टूटा सम्बन्ध अब विघटन या रूपान्तरण ?

लिलानाथ गौतम:भले ही औपचारिक रूप में पार्टी विघटन की घोषणा न हो, लेकिन एकीकृत नेकपा माओवादी विघटन के अन्तिम क्षण में पहुँच गयी है । जो चरित्र माओवादी में था, अब वह नहीं रहा । एमाओवादी के वरिष्ठ नेता तथा पूर्वप्रधानमन्त्री डा. बाबुराम भट्टराई, पार्टी से अलग होने के कारण ही ऐसा हो रहा है । पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ पक्षधर यह बात स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं भी हो सकते हैं, लेकिन पार्टी से डा. भट्टराई का वहिर्गमन एमाओवादी के लिए महंगा साबित होने वाला है । For lilanath
प्रचण्ड और डा. भट्टराई की औपचारिक राजनीतिक यात्रा लगभग २५ वर्षाें से जारी थी । २५ वर्ष में दोनों का सम्बन्ध कभी भी सुमधुर नहीं रहा । कभी सिद्धान्त के नाम में तो कभी व्यक्तित्व की लड़ाई चलती रही । २५ वर्षों से पार्टी अध्यक्ष में प्रचण्ड ही हैं । लेकिन डा. बाबुराम भट्टराई की राजनीतिक विचार के अनुसार पार्टी आगे बढ़ रही है । सशस्रुत्र युद्ध केरु प्राररुम्भ सेरु लेरुकररु पार्टी सञ्चालन तक प्रचण्ड औरुररु बाबुररुाम केरु बीच सैरुद्धान्तिक औरुररु नीतिगत विवाद चलता ररुहता थारु। लेरुकिन अन्ततः बाबुररुाम केरु लाइन मेरुं आनेरु केरु लिए प्रचण्ड बाध्य होरुतेरु थेरुरु। इसका अन्तिम परिरुणाम संविधानसभा सेरु संविधान जाररुी होरुना हैरुरु।
जनयुद्धकाल मेरुं प्रचण्ड संविधानसभा निर्वाचन सम्बन्धी विषय सुनना भी नहीं चाहतेरु थेरुरु। लेरुकिन बाबुररुाम उसी केरु लिए मररु मिटतेरु थेरुरु। रुसंविधान केरु लिए संविधानसभारु की मांग डा. भरुररुाई नेरु जनयुद्ध केरु शुरु मेरुं ही आगेरु लाया थारु। अभी डा. भरुररुाई केरु उसी लाइन की जीत हुई हैरुरु। पार्टी कोरु शान्ति प्रक्रिया मेरुं लानेरु केरु लिए भी बाबुररुाम कोरु प्रचण्ड केरु साथ बहुत ही संघर्ष कररुना पडत्र युद्ध के प्रारम्भ से लेकर पार्टी सञ्चालन तक प्रचण्ड और बाबुराम के बीच सैद्धान्तिक और नीतिगत विवाद चलता रहता था । लेकिन अन्ततः बाबुराम के लाइन में आने के लिए प्रचण्ड बाध्य होते थे । इसका अन्तिम परिणाम संविधानसभा से संविधान जारी होना है ।
जनयुद्धकाल में प्रचण्ड संविधानसभा निर्वाचन सम्बन्धी विषय सुनना भी नहीं चाहते थे । लेकिन बाबुराम उसी के लिए मर मिटते थे । ‘संविधान के लिए संविधानसभा’ की मांग डा. भट्टराई ने जनयुद्ध के शुरु में ही आगे लाया था । अभी डा. भट्टराई के उसी लाइन की जीत हुई है । पार्टी को शान्ति प्रक्रिया में लाने के लिए भी बाबुराम को प्रचण्ड के साथ बहुत ही संघर्ष करना पड़ा । पार्टी को शान्ति प्रक्रिया में रूपान्तरण करने के लिए डा. भट्टराई ने जो संघर्ष किया, उसी का परिणाम है, आज का माओवादी ।
