टोपी जो सफेद बाल ही नहीं, अंदर की बेईमानी और भ्रष्टाचार भी छिपा देता है

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टोपी जिंदावाद, ……. बिम्मीशर्मा, वीरगंज, ३ जनवरी |(व्यग्ंय)
शरीर में कपडा पहनना उतना जरुरी नहीं है जितना टोपी पहनना । आखिर में ईस देश का देश प्रेम और राष्ट्रवाद का प्रतीक एक टोपी ही तो है । यह टोपी कोई अग्रेंजी हैट या कैप नहीं है । यह तो विशुद्ध नेपाली ढाका टोपी है जिसे पहनते ही शरीर में देश प्रेम का संचार होने लगता है । यह टोपी शीर का गंजापन या सफेद बाल ही नहीं छुपाता । ईंसान के अंदर की बेईमानी और भ्रष्टाचार को भी छुपा देता है । ईसी लिए तो जो जितना निर्लज्ज है वह टोपी पहन कर अपनी शर्म हया छुपा रहा है ।
शरीर में पहने हुए कपडे सर्दी और गर्मी से रक्षा करता है । पर टोपी तो माशाल्लाह देश द्रोह से बचाता है । चाहे जितना भी पाप या अधर्म कर लो अंत में टोपी पहनने से सारे पाप धूल जाते हैं । जब सिर्फ जनवरी एक तारिख के दिन टोपी दिवस मना कर टोपी पहन्ने से ही ईतने पूण्य मिल जाते हैं तो जरा सोचिए जो ३६५ दिन ही टोपी पहनते हैं उन्हे और कितना ज्यादा पूण्य मिलता होगा ? यह तो उसी तरह की बात हो गयी जैसे हर दिन गंगाजी में रहने और तैरने वाली मछली ज्यादा अपना पाप धोती है जितना कभी, कभार गंगाजी मे नहाने वाला । भले ही वह मछली अपने से छोटे जीव को चाहे जितना भक्षण करती होगी । आखिर में गंगाजी की मछली है ईसी लिए उसके सारे पाप माफ ।
संसार में पहने जाने वाले किसी कपडे को दिवस के रुप में शायद ही कंही मनाया जाता होगा ?  पर यह तो हमारा देश है सारे संसार से निराला । यहां सारी दुनिया से अलग अजब गजब का महोते हैं । क्या किसी अग्रेंज ने कभी टाई दिवस मनाया होगा ? या अमेरिका में कभी कोट या पैंट दिवस मनाया जाता होगा ? पर यहां अपना देश प्रेम दिखाने का ईतना सस्ता तरिका ईजाद कर लिया गया है कि देख, सुन कर हंसी और गुस्सा दोनों ही आता है । पर क्या करें यह देश है ही दिमाग से लैंड लक्ड ।
बिश्वमान चित्र में नेपाल एक भूपरिवेष्ठित अर्थात लैंड लक्ड देश है । ईसी लिए यहां के निवासी भी अपने दिमाग और तर्क को ताला, चाभी लगा कर रखते हैं । एक भेंड अगर खड्डे में गिरने गये तो दुसरी भेंड भी वहीं चली जाती है गिरने के लिए । ईसी को कहते हैं भेडचाल । यह देश भी भेड चालों से भरा हुआ है । देश प्रेम और राष्ट्रवाद का अर्थ है देश के प्रति निष्ठा और अपने काम के प्रति ईमानदार होना । पर ईमान और जमानतो कही. मर खप चूका है । ईसी लिए ईसका स्वागं रच कर औरों को उल्लू बना रहे हैं । यदि ऐसा न होता तो सरकारी कर्मचारी तो हर हमेशा नेपाली टोपी पहने रहते हैं, फिर क्यो ईन्ही सरकारी कार्यालयों मे सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है ?
देश प्रेम का जज्बा अंदर से आनी चाहिए टोपी या कुछ पहन कर नहीं । देश कि समस्या या आम मुद्धें में कभी सहमति या समझौता नहीं होता । न कोई संधी करते समय किसी नेता या सरकारी कर्मचारी के चेहरे पर कोई देश प्रेम का भाव ही झलकता है । पर टोपी ऐसे पहनते है लगता है सारा ईज्जत, आबरु ईसी टोपी के अंदर है । ईसी टोपी को पहन कर देश की सारी नदिंया बेच दी और गलत निर्णय लिए गए । उस समय क्यो नहीं उपजा किसी के अंदर कोई देश प्रेम या राष्ट्रवाद का भाव ? क्या एक बित्ता भर कपडा हमारे अंदर की अंधबिश्वास, बेईमानी और अनैतिकता को छूपा सकती है ? जब शरीर रुपी पूरा देश निर्वस्त्र है तो सगरमाथा की मानिंद शीर को ढकने से हमारी लाज ढक जाएगी?
