टूटेश्वर महादेव

पं. द्रव्येश ठाकुर:माईस्थान, महोत्तरी, जनकपुर नेपाल में टूटेश्वर महादेव का पौराणिक मंदिर अवस्थित है । अपनी महिमा के लिए यह मंदिर विख्यात है । कहते हैं कि कोई भी भक्त इस मंदिर से निराश नहीं लौटता । शिव शम्भु की कृपा अपने भक्तों पर सदैव बनी रहती है । इस मंदिर से शिव भक्त नन्दी की कथा भी जुडÞी हर्ुइ है । इस मंदिर की चर्चा शिव पुराण में भी मिलती है । रमणीय दृश्य और प्राकृतिक सौर्न्दर्य के बीच यह मंदिर सुशोभित है । इस मंदिर से जुडÞी आस्था की कथाएँ इस प्रकार से हैं-
श्री देवाधिदेव महादेव का तैंतीसवाँ अवतार नन्दीश्वर अवतार हुआ था ।
प्राचीन काल में शालंकायन मुनि के पुत्र शिलाद नाम के एक धर्मात्मा मुनि थे । उन्होंने पितरों के आदेश से अयोनिज सुब्रत मृत्युहीन पुत्र प्राप्ति के लिए इन्द्र को प्रसन्न किया परन्तु इन्द्र ने वैसा पुत्र प्रदान करने में अपने को अर्समर्थ बताते हुए कहा कि देवाधिदेव महादेव की आराधना से ही वैसा पुत्र प्राप्त हो सकता है अन्यथा नहीं ।
शिलाद मुनि ने शिव का कठिन स्तवन किया उससे खुश होकर शंकर भगवान वरदान देने को प्रस्तुत होने पर शिलाद मुनि ने कहा- प्रभु मैं आपके समान ही मृत्युहीन अयोनिज र्सव शक्तिमान पुत्र चाहता हूँ । शिवजी ने कहा- तपोधन व्रि्र यद्यपि मैं सारे जगत का पिता हूँ, फिर भी तुम मेरे पिता बनोगे और मैं तुम्हारा आयोनिज पुत्र होउँगा तथा मेरा नाम नन्दीश्वर होगा । शिलाद मुनि की ओर कृपा दृष्टि से देख कर और वरदान देकर उमा सहित अन्तर्धान हो गए । उसके पश्चात् शिलाद मुनि ने अपने आश्रम लौटकर मुनियों से सारा वृत्तान्त कह सुनाया ।
यज्ञवेत्ताओं में श्रेष्ठ शिलाद यज्ञ करने के लिए यज्ञ क्षेत्र पवित्र कर रहे थे, उसी समय शम्भु की आज्ञा से मुनि के शरीर से नन्दी प्रकट हो गए । तब सारी दिशाओं में प्रसन्नता छा गई और शिलाद मुनि को भी बडÞी प्रसन्नता हर्ुइ । शिवस्वरूप मुकुटधारी त्रिशूल आदि विभूषणों से युक्त उस नन्दी को पाकर शिलाद ने कहा- हे जगदीश्वर आपने नन्दी रूप से प्रकट होकर मेरे ऊपर असीम कृपा की है । आप को कोटिशः प्रणाम है । इस प्रकार नन्दी को लेकर अपनी कुटिया पर पहुँचे वहाँ उनका रूप मनुष्य का हो गया । जात, कर्म आदि संस्कार से सु-सम्पन्न कर पाँचवे वर्षमें शिलाद ने नन्दी को वेदों और अन्यान्य शास्त्रों का ज्ञान दिया । मित्र और वरुण नाम के दो मुनि नन्दी को देखने आए उन मुनियों ने उनको देख कर कहा- शिलाद आपने अपने पुत्र को वेद और शास्त्रों कीे तो अच्छी शिक्षा दी है परन्तु इसकी आयु अब १ वर्षसे अधिक नहीं है ।
यह सुनकर शिलाद मुनि नन्दी को अपनी छाती से लगाकर दुखी हो फूट-फूट कर रोने लगे । नन्दी ने शिवजी के चरणों का ध्यान कर पिता से पूछा- आप को ऐसा कौन सा दुःख आ पडÞा है, जो आप इस तरह से रो-रो कर प्राणान्त करने पर तुले हैं । शिलाद ने उन दोनों मुनियों की वाणी सुनाकर कहा- तुम्हारे अल्पायु होने के समाचार को सुन कर मैं अत्यन्त दुखी हूँ । इस दुख को कौन दूर कर सकता है – तुम्हीं बताओ मैं उन्हीं के शरण में जाऊँगा । नन्दी ने कहा- पिता जी, आप व्याकुल मत होइए दुनिया की कोई भी शक्ति मुझे बाल्यकाल में मृत्यु वरण नहीं करा सकती ।
शिलाद ने कहा- पुत्र तुम में ऐसा कौन सा तप ज्ञान, योग ऐर्श्वर्य प्राप्त है, जिसके बल पर तुम मेरा दारुण दुःख दूर कर सकते हो – नन्दी ने कहा, मेरे पास तम, ज्ञान, योग या ऐर्श्वर्य नहीं है, परन्तु महादेव के भजन से मृत्यु को जीत लूंगा । यह कह कर पिता को सिर झुका कर प्रणाम किया और प्रदक्षिणा कर उत्तम वन की राह में चल पडÞा ।