लेकिन अब माओवादी के पास ऐसी कोई भी सैद्धान्तिक आधार नहीं बचा है, जिस के अनुसार पार्टी को आगे बढ़ाया जाए । इस विषय को लेकर माओवादी के भीतर कुछ ज्यादा ही असमंजसता दिखाई देती है । सिद्धान्ततः डा. भट्टराई के विचारानुसार ही अभी तक माओवादी आगे बढ़ रहा था । अब डा. भट्टराई वहाँ नहीं है तो प्रचण्ड किस तरीके से पार्टी को आगे बढ़ाएँगें ? कहा नहीं जा सकता । सामान्यतः उनके पास दो ही मार्ग है– १) पार्टी को एमालेकृत करना । इस को माओवादी भाषा में दक्षिणपन्थी धार भी कह सकते हैं । २) डा. भट्टराई से पहले ही पार्टी से अलग होने वाले मोहन वैद्य और नेत्रविक्रम चन्द विप्लव के साथ सहकार्य करना और हो सके तो पार्टी एकीकरण भी करना । इसके लिए प्रचण्ड को वैद्य और विप्लव की तरह उग्र क्रान्तिकारी दिखाई देना पड़ता है । प्रचण्ड का अभी तक का इतिहास देखें तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पहला विकल्प ही वह अपनाएंगे ।
पार्टी इतिहास द्वारा प्रमाणित सत्य यह है कि माओवादी पार्टी का चरित्र प्रचण्ड और बाबुराम के व्यक्तित्व और चरित्र ने ही निर्धारण किया है । यह दो नेता जिस नीति में सहमत होते थे, वह पार्टी की नीति हो जाती थी । जितना भी विवाद हो और भले ही नीति डा. भट्टराई की हो, उस में सहमत होने के लिए प्रचण्ड बाध्य होते थे । अर्थात् नेतृत्व प्रचण्ड का होते हुए भी पार्टी नीति बाबुराम भट्टराई की होती थी । ऐसी अवस्था में जब भट्टराई पार्टी से बाहर हो गए हैं तो उस पार्टी में सैद्धान्तिक आधार नहीं रह जाता । प्रचण्ड के सामने औपचारिक रूप में पार्टी विघटन का विकल्प भी है और पार्टी को पुनर्जीवन देने के लिए प्रतिवद्ध भी हो सकते हंै । लेकिन यह दोनों प्रचण्ड के लिए उतना सहज नहीं है । पार्टी विघटन करने के बजाय प्रचण्ड, पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए सक्रिय दिखाई दे सकते हैं । लेकिन प्रचण्ड का जो चरित्र है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रचण्ड की सक्रियता पार्टी का सिर्फ एमालेकरण ही कर सकता है । ऐसी अवस्था में अगर एमाओवादी, एमाले के साथ एकीकरण हो जाएगा तो कोई भी आश्चर्य नहीं है । अपनी इस परिस्थिति को भी प्रचण्ड बखुबी समझ रहे हंै ।
इधर बाबुराम भट्टराई नयी पार्टी निर्माण करेंगे और उसको स्थापित कर पाएंगे, इसका भी कोई आधार नहीं है । हाँ, आम जनता की आशा और भरोसा अभी भी प्रचण्ड से ज्यादा बाबुराम के प्रति हो सकता है । लेकिन बाबुराम में जो राजनीतिक तथा सांगठनिक चरित्र है, उससे कार्यकर्ता और आमजनता को सिर्फ निराशा ही हाथ लगने वाली है ।
वैसे तो अभी डा. बाबुराम ‘नयी शक्ति’ का नाम देकर सक्रिय दिखाई देते हैं । उनका कथन है कि देश को आर्थिक रूप में रुपान्तरण करने के लिए देश में ‘नयी शक्ति’ आवश्यक है । लेकिन उक्त ‘नयी शक्ति’ का राजनीतिक चरित्र किस तरह का रहेगा ? इस सम्बन्ध में डा. भट्टराई अभी तक मौन हैं । उन के इसी मौन को देखते हुए कुछ लोग कहते हैं कि अब डा. भट्टराई नयी पार्टी नहीं बनाएंगे । उन लोगों का मानना है कि अब डा. भट्टराई राजनीति में नहीं, आर्थिक शक्तिकेन्द्रों के निकट रहकर विकास निर्माण सम्बन्धी काम करना चाहते हैं ।