सिर्फ टोपी दिवस ही क्यों ? ईस देश में टोपी के अलावा और भी बहुत कुछ पहना जाता है उसका क्या ? आप टोपी के अलावा धोती, गमछा, चौबंदी, दौरा, सुरुवाल या और भी किसी पहने जाने वाले कपडे के बारे में भी कोई दिवस मनाईये न ? मधेश की ५२ प्रतिशत जनता टोपी नहीं पहनती । ईनके अपने रीतिरिवाज और भेषभुषा हैं । उसको दरकिनार क्यों किया जाता है ? क्या ईसी लिए कि सारे मधेशी अंगिकृत है या वह भारतीय और बिहारी है ? नहीं ईस देश के शासक का ही दिमाग अंगिकृत है । ईसी लिए तो भेदभाव ईनके नस, नस में है । सिंह दरवार सबको एक आंख से ही देखती है क्यों कि ईसकी दुसरी आंख तो धृतराष्ट्र की तरह अपने बधुं, बांधव के प्रेम में अंधी है ।
ईस देश के बुद्धुजीवियों का तो कहना ही क्या ? अभी टोपी दिवस सिर्फ प्रस्तावित है । सरकार की और से ईसे अभी राष्ट्रिय तौर पर स्विकृत नहीं किया गया है पर मना एसे रहे हैं जैसे दशहरा और दिपावली जैसा बडा कोई त्यौहार हो । यदि सरकार टोपी दिवस को स्विकृत करती है तो उसके बाद ईस दिन राष्ट्रिय छुट्टी की मागं करेगें । यदि दोनों काम सरकार नें कर दिया तो ईनकी तो बल्ले, बल्ले हो जाएगी और ईस दिन यहां की जनता खसी काट्ने से भी गुरेज नहीं करेगीं । और फिर शराब और कबाब का दौर चलेगा और दूर कहीं किसी आलमारी या टेबल पर रखी हुई टोपी शर्मसार होगी ।
अपने भितर के कमिने पन को छुपाने के लिएयहां के लोग टोपी को वलिका बकरा बना रहे हैं । अभीतक ईस देश में ईंसान ही शहीद होते थे अब टोपी भी ईस में शामिलहो गया है । लोग अपनी बेइमानी और अनैतिकता को छुपा कर पूरे आन, बान और शान से टोपी पहन कर गौरवान्वित हो रहें है । पर टोपी बेचारा जुएं और गंदगी से भरे हुए ईंसान के शीर और कपट से भरे हुए मन के मालिक के उपर बैठ कर कितना शरमा रही होगी?
ईस देश में टोपी दिवस मनाने से ज्यादा जरुरी है नैतिकता और ईमानदारी का दिवस साल के किसी एक दिन मनाया जाए । जिस दिन कोई भी गलत काम न करे न तन से न मन से । एक दिन साल में राष्ट्रिय ईज्जत दिवस मनाया जाए । जिस दिन सभी दुसरों का ईज्जत करना सिख जाएं । फिर टोपीतो ज्यादा तर मर्द पहनते हैं, फिर औरत का क्या ? क्या महिलाएं ईस देश की नागरिक नहीं है ? वह क्या पहने फिर ? महिलाओं के लिएं भी पुरुष की तरह स्कार्फ या मझेत्रो दिवस मनाया जाना चाहिए । नहीं तो सारे महिला धिक्कारवादी मिल कर सिंह दरवार कि सत्ता का कहीं बैंड न बजां दे । ईसलिए समय रहते सम्हल जाईए और नेपाली टोपी दिवस जो सिर्फ नेपाल में ही पहना जाता है उसको अन्तराष्ट्रिय टोपी दिवस कह कर लज्जित मत किजिए । जिस को मन है वह टोपी पहने, जिसको न मनहो न पहनें । पर टोपी को राष्ट्रवाद और देश प्रेम का पैमाना बनाने जैसा गल्ति मत किजिए ।

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