जी की तरफ से की गई वचनवद्धता कब पूरी होगी, आश लगाए बैठे थे।
पार्टर्ीीे सुलेमान का मूल्यांकन करते हुए केन्द्रिय समिति से आनेवाले दिनों में नवलपरासी, रुपन्देही और कपिलवस्तु जिला में आमसभा करने के लिए भेजने का निर्ण्र्ााकिया था। उसी दिन के कैविनेट से मन्त्रीजी ने अपने ममेरे भाई को किसी परिषद का कार्यकारी निर्देशक में चार वर्षके लिए नियुक्त करवाया था।
एक महीने का कार्यक्रम पूरा करके सुलेमान अपनी रिर्पोट मन्त्री को सौंपते हुए अपनी नियुक्ति वाली बात पूछ ही बैठे। आप को जिस पद के लिए योग्य हम लोग मान रहे है, उस पर सहयोगी दल के नेताओं की नजर है, इसलिए विलम्व होने की बात मन्त्रीजी ने बतायी।
सुलेमान उस दिन बहुत बेचैन और उदास से हो गए। अपने होटेल में बैठे थे। तब तक पर्ूवाञ्चल के दोनों नेताओं का आगमन हो गया था। एक ने कहा- क्यों भाई आज अपसेट से लग रहे हो – चलो चलते है, काठमांडू का सैर करने। उन लोगों को सुलेमान के नियुक्ति वाली बात मालुम थी। दूसरे ने पूछा- सुलेमान जी आप मन्त्री जी के नजदीक के नातेदारों में से है –
नहीं !
त्यो क्या मन्त्री जी के जान पहचान के हैं –
नहीं !
कभी आपने चन्दा देने की बात कही –
कभी नहीं !
तब क्यों आस लगाए बैठे हैं – हमारे नसीब में तो यही काठमांडू का सयर करना ही लिखा है।
‘आज मूड ठीक नहीं है’, कहते हुए सुलेमान कमरे में घुस गए, विस्तर पर फफक-फफक कर रोने लगे- यहाँ तो मधेशी जात सिर्फवोट बटोरने के लिए है। पद, मर्यादा, सम्मान जैसी चीज पाने के लिए मन्त्री की जाति का होना पडÞता है।
उधर टेबुल पर रखे हुए रेडियो मेंे गीत आ रहा था-
मुझे मेरे हाल पे छोडÞ दो
मुझे तुझ से कुछ भी न चाहिए।
सुलेमान का भ्रम टूट गया था, अब उनका ऐसी राजनीति से मोह भंग हो चुका था। सत्रह महिने तक चली हर्ुइ मन्त्री जी के सरकार को गिराने का उपक्रम होने लगा था। त्र
दष्वबथ।लतख२gmबष्।अिom

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