बाबुराम जो कुछ करें, यह तो कह ही सकते हैं कि नेपाल में माओवादी आन्दोलन का अवसान हो चुका है । कम्युनिस्ट चरित्र का हवाला देकर ऊँची–ऊँची क्रान्तिकारी नारा अब बाबुराम की मँुह से निकलने वाला नहीं है । पार्टी नाम के पीछे ‘माओवादी’ तो रह सकता है, लेकिन प्रचण्ड से भी इस तरह की आवाज निकलने की सम्भावना कम ही है । इससे पहले ‘क्रान्ति’ के नाम में पार्टी से अलग होने वाले वैद्य और विप्लप की आवाज भी बुलन्द होने की सम्भावना कम ही दिखाई देती है । नाम ‘माओवादी’ हो सकता है, लेकिन विगत की तरह माओवादी चरित्र को अवलम्बन करने वाली बुलन्द पार्टी अब नेपाल में नहीं है । इसलिए बाबुराम का पार्टी परित्याग ने आज तक के माओवादी आन्दोलन से सृजित सकारात्मक तथा नकारात्मक चरित्र को भी समाप्त कर दिया है ।
पहली संविधानसभा निर्वाचन से सबसे शक्तिशाली पार्टी बनने में सफल माओवादी दूसरी निर्वाचन संसद में कमजोर हैं । इस तरह के अवसान के पीछे पार्टी की आन्तरिक लोकतन्त्र कमजोर होना ही महत्वपूर्ण कारक है । कमजोर आन्तरिक लोकतन्त्र के जग में निर्मित कमजोर संगठनिक संरचना और उग्रजातिवादी नारा के कारण ही दूसरे संविधानसभा निर्वाचन में माओवादी को बुरी तरह पराजित होना पड़ा । लेकिन विडम्बना ! लगता है कि अभी डा. भट्टराई वही जातिवादी चिन्तन को लेकर पार्टी से अलग हुए है । जारी नया संविधान के प्रति असन्तुष्ट कुछ मधेशवादी और जनजाति को समर्थन करते हुए उन्होंने पार्टी से अलग होने का निर्णय लिया है । इससे आशंका पैदा हो जाती है कि क्या डा. भट्टराई वही जतिवादी चिन्तन लेकर चलनेवालों को साथ में लेकर ‘नयी शक्ति’ निर्माण करेंगे ? अगर बाबुराम की ‘नयी शक्ति’ का राजनीतिक चरित्र ऐसी ही जातीय चिन्तन हैं तो वह कोई भी हालत में आगे नहीं बढ़ पाएंगे । नेपाल में जातीय राजनीतिक नारा से चर्चा में तो आ सकते हैं लेकिन उस में वैधानिक रूप में स्थापित होना मुश्किल है, यह बात प्रमाणित हो चुकी है । संक्षिप्त में बाबुराम भट्टराई की राजनीतिक भविष्य कैसा है, यह अभी नहीं कहा जा सकता ।
लेकिन बाबुराम विहीन एमाओवादी के सम्बन्ध में कुछ अनुमान लगाया जा सकता है । पहली बात तो यह है कि अब एमाओवादी आत्मबल विगत की तरह शक्तिशाली और विश्वस्त नहीं है । दूसरी बात, बाबुराम बिना माओवादी को जनविश्वास हासिल करना भी उतना सहज नहीं है । जनविश्वास के लिए पार्टी नेतृत्व (प्रचण्ड) द्वारा कुछ ज्यादा ही त्याग करना होता है । लेकिन प्रचण्ड, उस तरह का त्याग करने के लिए तैयार नहीं है, जिस तरह एमाओवादी जीवित हो सकता है । एमाओवादी को नयी पार्टी के रूप में स्थापित करने के बजाय एमाले में विलय कराना प्रचण्ड के लिए सहज हो सकता है । इसके लिए प्रतीक्षा करें– एमाओवादी को एमाले में एकीकरण करने के लिए प्रचण्ड साहस करते हैं या पुनर्निर्माण के लिए दुस्साहस ।

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