नन्दी पावन नदी के तट पर आसन जमाकर उग्र तप-शिव मन्त्र जाप करने लगा । तपस्या से खुश होकर महादेव ने उमा सहित नन्दी को दर्शन देकर कहा, शिवनन्दन तुमने बडÞा उत्तम तप किया है अभीष्ट वर मांगो । वत्स नन्दी उन दोनों को मैंने ही भेजा था, जिसने तुम्हे मृत्यु का भय दिया, तुम मेरे समान ही अजर-अमर अक्षय होकर गणनायक बने रहोगे, यह कहकर शिवजी ने कमलों की बनी माला अपने गले से निकाल कर नन्दी के गले में डाल दिया । माला गले में पडÞते ही तीन नेत्र और आयुध सहित दस हाथ से समुन्नत होकर साक्षत् शंकर सा प्रतीत होने लगा । तदन्तर शिव ने नन्दी का हाथ पकडÞ कर पूछा, बताओ कौन सा उत्तम वरदान दूँ, शिव की जटा से निकली निर्मल गंगाजल हाथ में लेकर तुम नदी हो जाओ यह कहकर उसका हाथ छोडÞ दिया । तभी से उत्तम वेग से बहने वाली स्वच्छ जल से परिपर्ूण्ा महान वेगशालनी दिव्यरूपा पाँच सुन्दर नदी के रूप में परिणत हो गया । उनके नाम जटो-दशका, त्रि-स्तोता, वृषध्वनी, स्वर्णो-दका और जम्वुनदी -पचधुरा) माई स्थान है । इन नदियों का नाम शिव के समीप लेने से परम पावन पुण्य प्राप्त होता है । माना जाता है कि इन नदियों में स्नान कर शिव पूजन और जलार्पण करने से व्यक्ति भक्ति, धन पुत्र आदि पाकर शिव लोक पाता है ।
उमा देवी की राय से महादेव ने नन्दी को गणाध्यक्ष पद पर अभिषेश कर मरुतों की कन्या ‘शुयशा’ से विवाह करवा दिया । नन्दी की पत्नी भी त्रिनेत्रा हो गई । तब त्रिलोकेश्वर भक्त वत्सल शिव ने सपत्नी प्रेमपर्ूवक कहा- जहाँ तुम रहोगे, मैं उपस्थित रहूँगा । तुम्हारी स्थापना मेरे पार्श्व -सामने) भाग में होगी । तुम्हारा पर्ूवजों की मुक्ति से सामीप्य बना रहेगा वे मेरे भक्त और गणाध्यक्ष होंगे ।
वही नन्दीश्वर अवतार टूटेश्वर नाथ महादेव का लिंग गाविस माइस्थान महोत्तरी, जनकपुर अञ्चल नेपाल के महेन्द्र राजमार्ग बर्दिवास से ३ कि. मी. पश्चिम राजमार्ग के उत्तर टुटेश्वर शिला द्वार के ग्रेभेल सडÞक से ३ कि. मी. उत्तर में अवस्थित है । राह में झाडÞी एवं बडÞे-बडÞे जंगली वृक्ष मिलते हैं । माढÞा नदी का दक्षिण पर्ूव किनारा सुरम्य और ऊँचीं ऊँची पहाडिÞयों से घिरा हुआ है । हर जगह पर छोटे छोटे मन्दिर देखने को मिल जाते हैं । मार्ग खाडÞीनुमा है । प्राकृतिक सौर्न्दर्य से भरपूर है यह मंदिर । प्राचीन काल में यह मन्दिर घने जंगल में था, परन्तु वर्तमान में बस्ती के उत्तर पर्ूव में है ।
इस मन्दिर का बसहा -नन्दी) आकर्ष पीली पत्थरों से बना है, जो अत्यधिक प्राचीन जान पडÞता है । बसहा के माथे में सींग नहीं है । माना जाता है कि सींग वाणासुर और शिव के संग्राम में कट गया था । श्रावण महीना भर भक्तों की भीडÞ से यह मन्दिर भरा होता है और आकर्ष दिखता है । सोमवारी मेला में अत्यधिक भीडÞ होती है । स्थानीय भक्तजन सेवा सत्कार में जुटे रहते हैं । बाबा के दर्शन और जल रिसाल से भक्तों को मन वान्छित फल प्राप्त होता है । दूर-दूर से भारत, नेपाल के काँवरिया जलार्पण करने हेतु आते हैं ।
टूटेश्वर मन्दिर से ३ किमी पर्ूव दक्षिण में सशस्त्र प्रहरी बल के तालीम केन्द्र के निकट गाविस ‘माइस्थान’ में भगवती मन्दिर के पर्ूव उत्तर तरफ में पहाडी शिला खण्ड से  मञ्च नाम्नी -पञ्चधुरामाइ) निकली हर्ुइ है । वहाँ स्वच्छ जल का अपार भण्डार है । सहयोगी धारा बना कर अन्य गाँवों और बर्दिवास में जल आपर्ूर्ति की जाती है । सिंचाई एवं पीने में जल का प्रयोग होता है । देखा गया है कि भीषण अकाल में भी जल नहीं सूखता है । महादेव द्वारा नदी बनने के वरदान स्वरूप यही पञ्चधुरा माई का प्राचीन स्थल है । यहाँ भक्त गण आते हैं और अपनी आराधना से शिव को खुश कर संतुष्ट होकर जाते हैं । इस स्थान को पर्यटकीय रूप से अगर सुसम्पन्न किया जाय तो काफी अच्छा होगा । मंदिर के प्रचार और प्रसार पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।  शिव का चौवालीसवाँ अवतार मार्ग शर्ीष्ा मास के अष्टमी कृष्ण पक्ष में काल भैरव के रूप में काशी -बनारस) भारत में हुआ था । कहा जाता है कि काल भैरव के दर्शन नहीं करने से काशी तर्ीथ का फल नहीं मिलता है ।

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